इस्लाम और मानवाधिकार-30
हमने विचार और आस्था में आज़ादी के संबंध में कुछ तथ्य बयान किये थे।
इसी प्रकार यह कहा गया कि इस्लाम आज़ादी को आस्था का आधार मानता है। अगर इंसान सोच- विचार और अपनी बुद्धि का प्रयोग करके किसी मत को स्वीकार करता है तो इस्लाम की दृष्टि से वह मूल्यवान और प्रशंसनीय है और किसी को भी उस व्यक्ति पर दूसरा मत थोपने का अधिकार नहीं है। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता भी मूल्यवान और एसा अधिकार है जिसे छीना नहीं जा सकता और उसके सम्मान के लिए आस्था में आज़ादी का सम्मान आवश्यक है।
बोलना, मानव संभ्यता की विभिन्न पीढियों और समाजों के मध्य संपर्क का महत्वपूर्ण साधन है। हर व्यक्ति की बोल चाल उसकी वैचारिक और मानवीय पहचान का सूचक और सोचों, मूल्यों, आकांक्षाओं और भावनाओं को प्रबट करने का साधन है। वैज्ञानिक और राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न विचारों को पेश करना मानव समाजों की सोच के विकास का कारण बनता है और इसका समाज और व्यक्ति के लिए बहुत लाभ है। इस आज़ादी का छीन लेना सोचों और मानव ज्ञानों में ठहराव का कारण बनता है और समाज एवं व्यक्ति की परिपूर्णता बाधित होती है। अभिव्यक्ति व बयान की नेअमत से इंसान को रोबना इंसान के सबसे प्राकृतिक व स्वाभाविक अधिकार पर अतिक्रमण है और सबसे प्राकृतिक अधिकार से वंचित करना है। पूरे इतिहास में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सदैव ईश्वरीय आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है। मानवाधिकार के घोषणापत्र में आस्था और अभिव्यक्ति की आज़ादी को इंसान के मौलिक अधिकारों की पंक्ति में रखा गया है और समस्त राष्ट्रों को चाहिये कि उसका सम्मान करें और मानवाधिकार घोषणापत्र के 19वें अनुच्छेद में आया है कि हर व्यक्ति को आस्था और बोलने की आज़ादी प्राप्त है और इसमें यह बात नीहित है कि वह अपनी आस्था के कारण भयभीत न हो और जानकारी प्राप्त करना और दूसरे के विचारों से अवगत होना, उसे प्रकाशित करना उसका अधिकार है।
इस्लाम धर्म अभिव्यक्ति और कलम की स्वतंत्रता को हर इंसान का निश्चित अधिकार मानता है। पवित्र कुरआन में महान ईश्वर ने अपने बंदों पर एहसान किया और उन्हें बोलना सिखाया और कलम की प्रशंसा की है ताकि वह सभ्यताओं के पैदा होने, प्रगति व विकास का स्रोत, ज्ञानों की परिपूर्णता और इंसानों की सोच की जागरुकता का आधार बने। इस्लाम ने अभिव्यक्ति और कलम की स्वतंत्रता को पैगम्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी की घोषणा के आरंभ से महत्व दिया है और इस चीज को पवित्र कुरआन की उस आयत से समझा जा सकता है जो जबलुन्नूर पहाड़ और हेरा नामक गुफा में नाज़िल हुई थी और उसमें महान ईश्वर अपने दूत को पढ़ने के लिए कहता है। ईश्वर कहता है “उसने इंसान को कलम द्वारा शिक्षा दी और वह जो नहीं जानता था ईश्वर ने उसे सिखाया।“
इस शैक्षिक आंदोलन में विचारों के आदान- प्रदान की स्वतंत्रता नीहित है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि महान ईश्वर ने अभिव्यक्ति और कलम की आज़ादी को लोगों के मध्य समझ- बूझ का साधन करार दिया है ताकि एक दूसरे के लक्ष्यों से अवगत हो सकें और सोच में आज़ादी से कार्यों व वस्तुओं की वास्तविकता स्पष्ट हो जाये।
कलम और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लाभदायक होने के लिए इनसे लाभ उठाया जाना आवश्यक है। जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वर की ओर से इंसानों को शुभसूचना दी है कि ईश्वर के बंदे बातों को सुनते हैं और उनमें से वे बेहतरीन बातों का चयन करते हैं। यह, वह लोग हैं जिनका मार्गदर्शन ईश्वर ने किया है और वे वही बुद्धिमान लोग हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आम लोगों के मध्य उसके प्रचलित होने से सिद्धांतिक रूप से कोई समस्या अस्तित्व में नहीं आती है परंतु साम्राज्यवादी और तानाशाही समाजों व सरकारों के मुकाबले में स्वतंत्रता के साथ विचारों का बयान करना कोई सरल कार्य नहीं है और स्वतंत्र विचार रखने और बयान करने वालों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस्लाम इस प्रकार के घुटन के वातावरण को स्वीकार नहीं करता है। जैसाकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने समय के चापलूसों के संबंध में फरमाते हैं” मुझसे वह बात न करो जो अंकारियों को प्रसन्न करने के लिए कही जाती है और अपने क्रोध को मुझसे न छुपाओ और सहनशीलता और चापलूसी को मुझ से मिश्रित न करो। यह मत सोचो कि अगर मेरे बारे में सच कहोगे तो वह मेरे लिए कठिन होगा और यह मत सोचो कि मैं अपने आपको बड़ा दिखाना चाहूंगा। अगर कोई सही बात को, जो उससे कही गयी है या वह न्याय जो उसके समक्ष पेश किया गया है, कठिन समझता है तो निः संदेह उसके लिए सच और न्याय पर अमल करना अधिक कठिन होगा। तो सच कहने और न्याय के बारे में मुझ से परामर्श करने में परहेज़ न करो। अगर ईश्वर मुझे अपने आप पर नियंत्रण न देता उस प्रकार बेहतर व श्रेष्ठ नहीं हूं कि गलती से सुरक्षित रहूं और व्यवहार में भूल न हो। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समाज की सुरक्षा व स्वास्थ्य का रहस्य मानते हैं और अपने निष्ठावान कमांडर मालिके अश्तर से फरमाते हैं कि सार्वजनिक बैठक करके उन लोगों को अवसर दिया जाये जिन्हें न्याय की आवश्यकता है ताकि वे सशस्त्र सेना की बिना उपस्थिति और भय के बिना अपनी बात कह सकें।“
जैसाकि इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है उस कौम व समुदाय को अत्याचार से दूर नहीं किया जा सकता जिसमें कमज़ोरों के अधिकार को शक्तिशालि से न लिया जाये।“
बहुत अधिक हदीसें व रवायतें आयी हैं जो सच्चाई कहने की आवश्यकता को बयान करती हैं। यह हदीसें इस्लाम के उदयकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व की सूचक हैं। इसी प्रकार महान धार्मिक हस्तियों की जीवनी को पढ़कर इस बात को समझा जा सकता है कि वे न केवल बातों बल्कि व्यवहार में भी उस सीमा तक विरोधियों के विचारों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे जहां तक इससे समाज को कोई क्षति न पहुंचे। पैग़म्बरे इस्लाम सदैव उदारता के साथ विभिन्न विचारों के साथ व्यवहार करते थे और इस बात की अनुमति देते थे कि विरोधी किसी प्रकार के भय व चिंता के बिना अपने विचारों को बयान करें। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम को नर्म दिल और मृदुभाषी बताते हुए कहता है” अगर आप कड़े स्वभाव के होते तो लोग आपसे से दूर हो जाते।“
ईरानी बुद्धिजीवी उस्ताद शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी इस बारे में लिखते हैं दुनिया के इतिहास में आपने कब देखा कि जिस देश में सभी धार्मिक हों वहां दूसरे धर्म वालों को इतनी आज़ादी दें कि वे मस्जिद नबी में आयें या मक्के में बैठें और जिस तरह से उनका दिल कहे बात करें। ईश्वर का इंकार करें, पैगम्बर का इंकार करें, नमाज और हज को रद्द करें और कहें कि हम इन चीज़ों को नहीं मानते हैं। इस प्रकार की बातें केवल इस्लामी काल में थीं। इस प्रकार के नमूने इस्लामी इतिहास में भरे पड़े हैं। इसी आज़ादी के कारण था कि इस्लाम बाक़ी रह सका। अगर इस्लाम के उदयकाल में कोई आता और कहता कि मैं ईश्वर को नहीं मानता और उसके जवाब में कहा जाता कि इसे मारो और इसकी हत्या कर दो तो आज इस्लाम ही न होता। इस्लाम इस कारण बाकी रह गया कि उसने बहादुरी व साहस के साथ विरोधियों के विचारों का सामना किया है।“
यही परंपरा व शैली हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सरकार और दूसरे इमामों के काल में दिखाई देती है और इमामों ने काफिरों एवं अनेकेश्वरवादियों के साथ जो शास्त्रार्थ किये हैं उनमें से कुछ का वर्णन इतिहास में मिलता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने खवारिज नामक गुमराह गुट को जो राजनीतिक और सामाजिक आज़ादी दी थी उसकी मिसाल विश्व के वर्तमान में नहीं मिलती । खवारिज पूरी आज़ादी के साथ अपनी आस्थाओं को बयान करते थे और कुछ अवसरों पर मस्जिदे कूफा में हज़रत अली अलैहिस्सलाम को काफिर भी कहते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम खवारिज के साथ पूरी आज़ादी के साथ बहुत ही अच्छा और सुलझा व्यवहार करते थे। उनके हाथ में सरकार थी और वह हर प्रकार की कार्यवाही कर सकते थे परंतु उन्होंने खवारिज को जेल में बंद नहीं किया, उन्हें कोड़े नहीं मारे यहां तक कि राजकोष से दी जाने वाली सहायता भी बंद नहीं की। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनके साथ दूसरे लोगों जैसा व्यवहार किया।
इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह अर्थ नहीं है कि जिसका जो दिल चाहे उसे समाज में पेश करे चाहे वह समाज के लिए लाभदायक हो या हानिकारक। व्यवहारिक रूप से दुनिया की किसी भी व्यवस्था में बेरोक- टोक आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है और हर देश में आज़ादी की कुछ सीमाएं हैं और उसका अर्थ यह है कि आज़ादी सीमित है क्योंकि इस बात पर दुनिया के समस्त बुद्धिमान एकमत हैं कि इंसान को अपनी कथनी और करनी में पूरी तरह आज़ाद नहीं छोड़ जा सकता।
धार्मिक शिक्षाओं, मौलिक अधिकारों और विश्व के बहुत से बुद्धिजीवियों की दृष्टि से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उस समय अपनी विभिन्न उपयोगिता व लाभ देगी जब वह कानूनी परिप्रेक्ष्य में हो और तार्किक ढंग से उसे क्रियान्वित किया जाये। क्योंकि सीमा रहित व अनियंत्रित आज़ादी से व्यक्ति और समाज को विभिन्न प्रकार की हानि पहुंचती है। इस्लाम धर्म भी यद्यपि आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर है किन्तु वह सीमा रहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर नहीं है।