Feb ११, २०१७ १०:१३ Asia/Kolkata

12 फ़रवरी सन 1809 को ब्रिटेन के भौतिक शास्त्री चार्ल्ज़ डार्विन का जन्म हुआ।

  • 12 फ़रवरी 1502 को वास्को डी गामा भारत की दूसरी समुद्री यात्रा के लिए लिस्बन से रवाना हुए।
  • 12 फ़रवरी 1809 को अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म हुआ।
  • 12 फ़रवरी 1809 को मशहूर भूवैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन का जन्म हुआ।
  • 12 फ़रवरी 1818 को दक्षिण अमेरिकी देश चिली को स्पेन से स्वतंत्रता मिली।
  • 12 फ़रवरी 1912 को चीन में मंचु वंश ने गद्दी छोड़ दी।
  • 12 फ़रवरी 1928 को गांधी जी ने बारदोली में सत्याग्रह की घोषणा की।
  • 12 फ़रवरी 1996 को पीएलओ के नेता यासर अरफ़ात ने फ़िलिस्तीन के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।

 

12 फ़रवरी सन 1809 ईसवी को ब्रिटेन के भौतिक शास्त्री चार्ल्ज़ डारविन का जन्म हुआ। उन्होंने विभिन्न जीव जन्तुओं की उत्पत्ति के बारे में अध्ययन किया और अपने इस अध्ययन को अंतिम चरण तक पहुँचाने के लिए उन्होंने लम्बी समुद्री यात्रा की। डारविनिज़्म विचारधारा के जनक डारविन के मतानुसार वर्तमान जीवों की उत्पत्ति एक साधारण से जीव से हुई जो बाद में विभिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत विभिन्न प्रारुपों में बदलते गये। सन 1882 में डारविन का निधन हुआ।

 

12 फ़रवरी सन 1912 ईसवी को चीन में सोन-येत-सेन के नेतृत्व में सैनिकों और जनता के विद्रोह के बाद इस देश में मंचू वंश का राज समाप्त हुआ और उसका स्थान लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ले लिया। सोन येत सेन ने, जो चीन के राष्ट्रपिता माने जाते हैं, इस विद्रोह के बाद राष्ट्रपति पद संभाला। कुछ ही समय बाद वे सत्ता से हट गये और यू आन शीकाय ने उनका स्थान लिया किंतु आंतरिक मतभेदों के कारण चीन की स्थिति एक बार पुन: तनावपूर्ण हो गयी। सन 1949 में चीन में एक दूसरी क्रान्ति आयी जिसके बाद इस देश में कम्युनिस्ट शासन लागू हो गया।

 

12 फ़रवरी सन 1948 ईसवी को मिस्र के विख्यात संघर्षकर्ता और इख़वानुल मुसलमीन संगठन के संस्थापक हसन-अल-बन्ना को ब्रिटेन और तत्कालीन मिस्री नरेश मलिक फ़ारुक़ ने षडयंत्र रच कर शहीद करवा दिया। उन्होंने विश्व विद्यालय में अपनी शिक्षा के दौरान ही विश्व साम्राज्य और देश में उसके समर्थकों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया। सन 1928 में उन्होंने इख़वानुल मुसलेमीन नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन का समर्थन धीरे धीरे मिस्र के बाहर सीरिया, लेबनान, जॉर्डन और उत्तरी अफ़्रीक़ा के कुछ देशों में बढ़ता गया और हसन अलबन्ना पूरी दुनिया में विख्यात हो गये। 1948 में मिस्र के तत्कालीन प्रधान मंत्री की हत्या के आरोप में मिस्र की सरकार ने इख़वानुल मुसलेमीन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस गुट के कई नेताओं को गिरफ़तार करवाया गया जिनमें हसन अल बन्ना सहित कुछ लोगों को मौत की सज़ा दे दी गयी किंतु यह संगठन आज भी पूरी तरह सक्रिय है।

 

12 फ़रवरी सन 1804 ईसवी को जर्मनी के प्रख्यात दार्शनिक एवं विचारक इमैनुएल कांट का 80 वर्ष की आयु में निधन हुआ। वे सन 1724  में एक धार्मिक परिवार में जन्मे। कांट ने अपना पूरा जीवन शिक्षा और पठन तथा लेखन में व्यतीत किया। कांट ने गणित, भौतिकशास्त्र, खगोल शास्त्र, तर्क शस्त्र और विशेष रुप से दर्शन शास्त्र के विषय में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने किसी भी वस्तु की सही पहचान के लिए प्रयोग और बुद्धि को प्रभावी माना है। कांट ने नैतिकशास्त्र के विषय में अनेक मूल्यवान विचार प्रसतुत किए हैं।

 

12 फ़रवरी वर्ष 2008 को लेबनान के हिज़बुल्लाह संगठन के नेता एमाद मुग़निया को जो हाज रिज़वान के नाम से प्रसिद्ध थे, शहीद कर दिया गया । उनकी गाड़ी में ज़ायोनी शासन के तत्वों ने बम लगाया था। शहीद एमाद मुग़निया का जन्म वर्ष 1962 में दक्षिणी लेबनान के एक धार्मिक परिवार में हुआ था। पढ़ाई के बाद उन्होंने कुछ समय तक पीएलओ के साथ काम किया किन्तु ज़ायोनी शासन के लेबनान पर आक्रमण और इस देश से पीएलओ के निकलने के बाद वे अमल आंदोलन से जुड़ गये। कुछ दिनों बाद हिज़बुल्लाह आंदोलन के गठन के बाद वे इस से जुड़ गये और उन्होंने ज़ायोनी शासन के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। अपनी वीरता, साहस और होशियारी के कारण एमाद मुग़निया ने हिज़बुल्लाह आंदोलन में बड़ा स्थान प्राप्त कर लिया और ज़ायोनी शासन के विरुद्ध होने वाले कई अभियानों की योजना उन्हें ने बनाई थी। यही कारण था कि औपचारिक रूप से एमाद मुग़निया का नाम ज़ायोनी शासन की हिट लिस्ट में था। वर्ष 2006 में 33 दिवसीय युद्ध में ज़ायोनी सैनिकों की भारी पराजय में एमाद मुग़निया की भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। 33 दिवसीय युद्ध में ज़ायोनी सैनिकों की भारी पराजय के कारण ज़ायोनी उनसे द्वेष रखने लगे और अपनी कायरतापूर्ण शैली के सहारे प्रतिरोध के एक चमकते दीप को बुझा दिया।

 

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23 बहमन सन 1357 हिजरी शम्सी को ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के आरंभिक दिनों में अंतरिम सरकार ने औपचारिक रुप से अपना कार्य आरंभ किया। दूसरी ओर शाह के पतन और इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बावजूद जनता उसी प्रकार उक्त शासन को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयासरत रही। इसी प्रकार जनता के एक अन्य गुट ने शहरों में संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण केंद्रों को बचाने का कार्य संभाला। इस दायित्व को संभालने तथा शाह से मिलीभगत रखने वालों से संघर्ष के लिए एक सुव्यवस्थित संगठन का अस्तित्व आवश्यक हो गया। इसी लिए इमाम ख़ुमैनी के आदेश पर इस्लामी क्रान्ति समिति बनायी गयी।

23 बहमन सन 1357 हिजरी शम्सी को ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के आरंभिक दिनों में अंतरिम सरकार ने औपचारिक रुप से अपना कार्य आरंभ किया। दूसरी ओर शाह के पतन और इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बावजूद जनता उसी प्रकार उक्त शासन को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिए प्रयासरत रही। इसी प्रकार जनता के एक अन्य गुट ने शहरों में संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण केंद्रों को बचाने का कार्य संभाला। इस दायित्व को संभालने तथा शाह से मिलीभगत रखने वालों से संघर्ष के लिए एक सुव्यवस्थित संगठन का अस्तित्व आवश्यक हो गया। इसी लिए इमाम ख़ुमैनी के आदेश पर इस्लामी क्रान्ति समिति बनायी गयी।

 

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17 जमादिउस्सानी वर्ष 36 हिजरी क़मरी को जमल नामक युद्ध हुआ। यह युद्ध पैग़म्बरे इस्लाम के निष्ठावान उत्तराधीकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सरकार के विरुद्ध उठ खड़े होने वालों ने आरंभ किया था जो हज़रत अली का  न्याय सहन नहीं कर पा रहे थे। इस लिए इस गुट ने हज़रत अली के आज्ञा पालन के वचन को तोड़ कर विद्रोह कर दिया। इस गुट को वचन तोड़ने वाला गुट भी कहा जाता है। इस गुट का नेतृत्व तलहा और ज़ुबैर कर रहे थे। इन लोगों ने अपने अवैध उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधारण लोगों और संसार के लोभी पूंजीपतियों को उकसाकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम के विरुद्ध खड़ा कर दिया। तलहा और ज़ुबैर ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आज्ञा पालन का वचन दिया था किन्तु उन्हें जब इस बात का आभास हुआ कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनकी अवैध मांगों को पूरा करने को तैयार नहीं हैं तो उन्होंने मुसलमानों के तीसरे ख़लीफ़ा के ख़ून का प्रतिशोध लेने के बहाने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। तलहा और ज़ुबैर पहले मक्के गये और वहां कुछ प्रसिद्ध लोगों को उकसाकर अपने साथ कर लिया और एक विशाल सेना के साथ इराक़ के नगर बसरे की ओर रवाना हुए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी विद्रोहियों को कुचलने के लिए उनका पीछा किया और अंततः इस्लामी सेना और विद्रोहियों का सामना बसरा में हुआ। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने युद्ध रोकने का हरसंभव प्रयास किया क्योंकि आप शांतिपूर्ण ढंग से समस्या के समाधान के इच्छुक थे। इसी आधार पर आपने विद्रोहियों से कई दिनों तक बात चीत की किन्तु विद्रोही गुट ने जो सत्ता के लोभ में अंधा हो चुका था, हज़रत अली के उपदेशों को नहीं सुना। यह विद्रोही गुट समझ रहा था कि वह हज़रत अली की सेना को पराजित कर देगा किन्तु उसे नहीं मालूम था कि उनका सामना विश्व के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से है, अंततः इस युद्ध में भी हज़रत अली को विजय हुई।

17 जमादिउस्सानी वर्ष 524 हिजरी क़मरी को प्रसिद्ध अरब साहित्यकार और शायर बारेअ बग़दादी का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका पालन पोषण वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ परिवार में हुआ। बारेअ बग़दादी की गिनती अपने काल के अरबी व्याकरण और भाषा विशेषज्ञों में होती थी। उनकी रचनाओं में उनका काव्य संकलन बहुत प्रसिद्ध है जो अभी भी बाक़ी है।