इस्लामी जगत-11
हमने शिया धर्मगुरूओं तथा विद्वानों की दृष्टि से मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के दृष्टिकोणों की समीक्षा की थी।
इस बारे में हमने वरिष्ठ शिया धर्मगुरू अल्लामा अमीनी की पुस्तक अलग़दीर की भूमिका का भी उल्लेख किया था। हमने यह भी बताया था कि आरंभ से ही शिया समुदाय पर होने वाले निरंतर अत्याचारों के बावजूद शिया धर्मगुरूओं तथा विद्वानों ने सदैव ही मुसलमानों के बीच एकता पर बल दिया है। उनका यह प्रयास रहा है कि अन्य मुस्लिम संप्रदायों के साथ वार्ता के माध्यम से मतभेद फैलाने वाली बातों को दूर किया जाए ताकि पूरे इस्लामी जगत में एकता स्थापित हो सके। पिछले कार्यक्रम में हमने अल्लामा अमीनी की पुस्तक अलग़दीर पर समीक्षात्मक दृष्टि डालने के बाद यह बताया था कि इस पुस्तक ने मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आइए अब मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के बारे में इमाम ख़ुमैनी के विचारों की समीक्षा करते हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति को सफल बनाने वाले एवं इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी एक महान समाजसुधारक भी थे। सैयद जमाल जैसे महान समाज सुधारकों की ही भांति इमाम ख़ुमैनी ने भी मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के उद्देश्य से अथक प्रयास किये। उनकी गणना उन गिने-चुने महान विचारकों में होती है जिन्होंने मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के उद्देश्य से इस्लामी शासन व्यवस्था का गठन किया। इमाम ख़ुमैनी ने अपने जीवनकाल में मुसलमानों के बीच एकता की स्थापना के विचार को अधिक प्रचारित किया जिससे मुसलमान देशों के शासकों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गईं। क्योंकि वे अपने जीवन के अन्तिम समय में मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहे इसलिए मुसलमनों के हर संप्रदाय में इमाम ख़ुमैनी को विशेष महत्व प्राप्त था और लोग उनका बहुत सम्मान करते थे।
इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि मुसलमानों के बीच एकता, एसा विचार है जिसका उल्लेख पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों में भी मिलता हैं उनका कहना था कि यह एकता, परस्पर विचारों के सम्मान और एक-दूसरे के प्रति प्रेम पर आधारित है। अपनी एक पुस्तक चेहल हदीस में वे लिखते हैं कि ईश्वरीय दूतों का एक महान लक्ष्य, लोगों को एकेश्वरवाद की शिक्षा देते हुए एकता स्थापित करना है ताकि आदर्श नगर का गठन हो सके। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि यह लक्ष्य एकता के बिना स्थापित नहीं हो सकता जिसके लिए आपस में भाईचारे की आवश्यकता है। उनका कहना था कि इसका केन्द्र इस्लाम है। वे कहते हैं कि इस्लाम के उदय के काल में मुसलमानों की इज़्ज़त और वीरता का कारण यही एकता थी। वे कहते हैं कि उस काल के मुसलमानों ने जो मान-सम्मान प्राप्त किया उसके पीछे इस्लामी एकता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि इस्लामी जगत में एकता को क्षति पहुंचाने वाले दो मुख्य कारक हैं। पहला कारक, सरकारों और जनता के बीच दूरी और मुसलमान देशों के शासकों के आपसी मतभेद। इस बारे में वे कहते हैं कि हम और मुसलमान सब यह जानते हैं कि हमारी जो समस्याए हैं वे इन्हीं दो कारणों से हैं। इमाम ख़ुमैनी ने कहा कि सरकारों ने राष्ट्रों के साथ इस प्रकार से व्यवहार किया है कि वे उनके समर्थक नहीं रहे। वास्तविकता तो यह है कि जब सरकारों के लिए मुश्किल समय आए तो जनता आगे बढ़े किंतु सरकारों के जनता के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण जनता उनका समर्थन नहीं करती।
इमाम ख़ुमैनी का मानना है कि मुसलमानों विशेषकर इस्लामी देशों के बीच मतभेद फैलाने में विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियों की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इमाम खुमैनी कहते हैं कि मुसलमान देशों के वर्तमान मतभेद या तो इन देशों के शासकों के विश्वासघात के कारण हैं या फिर उनकी अज्ञानता के कारण हैं। वे कहते हैं कि मुसलमानों के बीच शिया और सुन्नी नाम का कोई भी मतभेद नहीं है बल्कि यह वर्चस्ववाद की देन है। इमाम खुमैनी का कहना है कि इस्लाम में जातीय मतभेदों को भी कोई स्थान प्राप्त नहीं है अतः इस प्रकार के विषयों को उछालना ही नहीं चाहिए। इमाम ख़ुमैनी के अनुसार मुसलमान आपस में एक-दूसरे के शत्रु नहीं बल्कि भाई हैं। वास्तव में शत्रु तो कोई और है जिसे अनदेखा किया जा रहा है। सुन्नी और शिया मुसलमान, एक-दूसरे के भाई हैं जिन्हें हर प्रकार के मतभेदों से बचना चाहिए। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि मुसलमानों के मतभेद उन लोगों के हित में हैं जो इस्लाम के शत्रु हैं। वे कहते हैं कि एसे लोग न तो सुन्नी हैं और न ही शिया। वे न तो सुन्नी धर्म को मानते हैं और न ही शिया को बल्कि वे इस्लाम को ही स्वीकार नहीं करते। इस प्रकार के लोग मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।
इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि सुन्नी-शिया मतभेद फैलाने में अमरीका और इस्राईल सबसे आगे हैं। उन्होंने समस्त मुसलमानों का आह्वान किया कि वे इस्लाम के इन संयुक्त शत्रुओं विशेषकर इस्राईल के मुक़ाबले में एकजुट जो जाएं। उनका कहना है कि इस्राईल जैसे मुसलमानों के संयुक्त शत्रु का अस्तित्व ही मुसलमानों के बीच एकता का प्रमुख कारण है किंतु इसके बावजूद मुसलमानों के बीच एकता स्थापित न होना बड़े खेद की बात है।
इमाम ख़ुमैनी का कहना था कि यह बात मेरे लिए एक पहेली बनी हुई है कि सारे इस्लामी देश और राष्ट्र जानते हैं कि हमारा दर्द क्या है? वे यह भी जानते हैं कि हमारे बीच मतभेद फैलाने में विदेशियों का हाथ है। उन्हें यह भी भलिभांति ज्ञात है कि मतभेदों ने मुसलमानों को कितनी क्षति पहुंचाई है। उन सबको पता है कि उनके बीच एक अवैध शासन अस्तित्व पा चुका है। इतना सब होने के बावजूद मुसलमान इतना असहाय क्यो हैं? इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि उन्हें बीमारी और उसके उपचार दोनो का ज्ञान है उसके बावजूद वे इलाज क्यों नहीं करते? इमाम ख़ुमैनी विश्व के सभी मुस्लिम शासकों का आह्वान करते हैं कि वे इस्लामी जगत में एकता स्थापित करने के लिए प्रयास करें।
वे कहते हैं कि यह वह समय है कि जब आप अपने आंशिक मतभेदों को दूर करके एकजुट हो जाइए। आप इस्लाम का अनुसरण कीजिए। शासकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे एकसाथ बैठकर मतभेदों का समाधान करें। आपको अपने उस संयुक्त शत्रु के मुक़ाबले में एकजुट हो जाना चाहिए जो आपको लगातार नुक़सान पहुंचा रहा है और लगातार मतभेद फैला रहा है।
इमाम ख़ुमैनी ने मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने के लिए जो प्रस्ताव पेश किया है वह यह है कि मुस्लिम समाज के धर्मगुरू और विद्वान दोनों मिलकर एकता स्थापित करने के लिए निःस्वार्थ भाव से प्रयास करें ताकि महान इस्लामी सरकार का गठन हो सके। वे कहते हैं कि इस बारे में दो प्रकार की नीतियों को अपनाया जा सकता है। सांस्कृतिक तथा आस्था संबन्धी नीति, राजनैतिक व व्यवहारिक नीति। उनका कहना था कि पहले चरण में मुसलमानों के बीच प्रचलित कुरीतियों को दूर करके उन्हें सच्चे इस्लाम की ओर लाया जाए। इमाम ख़ुमैनी का कहना है कि एक तो वास्तविक इस्लाम है जबकि इसके मुक़ाबले में एक अमरीकी इस्लाम भी है। वे अमरीकी इस्लाम का खुलकर विरोध करते हैं। उनका मानना था कि बहुत से इस्लामी देशों के शासकों की ग़ैर इस्लामी विचारधारा के कारण मुसलमानों के बीच एकता गठित करने के मार्ग में रुकावटें आ रही हैं क्योंकि यह शासक अमरीकी इस्लाम का अनुसरण कर रहे हैं।
इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि उचित वातावरण उत्पन्न करके वास्तविक एकता के गठन के लिए बड़ी ही गंभीरता से प्रयास किये जाने चाहिए ताकि इस मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने एकता के मार्ग में आने वाली बाधाओं का विस्तार से उल्लेख करते हुए उनका समाधान भी प्रस्तुत किया है। एकता सप्ताह और विश्व क़ुद्स दिवस इन्ही समाधानों में सम्मिलित हैं।