Feb १३, २०१७ १७:२० Asia/Kolkata

हमने यूरोप में शरणार्थियों के विरोध और इस्लाम के विरोध की चर्चा की थी।

यूरोप में विदेशी मूल का विरोध और इस्लाम का विरोध दक्षिणपंथियों की पहचान बन चुका है। इस विचारधारा के मुताबिक़, विदेशियों का अर्थ है पश्चिमी मूल्यों और विश्वासों से टकराव। विदेशियों का विरोध कभी क़ानूनी रूप से होता है तो कभी खुलकर हिंसा का सहारा लेकर। इस विचारधारा के तहत न केवल विदेशियों को बल्कि उनकी धारणाओं और सिद्धांतों को भी निशाना बनाया जाता है। फ़्रांसीसी दक्षिणपंथियों द्वारा यूरोपीय संघ में तुर्की के शामिल होने के विरोध का एक यह भी कारण है। उनके मुताबिक़, तुर्की एक मुस्लिम देश है, इसलिए वह ईसाई यूरोप में एक अजनबी देश होगा। उसकी संस्कृति और पहचान भी भिन्न है, जिसका यूरोपीय संस्कृतिक से कोई लेना देना नहीं है।

यूरोप में विदेशियों के विरोध की कोख से ही इस्लामोफ़ोबिया ने जन्म लिया है। हालांकि यूरोप में शरणार्थियों की बढ़ती संख्या और यूरोपीय नागरिकों में इस्लाम की बढ़ती लोकप्रियता तथा इस्लाम के नाम पर यूरोप में आतंकवादी घटनाएं भी इस्लामोफ़ोबिया का एक कारण है। 1980 के दशक में ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता और 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद से यूरोप में इस्लामोफ़ोबिया में तेज़ी से वृद्धि देखने में आई।

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अमरीका में नाइन इलेवन की घटना के बाद, व्यवहारिक रूप से मीडिया और पश्चिमी देशों की सरकारों ने आतंकवाद से मुक़ाबले के बहाने इस्लामोफ़ोबिया की नीति अपनाई। बुश सरकार ने इसी बहाने से अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर चढ़ाई कर दी और आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर दूसरे देशों के नागरिकों का अपहरण किया। बुश शासन की युद्धोन्मादी नीतियों की यूरोपीय देशों द्वारा समर्थन से आतंकवादी कार्यवाहियों में कई गुना वृद्धि हो गई। इन कार्यवाहियों में अधिकांश मुसलमान ही निशाना बने। हालांकि यहां यूरोपीय देशों और मीडिया की इस्लाम विरोधी नीतियां भी स्पष्ट हो जाती हैं। इस्लामी देशों में होने वाली आतंकवादी घटनाओं की पश्चिमी मीडिया में बहुत मामूली और सामान्य कवरेज दी जाती है, जबकि किसी यूरोपीय देश में छोटी सी घटना को भी वैश्विक घटना बनाकर पेश किया जाता है।

मीडिया, चमरपंथी राजनीतिक पार्टियां, राजनीतिज्ञ और यूरोप में कुछ विचारक एवं विद्वान इस महाद्वीप में इस्लामोफ़ोबिया के प्रचार में भूमिका निभाते हैं। इसी कारण, इन गुटों की गतिविधियों ने यूरोपीय समाज में इस्लाम विरोधी भावनाएं भड़काने में अहम भूमिका निभाई है। परिणाम स्वरूप, पश्चिम में मुसलमानों को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

वास्तविकता को उजागर करने के केन्द्र के रूप में विश्व मीडिया के उभरने के साथ ही हमने देखा कि इस्लाम की बहुत ही नकारात्मक तस्वीर पेश की जा रही है। बम लगाते हुए मुस्लिम चरपंथियों की तस्वीरें, आतंकवादी गुटों के नेताओं की धर्मगुरूओं के रूप में तस्वीरें, अरबी बोलने वाले कठोर चेहरे वाले लोग जो पश्चिम के विरुद्ध लड़ने के लिए हथियारों और सैन्य उपकरणों से लैस हैं। प्रतिदिन न्यूज़ चैनल अपनी रिपोर्टों में मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा आतंकवादी कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग करते हैं। इन समस्त तस्वीरों और रिपोर्टों में इस्लामोफ़ोबिया और इस्लाम के प्रति घृणा झलकती है। हालांकि इसके बीच और वास्तविकता के बीच काफ़ी फ़ासला होता है, लेकिन आज की दुनिया में जहां मीडिया हमारे लिए सच्चाई गढ़ती है, वास्तविकता का रूप धारण कर चुकी हैं।

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नाइन इलेवन की घटना के बाद, मीडिया का ध्यान इस्लाम की ओर अधिक हो गया है। अध्ययन से पता चलता है कि दिन प्रतिदिन, इस्लाम और मुसलमानों से संबंधित नकारात्मक रिपोर्टें और तस्वीरें प्रकाशित की जाती हैं।

मिस्र के प्रसिद्ध लेखक एडवर्ड सईद अपनी किताब इस्लाम और मीडिया की प्रस्तावना में शीत युद्ध के बाद पश्चिमी मीडिया में इस्लामी जगत की छवि के बारे में लिखते हैं, आतंकवादी धर्म, ख़ून के प्यासे, पश्चिम के लिए ख़तरा और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने वाले हैं। यह किताब 1996 में प्रकाशित हुई थी, इसके प्रकाशन के दो दशकों के बाद भी पश्चिमी मीडिया इस्लाम के विरुद्ध प्रचार में लगा हुआ है। मीडिया इस्लाम और आतंकवाद को जोड़कर दिखाता है।

यूरोप की ओर बड़ी संख्या में मुस्लिम शरणार्थियों के पलायन के कारण भी अपने देशों की सुरक्षा को बहाना बनाकर, शरणार्थियों के विरुद्ध नीतियां बनाई जा रही हैं। पश्चिमी देशों की इस नीति ने दक्षिणपंथी गुटों के लिए मुसलमानों के ख़िलाफ़ गतिविधियों के लिए भूमि प्रशस्त की है। दक्षिणपंथी गुट विभिन्न प्रकार से इस्लाम और मुसलमानों का अपमान करते हैं। फ़्रांस, नीदरलैंड, डेनमार्क, जर्मनी औऱ यूरोप के कई अन्य देशों में पिछले कई वर्षों से क़ुरान और पैग़म्बरे इस्लाम (स) का अपमान किया जा रहा है।

इस अपमान पर जब मुसलमान प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का राग अलापा जाता है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब धार्मिक विश्वासों का सम्मान, पश्चिमी लिबरल डेमोक्रेसी के सिद्धांतों में शामिल है। पश्चिमी सरकारें और मीडिया अपने हित साधने के लिए जहां चाहते हैं, सिद्धांतों को कुचल देते हैं। मुसलमानों के ख़िलाफ़ पश्चिमी सरकारों और मीडिया के इस नकारात्मक प्रचार से सबसे अधिक लाभ दक्षिणपंथी पार्टियां उठाती हैं और मुसलमानों के शांतिपूर्ण जीवन में विघ्न डालती हैं।

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यूरोप में विदेशियों के विरोध का अर्थ इस्लाम का विरोध हो गया है। यह ऐसी स्थिति में है कि इस्लाम शांति का ध्वजवाहक है और मुसलमानों और ग़ैर मुसलमानों के बीच शांतिपूर्ण जीवन पर बल देता है। इस प्रकार के शांतिपूर्ण जीवन का उदाहरण ईरान और अन्य इस्लामी देशों में देखा जा सकता है। ईरान में अल्पसंख्यक, संसद में अपना प्रतिनिधि भेजते हैं। कुछ गुटों की चरमपंथी गतिविधियों को इस्लाम की शिक्षाओं से नहीं जोड़ा जा सकता।

दुर्भाग्यवश यूरोप के कुछ प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक इस्लामोफ़ोबिया के प्रसार में भूमिका निभा रहे हैं। यहां तक कि कुछ लोगों ने अपने इस दावे के लिए विचारधारा तैयार करने और इसे इतिहास से जोड़ने का प्रयास किया है। वे भावनात्मक एवं प्रभावी बयानों द्वारा इस्लाम, क़ुरान और मुसलमानों को लोगों को हत्यारा ठहराने का प्रयास करते हैं। पश्चिम के यह विद्वान जो राजनीतिक डिबेट करते हैं और इस संदर्भ में जो कुछ लिखते हैं, पश्चिमी जनता उस पर ध्यान देती है। मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने वालों में ओवरियाना फ़लाची का नाम लिया जा सकता है।

नाइन इलेवन की घटना के बाद, इतालवी लेखक फ़लाची ने इस्लाम और अरब संस्कृति के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और पश्चिम वासियों को कड़ी प्रतिक्रिया न दिखाने के लिए फटकार लगाई। उनकी जो किताबें प्रकाशित हुई हैं, उनमें यूरोपीय संस्कृति की रक्षा और इस्लाम से मुक़ाबले पर बल दिया गया है। 2005 में उन्होंने अपनी अंतिम किताब में यूरोपीय देशों को अपनी पहचान की सुरक्षा न कर पाने के लिए फटकार लगाई और यूरोप की वर्तमान स्थिति की 1938 से तुलना की। फ़लाची ने इस तुलना में नए शब्द इस्लामवादी नाज़ियों का प्रयोग किया। इसी प्रकार उन्होंने इस्लाम के साथ वार्ता के लिए पॉप जान पाल द्वितीय की आलोचना की और नए पाप की नीतियों की प्रशंसा की। फ़लाची ने अपनी प्रसिद्ध किताब में मुसलमानों को ऐसे अंहकारी और धार्मिक विद्रोहियों के रूप में परिचित करवाया है, जो इटली के ईसाई समाज का विनाश कर सकते हैं। यूरोप में इस किताब को काफ़ी लोकप्रियता प्राप्त हुई। इसके प्रकाशित होने के शुरू के कुछ ही दिनो में 15 लाख प्रतियां बिक गईं। इस प्रकार का इस्लाम विरोधी वातावरण तैयार करने से दक्षिणपंथी गुटों और पार्टियों ने लाभ उठाया। अगर यह गुट और पार्टियां सत्ता में पहुंचते हैं तो यह पूरे यूरोप की शांति और विभिन्न धर्मों के अनुयाईयों के बीच शांतिपूर्ण जीवन की व्यवस्था के लिए गंभीर ख़तरा होंगे। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद, यूरोप से घृणा और नफ़रत को जड़ से उखाड़ फेंकने के प्रयासों को हानि पहुंचाई है।