Feb १५, २०१७ १२:०१ Asia/Kolkata

हमने इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के विचार में इस्लामी एकता की अहमियत के बारे में आपको बताया।

आपको यह भी बताया कि इमाम ख़ुमैनी की नज़र में मुसलमानों के बीच एकता स्ट्रैटिजिक अहमियत रखती है और उन्होंने इसे व्यवहारिक बनाने के लिए दो चरण पेश किये हैं। एक सांस्कृतिक व वैचारिक चरण और दूसरा राजनैतिक व व्यवहारिक चरण। उन्होंने इस्लामी जगत और मुसलमानों पर शासन कर रही सरकारों की वैचारिक व नैतिक मुश्किलों को समझते हुए, इस्लामी एकता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे पहले मुसलमानों में धार्मिक व राजनैतिक दृष्टि से सुधार लाने और वास्तविक इस्लाम को आधार बनाने का सुझाव दिया है। इसी प्रकार हमने इस बात का भी उल्लेख किया कि इमाम ख़ुमैनी अमरीकी इस्लाम को इस्लामी एकता के मार्ग में रुकावट बताते हुए उसके ख़िलाफ़ डट गए।

इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि इस्लामी समाज में मूल बदलाव और मुसलमानों को फूट से निकालना, बुनियादी कार्यक्रम के बग़ैर मुमकिन नहीं है क्योंकि इस्लामी जगत की अनुचित स्थिति के पीछे वैचारिक व सांस्कृतिक पतन और उन पर साम्राज्यवादी शक्तियों के वर्चस्व सहित बहुत से कारण हैं। वह साम्राज्य जो इस्लामी जगत की वैचारिक व सांस्कृतिक पहचान को मिटाने और उसके प्राकृतिक स्रोतों को लूटने के लिए क़दम उठाता है, इसलिए इस स्थिति से निकलना और आदर्श स्थिति तक पहुंचना सिर्फ़ वैचारिक, सांस्कृतिक व वैचारिक पतन को दूर करने पर निर्भर है। इस काम के लिए इस्लामी सरकारों व राष्ट्रों की सभी संभावनाओं को एक स्पष्ट व व्यापक नीति के तहत संगठित करना बहुत ज़रूरी है। इस आधार पर इस्लामी जगत एक इकाई के रूप में सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पहचान की ओर पलटने को अपना उद्देश्य बनाकर धार्मिक व राष्ट्रीय पहचान के तत्वों को चिन्हित करे और उसे अपनी पहचान का हिस्सा बनाए। इमाम ख़ुमैनी की नज़र में वैचारिक व सांस्कृतिक आंदोलन चलाना, जिसके नतीजे में आम लोगों के स्तर पर संयुक्त विचार फैलेगा, धर्मगुरुओं व धार्मिक बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी है। 

इमाम ख़ुमैनी इस्लामी जगत में फूट का कारण इस्लामी राष्ट्रों व सरकारों की इस्लामी शिक्षाओं से दूरी और पूरब व पश्चिम की साम्राज्यवादी शक्तियों पर मुसलमानों की निर्भरता को मानते हुए इस समस्या से निकलने का रास्ता इस्लाम, आज़ादी और स्वाधीनता जैसे तीन मूल अर्थ में ढूंढते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इन तीन मार्गों से भुलाई जा चुकी इस्लामी पहचान फिर से हासिल होगी। यही कारण है कि इमाम ख़ुमैनी धार्मिक मदरसों व केन्द्रों, विशेष रूप से धर्मगुरुओं व धार्मिक बुद्धिजीवियों से धार्मिक शिक्षाओं और ख़ास तौर पर इन तीन उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मैदान में आने की अपील करते हैं। इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि इस्लामी शिक्षाओं का लागू होना इस्लामी सरकार के गठन पर निर्भर है और इस्लामी समाज की पीड़ाओं का निवारण शुद्ध मोहम्मदी इस्लाम पर अमल करने में निहित है। शुद्ध इस्लाम ही वह तत्व है जो मुसलमानों के बीच एकता ला सकता है चाहे मुसलमान किसी भाषा, राष्ट्र और जाति से संबंध रखता हो। इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि शुद्ध इस्लाम ऐसा वैचारिक व व्यवहारिक तंत्र है जो पूरी तरह समृद्ध है और मानव जीवन से जुड़े हर आयाम इसमें मौजूद हैं। शुद्ध इस्लाम अपनी विश्वव्यापकता व आकर्षण और राष्ट्रों में मौजूद गहरे वैचारिक आधार के ज़रिए इस्लामी एकता की प्राप्ति की क्षमता रखता है और अगर इसे सही ढंग से पेश किया जाए तो यह मुसलमानों में इस्लामी जगत की शान को फिर से लौटा सकता है।     

आज़ादी भी इमाम ख़ुमैनी की ओर से पेश की गयी वैचारिक व्यवस्था में मूल स्तंभ की हैसियत रखती है जो इस्लामी एकता के लिए ज़रूरी है क्योंकि इस्लामी सरकारों पर महा इस्लामी जगत के मूल स्तंभ को क़ायम करके इसके उद्देश्य की प्राप्ति की मुख्य ज़िम्मेदारी है। महा-इस्लामी सरकार के स्तंभ के पुनर्निर्माण और विगत की एकता व शान को वापस लाकर मुसलमान जनता के मतों पर आधारित सरकार के गठन में बहुत अहम योगदान दे सकते हैं, ऐसी सरकारें जो न तो उद्दंड हों और न ही अत्याचार करें क्योंकि इस्लामी देशों में मौजूद अत्याचारी शासन व सरकारें ही इस्लामी जगत के बीच एकता में मुख्य रूप से रुकावट हैं। इसलिए जन-विरोधी शासन के चंगुल से रिहाई, इमाम ख़ुमैनी के एकता के विचार के मूल स्तंभ में शामिल है। इमाम ख़ुमैनी इस्लामी सरकार के गठन के लिए पृष्ठिभूमि मुहैया करने के लिए उद्दंडी शासनों को गिराने पर बल देते हुए कहते हैं, “उद्दंडी अर्थात उन ग़लत शक्तियों को उखाड़ फेंकना है जो पूरे इस्लामी जगत में मौजूद हैं। अत्याचारी व जन-विरोधी सरकारी तंत्र के स्थान पर जनसेवा प्रदान करने वाली संस्थाएं व संगठन हों और उन्हें इस्लामी क़ानून के अनुसार संचालित किया जाए और धीरे-धीरे इस्लामी सरकार का गठन हो।”

स्वाधीनता वह तीसरा बिन्दु है जो इमाम ख़ुमैनी के इस्लामी जगत में एकता के विचार में स्तंभ की हैसियत रखता है। स्वाधीनता से जागरुकता, आत्म-पहचान और पूर्वी व पश्चिमी शक्तियों के वर्चस्व से इस्लामी जगत की रिहाई हासिल होगी। इमाम ख़ुमैनी बल देते हैं कि ईश्वर ने किसी भी नास्तिक को मुसलमानों पर वर्चस्व की इजाज़त नहीं दी है इसलिए मुसलमानों को इस वर्चस्व को स्वीकार नहीं करना चाहिए। उनका मानना है कि स्वाधीनता आंतरिक व विदेशी स्तर पर ज़रूरी है और विदेशी स्तर पर स्वाधीनता के लिए आंतरिक स्वाधीनता पूर्व शर्त है क्योंकि आंतरिक स्वाधीनता के बिना अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्वाधीन नहीं हो सकते। इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि मुसलमान राष्ट्रों को चाहिए कि स्वाधीनता की प्राप्ति की दिशा में सबसे पहला क़दम इस्लामी मूल्यों के आधार पर ख़ुद की ओर पलटने के लिए उठाएं और फिर उसके बाद इस्लामी देशों से साम्राज्य को निकालने की कोशिश करें। उनका मानना है कि पीड़ित व कमज़ोर राष्ट्रों की साम्राज्वादियों पर सबसे ख़तरनाक निर्भरता वैचारिक निर्भरता है जो बाक़ी दूसरी प्रकार की निर्भरता का आधार बनती है और जब तक कोई राष्ट्र वैचारिक दृष्टि से स्वाधीन नहीं होगा दूसरे आयाम से स्वाधीन नहीं हो पाएगा।

इमाम ख़ुमैनी का मानना था कि मुसलमानों के बीच एकता के उपायों में से एक यह है कि धर्मगुरु, नेता और बुद्धिजीवी प्रचारिक आधार को मज़बूत व विस्तृत करें। इमाम ख़ुमैनी का मनना था कि बुद्धिजीवियों को इस्लामी जगत के बीच सामाजिक संबंधों को मज़बूत व विस्तृत बनाने और लोगों के वैचारिक विकास के लिए सभी संभावनाओं व स्रोतों को इस्तेमाल करना चाहिए। मिसाल के तौर पर इस संदर्भ में इमाम ख़ुमैनी राष्ट्रीय स्तर पर जुमे की नमाज़ के आयोजन की क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हज के संस्कार से फ़ायदा उठाने पर बहुत बल देते थे। इमाम ख़ुमैनी धार्मिक सभाओं के वैचारिक व सामाजिक आयाम से गहरे प्रभाव से भलिभांति अवगत थे। वह धार्मिक समारोहों पर सिर्फ़ उसके प्रशैक्षिक आयाम के मद्देनज़र बल नहीं देते थे बल्कि इससे भी अहम समाज के गठन और नए सामाजिक संबंध का स्वरूप बनाने में इसके योगदान पर बल देते थे। इसलिए इस्लामी जगत के दो प्रतीक के रूप में ‘एकता सप्ताह’ और ‘क़ुद्स दिवस’ के आयोजन का इमाम ख़ुमैनी ने सुझाव दिया जो क्रान्तिकारी एवं साम्राज्य विरोधी संदेश देते हैं।

इमाम ख़ुमैनी ने मुसलमानों में एकता के लिए विश्व स्तर पर दुनिया के मुसलमान राष्ट्र व इस्लामी देशों पर आधारित एक दल के गठन का सुझाव भी दिया। इस्लामी जगत में एकता के लिए हिज़्बुल्लाह और हिज़्बे मुस्तज़अफ़ीन इमाम ख़ुमैनी के राजनैतिक विचार में बुनियादी हैसियत रखते हैं। उनका मानना था कि एक इस्लामी दल का गठन मुसलमानों के आज के संकटग्रस्त दौर में आम लोगों की सुव्यवस्थित शक्ति का प्रतिबिंबन होगा। यही कारण था कि उन्होंने ‘हिज़्बे मुस्तज़अफ़ीन’ के विचार को राजनैतिक संगठन के रूप में पेश किया ताकि दुनिया भर के न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि पीड़ित लोग अपनी उद्देश्यपूर्ण राजनैतिक गतिविधियां इस नवगठित प्रक्रिया के भीतर समन्वित करें और इसके ज़रिए पहले से ज़्यादा अपने बीच एकता व समरसता को मज़बूत करें। इमाम ख़ुमैनी की नज़र में इस प्रकार के दल के गठन का उद्देश्य इस्लामी जगत के स्तर पर सामूहिक विचारों को मज़बूत करना और फिर इस्लामी जगत की मुश्किलों को हल करने का मार्ग ढूंढना और उसकी समीक्षा करना है। इस बारे में इमाम ख़ुमैनी ने कहा है, “मुझे उम्मीद है कि पूरी दुनिया में हिज़्बे मुस्तज़अफ़ीन के नाम से एक दल गठिन होगा जिसमें सभी पीड़ित शामिल होंगे, पीड़ितों के मार्ग में मौजूद मुश्किलों को दूर करेंगे, पूरब व पश्चिम के साम्राज्यवादियों के मुक़ाबले में उठ खड़े होंगे और दुनिया के पीड़ितों पर साम्राज्यवादियों को अत्याचार नहीं करने देंगे।”