इस्लामी जगत-10
आपको अवश्य याद होगा कि पिछले कई कार्यक्रमों में हमने मुसलमानों के बीच फूट व मतभेद और उनके कमज़ोर होने के कारणों और इसी प्रकार सुन्नी धर्मगुरूओं की दृष्टि से उनके मुकाबले के मार्गों का उल्लेख किया था।
इस्लामी जगत में एकता से संबंधित बहसों का संबंध मुख्यरूप से 150 वर्ष पुराना है और ये बहसें मुख्यरूप से उन साम्राज्यवादी दबावों व युद्धों की प्रतिक्रिया थीं जो पश्चिम और इस्लामी जगत के मध्य होती थीं परंतु शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य मतभेद और इन मतभेदों को दूर करने हेतु प्रयासों का भी लंबा अतीत है। “अलग़दीर” किताब के महत्व व स्थान के दृष्टिगत इस कार्यक्रम में हम शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य मौजूद कुछ मतभेदों की ओर संकेत करेंगे और साथ ही इन मतभेदों को दूर करने के लिए शीया धर्मगुरूओं विशेषकर अलग़दीर किताब के लेखक की ओर से किये जाने वाले प्रयासों और ग़दीरे ख़ुम घटना की समीक्षा करेंगे।
इसी तरह हमने इससे पहले वाले कार्यक्रम में संकेत किया था कि शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य मतभेदों का संबंध इस्लाम के आरंभ से है और पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी के चयन के संबंध में होने वाली बहसों के साथ इसका आरंभ हुआ परंतु जिस समय सत्ता की बाग़डोर बनी उमय्या ने ली उसने इन मतभेदों को हवा दी। बनी उमय्या की सरकार से पहले तक लगभग ये मतभेद मुख्यरूप से मुसलमानों के मध्य विवाद का कारण नहीं बनते थे परंतु बनी उमय्या ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों और शीयों से खुलकर दुश्मनी की और यह चीज़ शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य मतभेदों के गहरा होने का कारण बनी और हिंसात्मक घटनाएं अस्तित्व में आईं।
वास्तव में बनी उमय्या ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों और शीयों के अपमान की बुनियाद रखी। अब्बासियों के दौर में भी शीयों और अलवियों पर दबाव में अधिक वृद्धि हो गयी जबकि अब्बासी स्वयं को पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के वंश से जोड़ते व समझते थे। बनी अब्बासी अलवी नारों और शीयों के अनुसार विचारों के बल पर सत्ता में आये परंतु कुछ समय के बाद राजनीतिक लालच और हितों के कारण उन्होंने शीयों के विरोध की बुनियाद रखी और अलवियों की हत्या की प्रक्रिया आरंभ कर दी। उनका यह कार्य मतभेदों के गहन होने का कारण बना और इराक के बसरा और कूफा नगरों से इस्लामी जगत के दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच गया। बनी अब्बासी शीया धर्म के विरोधी लोगों की वित्तीय सहायता करते थे ताकि शीयों को यातना दे सकें। अलबत्ता उनकी यह कार्यवाहियां निरुत्तर नहीं रहीं और शीयों ने भी उनकी कुछ कार्यवाहियों का जवाब दिया।
इन सबके बावजूद शीया विद्वान व धर्मगुरू भी सुन्नी धर्मगुरूओं की भांति इस्लामी जगत में एकता के पक्षधर थे और इसीलिए वे सुन्नी धर्मगुरूओं के पीछे नमाज़ पढ़ने और उनके बीमारों का हाल- चाल पूछने की सिफारिश करते थे। इसी तरह शीया धर्मगुरूओं ने सुन्नी मुसलमानों के साथ अपने धार्मिक मतभेदों को कम करने का बहुत प्रयास किये।
इस आधार पर दावा किया जा सकता है कि शीया मुसलमानों पर जो अत्याचार किये गये उन सबके बावजूद वे सदैव मुसलमानों और इस्लामी जगत में एकता के पक्षधर थे और शीया धर्मगुरूओं और बुद्धिजीवियों ने समस्त कालों में सुन्नी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीवियों के साथ मतभेद के कुछ मामलों को समाप्त करने और शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य एकता को अधिक करने का प्रयास किया। उदाहरण स्वरूप जब चौथी और पांचवी शताब्दी में कुछ शाफेई और हनफी धर्मगुरूओं ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बारे में किताबें लिखकर अतीत में हुए अत्याचारों की भरपाई करने का प्रयास किया तो छठीं शताब्दी में शहरे रय में अब्दुल जजील क़ज़वीनी राज़ी जैसे कुछ शीया धर्मगुरूओं ने सुन्नी मुसलमानों के संबंध में शीयों में पाई जाने वाली तीव्रता को कम करने का प्रयास किया। अब्दुल जलील कज़वीनी एक शीया विचारक थे जो लगभग 560 हिजरी कमरी में ईरान के रय शहर में रहते थे जो उस समय शीया आवासीय केन्द्रों में से एक था। अब्दुल जलील कज़वीनी उन लोगों में से पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने शीया और सुन्नी मुसलमानों के मध्य एकता की बात की और दोनों समुदायों के मध्य दूरी को कम करने का बहुत प्रयास किया।
उन्होंने “अन्नक़ज़” नामक किताब में “बाअज़ो फज़ाएहे अर्रवाफिज़” किताब की समीक्षा शुरू की और शीया मुसलमानों के बारे में सुन्नी मुसलमानों की कुछ अतिवादी आस्थाओं पर टीका- टिप्पणी की और राजनीतिक दृष्टि से कुछ शीयों के दृष्टिकोणों को संतुलित किया। राजनीतिक दृष्टि से भी उन्होंने शीयों को समय की सलजूकियों की सरकार से निकट करने का प्रयास किया।
शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य एकता की आवश्यकता और मध्य शताब्दी में ईरानी इतिहास में मुसलमानों के मध्य एकता को व्यवहारिक बनाने की दिशा में वैचारिक दृष्टि से अब्दुल जलील क़ज़वीनी एक महत्वपूर्ण सिद्धांतवादी थे परंतु वह एकमात्र शीया विद्वान और बुद्धिजीवी नहीं हैं जिन्होंने यह विचार पेश किया। इस संबंध में ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि छठी, सातवीं और आठवीं शताब्दी में सूफीवाद ने भी मुसलमानों के मध्य एकता में बहुत सहायता की। सूफियों के मध्य धार्मिक पक्षपात की संवेदनशीलता न होने के कारण शीया और सुन्नी मुसलमानों के निकट होने की उचित भूमि प्रशस्त हो गयी और वे इस बात का कारण बने कि शीया धर्मगुरू व विद्वान इस संबंध में अधिक सक्रिय भूमिका निभायें। सातवीं शताब्दी और मंगोल सत्ताकाल में एक प्रख्या शीया धर्मगुरू खाजा नसीरुद्दीन तूसी स्वयं को सरकार के निकट कर सके और उसी काल में मराग़े में उन्होंने एक वेधशाला का निर्माण करके शीया व सुन्नी मुसलमान विद्वानों व विचारकों के एक गुट को एकत्रित किया और किसी के साथ किसी प्रकार के भेदभाव के बिना सबको अपने विचारों को प्रकाशित करने की भूमि प्रशस्त की और अनुमति दी।
एक बड़े शीया धर्मगुरू अल्लामा हिल्ली हैं जो एक प्रकार से खाजा नसीरुद्दीन तूसी के शिष्य हैं और शीया धर्मशास्त्र को समृद्ध बनाने में उनके विचार बहुत मूल्यवान थे और वह उन लोगों में से एक थे जिन्होंने शीया और सुन्नी मुसलमानों के मध्य धार्मिक मतभेदों को कम करने के लिए बहुत प्रयास किये हैं।
शीया धर्मगुरूओं, विद्वानों और विचारकों की ओर से मुसलमानों के मध्य एकता के लिए किये गये इतने सारे प्रयासों के बावजूद कुछ ने अल्लामा अमीनी जैसे शीया धर्मगुरू और विद्वान की अपने धर्म के बचाव में तार्किक बातों को मतभेदों को हवा देने वाली बातों की संज्ञा दी है। अल्लामा अमीनी ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इमामत को सिद्ध करने के लिए अरबी भाषा में कई खंडों पर आधारित अलग़दीर नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी है जिसे कुछ शीया धर्म की सत्यता सिद्ध करने की सबसे विश्वसनीय किताब मानते हैं। अल्लामा अमीनी ने इस किताब में पैग़म्बरे इस्लाम के 110 साथियों और उनके साथियों के 84 साथियों के हवाले से हदीसे ग़दीर को लिखा है और दूसरी से 14वीं शताब्दी तक हदीसे ग़दीर का उल्लेख करने वाले 360 इतिहासकारों व रावियों को गिनवाया है और अंत में वह इस विषय के बारे में विभिन्न शायरों के शेरों का भी वर्णन करते हैं। अल्लामा अमीनी ने अलग़दीर किताब को लिखने के लिए इराक, भारत, पाकिस्तान, मोरक्को और मिस्र सहित दुनिया के कई दूसरे देशों की यात्रा की और वहां के पुस्तकालयों से लाभ उठाया।
उदाहरण स्वरूप अल्लामा अमीनी ने अलग़दीर किताब के तीसरे खंड में मोहम्मद रशीद रज़ा के उस आरोप का उत्तर दिया है जिसमें उसने कहा है कि जब मुसलमानों को कोई पराजय मिलती है तो शीया मुसलमान उस पर खुश होते हैं यहां तक कि जब ईरान में मुसलमानों के मुकाबले में रूसियों को विजय मिली तो शीयों ने खुशी मनाई। यह निराधार आरोप मोहम्मद रशीद रज़ा जैसे लोगों ने शीयों पर लगाये हैं और मुख्यरूप से ईरान और इराक के शीया इसके लक्ष्य हैं जबकि इन दोनों देशों के शीया और इसी प्रकार इन देशों की यात्रा पर आने वाले पूर्वी मामलों के विशेषज्ञ, पर्यटक और इस्लामी एवं गैर इस्लामी देशों के प्रतिनिधियों को इस बात की कोई जानकारी नहीं है। किसी प्रकार के अपवाद के बिना शीया समस्त मुसलमानों और ग़ैर मुसलमानों की जान- माल को महत्व देते और उसका सम्मान करते हैं और जब भी दुनिया के किसी कोने में इस्लामी जगत में किसी संप्रदाय के लिए कोई मुसीबत आती है तो शीया दुःखी होते हैं। जिस भाई- चारे का उल्लेख पवित्र कुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम की परम्परा में किया गया है शीया उसे कभी भी शीयों तक सीमित नहीं समझते हैं और इस संबंध में वह शीया-सुन्नी मुसलमानों के मध्य किसी प्रकार के अंतर को नहीं मानते हैं।
अल्लामा अमीनी इसी प्रकार अलग़दीर किताब के तीसरे खंड के अंत में चौथी और पांचवीं शताब्दी और इसी प्रकार पांचवी शताब्दी के कुछ विद्वानों व धर्मगुरूओं की कई किताबों पर टीका- टिप्पणी करते हुए कहते हैं” इन किताबों पर टीका -टप्पणी करने से मेरा उद्देश्य यह है कि इस्लामी क़ौम व समुदाय को खतरे से अवगत करूं और उन्हें जागरुक बनाऊं कि इन किताबों से इस्लामी समाज को बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि इनसे इस्लामी एकता को नुकसान पहुंचता है मुसलमानों की पंक्तियां बिखर जायेंगी कोई भी चीज इन किताबों से अधिक मुसलमानों की एकता को नुकसान नहीं पहुंचायेगी, उनके मध्य एकता को समाप्त नहीं करेंगी और इस्लामी भाई चारे के रिश्ते को नहीं तोड़ेगी।“
अल्लामा अमीनी को अलग़दीर किताब लिखे जाने के कारण मिस्र की ओर से एक प्रशंसापत्र मिला है जिसके उपलक्ष्य में अल्लामा अमीनी ने अलग़दीर किताब के पांचवें खंड की प्रस्तावना में इस्लामी एकता के संबंध में अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह स्पष्ट किया है और लिखा है कि धर्म के बारे में आस्था और विचार पूरी तरह आज़ाद हैं और कुरआन ने जिस इस्लामी भाई-चारे की बात की है उससे वह नहीं टूटता। यद्यपि शैक्षिक और धार्मिक बहसें अपने चरम बिन्दु पर पहुंच जायें क्योंकि पूर्वजों उनमें सर्वोपरि पैग़म्बरे इस्लाम के साथी और उनके साथियों के साथियों की जीवन शैली यही रही है। अतः इस्लामी जगत के लेखक समस्त धार्मिक मतभेदों के बावजूद एक व्यापक समानता भी रखते हैं और वह ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान है। समस्त मुसलमानों के दिलों में एक चीज़ के प्रति निष्ठा है और वह इस्लाम है। अल्लामा अमीनी अलग़दीर किताब के आठंवें खंड में “अलग़दीर यूजदो अस्सुफूफो फील मलइस्लामी” शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तावना में सीधे यह बहस करते हैं कि इस्लामी एकता के संबंध में उनकी किताब अलग़दीर की भूमिका क्या है और उन लोगों के इस आरोप को कड़ाई से रद्द करते हैं जो यह कहते हैं कि अलगदीर किताब मुसलमानों के मध्य अधिक मतभेद का कारण बनेगी और वह सिद्ध करते हैं कि इस आरोप के विपरीत अलगदीर किताब बहुत सी भ्रांतियों व गलत फहमियों को समाप्त कर देगी और मुसलमानों के एक दूसरे के निकट होने का कारण बनेगी।