शुक्रवार- 14 फ़रवरी
14 फरवरी, 25 बहमन और 27 जमादिलऊला की कुछ अहम घटनाएं
- 1483 मुगल शासन के संस्थापक ज़हीरुद्दीन बाबर का जन्म हुआ।
- 1628 मुगल शासक शाहजहां को ताज पहनाया गया।
- 1867 अमरीकी कार कंपनियों को हैरत में डालने वाले साकेची ट्योटा का जापान में जन्म हुआ।
- 1896 साउथ अफ्रीका, इंगलैंड के मुक़ाबले में 30 पर आल आउट, साउथ अफ्रीक़ा का न्यूनतम स्कोर।
- 1899 अमरीकी कांग्रेस में वोटिंग मशीन का इस्तेमाल शूरु हुआ।
- 1950 सोवियत संघ और चीन ने संधि समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 1960 मार्शल अय्यूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने।
- 1989 भोपाल गैस कांड की ज़िम्मेदार कंपनी यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलयन डालर का हर्जाना देना स्वीकार किया।
14 फ़रवरी सन 2005 को लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक़ हरीरी राजधानी बैरूत मे एक कार बम के धमाके में मारे गए।
लेबनान के बड़े उद्यमी माने जाने वाले रफ़ीक़ हरीरी की आयु उस समय 61 वर्ष थी। हरीरी लेबनान के गृह युद्ध की समाप्ति के कुछ ही समय बाद वर्ष 1992 से वर्ष 1998 तक तथा वर्ष 2000 से 2004 तक लेबनान के प्रधान मंत्री रहे। रफ़ीक़ हरीरी लेबनान में सीरिया की सेनाओं की उपस्थिति के विरोधी थे इसी लिए उनकी हत्या के बाद अमरीका और फ़्रान्स ने दावा किया कि उन्हें सीरिया के एजेंटों ने मारा है। अमरीका और फ्रान्स के भारी दबाव से संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस हत्या की जांच के लिए आयोग गठित किया इस प्रकार रफ़ीक़ हरीरी की हत्या का मामला सीरिया पर दबाव डालने और लेबनान के आंतरिक संकट को हवा देने का बहाना बन गया।
14 फ़रवरी सन 1938 ईसवी को पालमाख़ गुट के हथियारबंद ज़ायोनियों ने फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार को जारी रखते हुए अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन के सासा गांव में अपना घिनौना अपराध आरंभ किया। अगले दिन तक जारी रहने वाली इस आपराधिक कार्यवाही में 20 घरों को ध्वस्त कर दिया गया जिसके कारण 60 फ़िलिस्तीनी जिनमें अधिक संख्या महिलाओं और बच्चों की थी मलबे के नीचे दबकर शहीद हो गए। ज़ायोनी बहुत दिनों तक सासा की घटना को फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार के रूप में याद करते रहे।

14 फ़रवरी सन 1945 ईसवी को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्व की सबसे भीषण ग़ैर परमाणु बम्बारी आरंभ हुई। ब्रिटेन और अमरीका के 1773 विमानों ने जर्मनी के ठिकानों को निशाना बनाया। इस निर्मम कार्यवाही में जो तीन दिन तक जारी रही, जर्मनी के कई औद्योगिक नगर राख का ढेर बन गए और डेढ़ से ढाई लाख लोग मौत के घाट उतार दिए गए।

14 फ़रवरी सन 1963 ईसवी को ब्रिटेन के शल्य चिकित्सक मार्टिन स्काट मनुष्य के गुर्दे का प्रतिरोपण करने में सफल हुए। आज के दिन ब्रिटेन के लीड्ज़ नगर के अस्पताल में प्रोफ़ेसर स्काट ने एक व्यक्ति के गुर्दे को जिसकी कुछ ही देर पहले मृत्यु हो गई थी अपने एक रोगी के शरीर में लगा दिया। यह प्रतिरोपण सफल रहा।
14 फ़रवरी सन 1905 ईसवी को उर्दू के प्रख्यत कवि दाग़ देहलवी का निधन हुआ। वे 25 मई सन 1831 ईसवी को दिल्ली में पैदा हुए। उन्होंने फ़ारसी की शिक्षा ग़ेयासुल्लोग़ात नामक शब्दकोष के लेखक ग़ेयासुद्दीन से प्राप्त की। शायरी में उन्होंने जौक़ को अपना उस्ताद बनाया। दाग़ वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद दिल्ली से निकल कर रामपुर पहुंचे जहां नवाब यूसुफ़ अली ख़ां और नवाब कल्बे अली ख़ां के दरबार से जुड़ गए। सन 1891 में नवाब महबूब अली ख़ां के शिक्षक नियुक्त किए गए। 14 फ़रवरी सन 1905 को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उन्होंने चार ग़ज़ल संग्रह छोड़े हैं जिनके नाम गुलज़ारे दाग़, आफ़ताबे दाग़, माहताबे दाग़ और यादगारे दाग़ हैं।
14 फ़रवरी सन 1959 ईसवी को क्यूबा पर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी फ़ीडल कास्त्रो का शासनकाल आरंभ हुआ। क्यूबा के राजनैतिक इतिहास में कई सैनिक विद्रोह। क्रान्ति तथा आंदोलन हुए जिनमें अंतिम आंदोलन फीडल कास्त्रो का था। यह आंदोलन जिसने जनक्रान्ति का रूप ले लिया, कारण बना कि फ़ीडल कास्त्रो, बैटिस्टा की सरकार गिराने में सफल हो गए और उन्होंने क्यूबा की बागडोर संभाल ली। 25 नवम्बर 2016 में उनका 90 साल की आयु में निधन हुआ।
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25 बहमन सन 1367 हिजरी शम्सी को स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने शैतानी आयात नामक पुस्तक लिखने वाले धर्मभ्रष्ट लेखक सलमान रुश्दी के विरुद्ध फ़तवा जारी किया। सलमान रुश्दी ने इस पुस्तक में इस्लाम, क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम का अनादर किया था और इस्लाम धर्म के बहुत से नियमों को तर्कहीनता पर आधारित रीति बताया था। सलमान रुश्दी की यह पुस्तक जो पश्चिमी देशों के समर्थन से व्यापक स्तर पर प्रकाशित हुई, वास्तवमें इस्लाम के विरुद्ध पश्चिमी देशों का सांस्कृतिक साज़िश थी किंतु इमाम ख़ुमैनी ने इस लेखक के विरुद्ध फ़तवा जारी करके विश्व के मुसलमानों की जागरूकता का प्रमाण दिया ताकि फिर कोई इस प्रकार का दुस्साहस न कर सके।
इस फ़त्वे के जारी होने के बाद इस्लामी जगत के धर्मगुरुओं, इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी और बहुत से बुद्धिजीवियों ने इसका समर्थन किया जबकि पश्चिमी देशों ने सलमान रुश्दी की जमकर वकालत की।

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19 जमादिउस्सानी सन 8 हिजरी क़मरी को ज़ातुस्सलासिल नामक लड़ाई मुसलमानों की विजय के साथ समाप्त हुई। इस लड़ाई का कारण यह था कि कुछ गुट मुसलमानों पर आक्रमण करने के लिए एकजुट हो गये थे जब यह सूचना पैग़म्बरे इस्लाम(स) तक पहुंची तो पैग़म्बर (स) ने अपनी सेना उनके, मुक़ाबले के लिए भेजी किंतु यह सेना शत्रु की सैनिक शक्ति से प्रभावित होकर लौट आयी। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने सेनापति बदल दिया किंतु फिर भी सेना वापस आ गयी। अंतत: पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने हज़रत अली (अ) को सेना का नेतृत्व संभालने को कहा हज़रत अली (अ) ने बड़े ही साहस के साथ शत्रु का मुक़ाबला किया और इस्लामी सेना के नाम एक और विजय दर्ज करायी। बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि कुरआन का सूरए आदियात इसी अवसर पर उतरा था।