Feb २०, २०१७ ०८:४८ Asia/Kolkata

हमने ईरान के नवीं हिजरी क़मरी के विचारक, शायर, साहित्यकार, लेखक व राजनेता अमीर अलीशीर नवाई के बारे में आपको बताया।

एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हस्ती जिसने विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यवान सेवाएं दीं और अपनी याद के तौर पर बहुत सी यादगार रचनाएं छोड़ीं।

आपको यह भी बताया कि तैमूरी शासन काल ईरान में शासन करने वाले दूसरे शाही परिवार की तुलना में सबसे शानदार शासन काल था। तैमूरी शासन काल में कला व संस्कृति पर इतना ध्यान दिया गया कि कि यह दौर ईरान में कला व सभ्यता के इतिहास का उज्जवल दौर समझा जाता है। सत्ता के गलियारों में विद्वानों की मौजूदगी इस दौर की मुख्य विशेषता है। अमीर नेज़ामुद्दीन अलीशीर नवाई शासक हुसैन बायक़रा के विद्वान व कलाप्रेमी वज़ीर थे। अलीशीर नवाई उस दौर की बहुत अहम हस्तियों में गिने जाते थे।

हमने यह बताया कि इतिहासकारों ने अमीर अलीशीर नवाई की फ़ारसी और तुर्की में 30 से ज़्यादा किताबें गिनवायी हैं। इनमें से कुछ किताबें मौजूद हैं, कुछ दुर्लभ हैं और कुछ की प्रतियां मौजूद नहीं हैं। ग़ज़लों के चार दीवान, ख़मसा, लिसानुत्तैर मसनवी, तज़केरए मजालिसुन नफ़ाएस, मिनशअत पार्सी व तुर्की और फ़ारसी दीवान उनकी कुछ बची हुयीं किताबें हैं।

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हर कवि व सामाजिक कार्यकर्ता के व्यक्तित्व एवं उसकी किताब का उसके दौर की संस्कृति और सामाजिक व राजनैतिक वास्तविकता से बहुत निकट संबंध होता है। इसलिए अमीर अलीशीर नवाई की शायरी को समझने के लिए ज़रूरी है कि उनके दौर की साहित्यिक घटनाओं के साथ उनके निकट संबंध व समन्वय को भी मद्देनज़र रखा जाए। इसी प्रकार इस बिन्दु को भी मद्देनज़र रखना चाहिए कि वह अपने दौर की महत्वपूर्ण सामाजिक हस्ती थे इसलिए उनकी किताबों व रचनाओं की समीक्षा के लिए ज़रूरी है कि पंद्रहवी ईसवी शताब्दी के दूसरे अर्ध से तैमूरी शासन के साथ उनके संबंध को भी मद्देनज़र रखा जाए। क्योंकि अमीर अलीशीर नवाई साहित्य, शायरी और दर्शनशास्त्र में दक्ष होने के साथ साथ चिकत्रला, संगीत और शिल्पकला में भी उस्ताद थे और वे हेरात के सांस्कृतिक जीवन का केन्द्र बिन्दु समझे जाते थे। इसी प्रकार वे इस शहर में विभिन्न वर्गों के बीच विशेष रूप में मशहूर थे।

ख़ुरासान में ईरानी नागरिकों और इसी प्रकार मावराउन नहर अर्थात ट्रैन्सोज़ैनिया में बहुत सी ज़बानें बोली जाती थीं। उस समय फ़ारसी भाषा साहित्यिक ज़बान और कुलीन वर्ग से विशेष थी। संस्कृति व जीवन से जुड़ी सभी बातों में फ़ारसी ज़बान प्रचलित थी। यह ऐसी हालत में है कि अरबी भाषा ख़ास तौर पर धार्मिक ज्ञान में इस्तेमाल होती। तैमूरी शासन काल के अधीन क्षेत्रों में तीसरे वर्ग की ज़बान में मंगोल और तुर्की ज़बानें थीं जो इन इलाक़ों के लोगों के बीच प्रचलित थीं। इस वर्ग की ज़बान को भाषा विज्ञान में सेंट्रल एशिया तुर्की ज़बान या जुग़ताई ज़बान या प्राचीन उज़बकी ज़बान कहते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह ज़बान अमीर अलीशीर नवाई के दौर में उस हद तक विकसित नहीं हो पायी थी जितना एक साहित्यिक ज़बान को हो जाना चाहिए था।   

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रूसी शोधकर्ता ए के बोरोफ़कोफ़ अमीर अलीशीर नवाई को प्राचीन उज़बक की साहित्यिक ज़बान का जनक मानते हैं। वह इस बारे में दस्तावेज़ पेश करते हुए कहते हैं कि अमीर अलीशीर नवाई की यह ज़बान विभिन्न उज़बक जातियों के साथ निकटवर्ती संपर्क के कारण विकसित हुयी। उन दिनों उज़बक जातियां फ़रग़ाना प्लेन, समरक़न्द और उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में रहती थीं। उनके साहित्य में फ़ारसी भाषा के बहुत से शब्द हुए हैं यहां तक कि फ़ारसी भाषा की कुछ प्रशासनिक शब्दावली भी उन्होंने इस्तेमाल की हैं।

ए के बोरोफ़कोफ़ इस बात का उल्लेख करते हुए कि नवाई की ज़बान प्राचीन उज़बक साहित्यिक ज़बान है, कहते हैं, “अमीर अलीशीर नवाई जिन्हें उनके समकालीन महाकवि व विद्वान उस्ताद कहते हैं, अपने पूरे जीवन में अपना अद्वितीय योगदान ऐसे हालात में प्राचीन उज़बक साहित्य के आधार को मज़बूत बनाने में मानते हैं जब फ़ारसी पद्य समय के साथ परिपक्व हो चुका था, उसमें बड़े बड़े विद्वानों की बातें पिरोई हुयी थीं, कोई प्रतिस्पर्धी नहीं था और फ़ारसी गद्य उद्धरण व अनुसरण के लिए बहुत ही अच्छा नमूना समझा जाता था।”

अमीर अलीशीर नवाई को तुर्की-जुग़ताई साहित्य का जनक माना जाता है। वह अपनी ज़बान को तुर्क ज़बान कहते हैं लेकिन योरोपीय लेखक उनकी ज़बान को तुर्क भाषा की बोली और उनके साहित्य को जुग़ताई साहित्य कहते हैं। जुग़ताई चंगेज़ ख़ान के दूसरे बेटे का नाम है जो ट्रैन्सोज़ैनिया के क्षेत्र में शासन करता था। यह ज़बान तैमूर लंग के दौर में प्रचलित हुयी और उनके उत्तराधिकारियों के दौर में विकसित हुयी। एक अन्य नरेशन अर्थात रिवायत यह है कि ट्रैन्सोज़ैनिया के तुर्कों की साहित्यिक भाषा मंगोलों के दौर से तेरहवीं शताब्दी तक तुर्की-जुग़ताई के नाम से पहचानी नहीं जाती थी। रूसी भाषाविदों ने आठवीं से बारहवीं शताब्दियों के बीच ट्रैन्सोज़ैनिया और ख़्वारिज़्म की साहित्यिक रचनाओं को प्राचीन उज़्बक ज़बान का नाम दिया है। जुग़ताई बोली अन्य साहित्यिक ज़बान की तरह लोगों की संयुक्त ज़बान या कुछ स्थानीय बोलियों के आधार पर नहीं बनी है बल्कि इसे कुछ स्थानीय ज़बानों और सेन्ट्रल एशिया के तुर्क साहित्य का मिश्रण माना जाता है। इस बोली में दक्षिणी तुर्की और ख़ास तौर पर उस ज़बान का असर सबसे ज़्यादा रहा है जिसे आज ग़लती से आज़री कहा जाता है। इस असर का कारण यह है कि उस समय तबरीज़, शीरवान और हेरात जैसे सांस्कृतिक केन्द्रों के बीच आपस में संपर्क बहुत रहता था और आज़रबाइजान के शायर, लेखक और उद्योगपति हेरात में जमा हो गए थे।   

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नवाई से पहले मीर हैदर ख़्वारज़मी, यूसुफ़ अमीरी, सक्काकी, आताई, यक़ीनी और गदाई समरक़न्द में और लुतफ़ी हेरात में जुग़ताई साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय थे और उन्होंने इस साहित्य के विकास के लिए उचित पृष्ठिभूमि मुहैया की थी। तुर्की के बड़े शोधकर्ता तूग़ान का मानना है कि जुग़ताई साहित्य के विकास के लिए मंगोलों के उदय से पहले ख़ास तौर पर क़राख़ानियों के दौर में पूर्वी तुर्किस्तान और यद्दा सू में और कुछ सीमा तक सैहून के दक्षिणी व केन्द्रीय डेल्टा में तुर्क मुसलमानों के बीच जो साहित्यिक कोशिशें जारी थीं, मंगोलों के दौर में इसके विकास के लिए विशेष उपाय अपनाए गए। यह गतिविधियां तैमूरी शासन काल में बहुत ज़्यादा बढ़ीं और अबुल क़ासिम बाबर और सुलतान हुसैन बायक़रा जैसे शासकों के दौर में तुर्की जुग़ताई भाषा ख़ुरासान में ख़ास तौर पर हेरात में विकसित हुयी। इस साहित्यिक आंदोलन के विस्तार में सबसे बड़ा योगदान नवाई ने दिया। भारत से इस्तांबोल और समरक़न्द से मिस्र तक सैकड़ों लेखकों ने उनके शेरों की व्याख्या की और उनके शेरों की व्याख्या के लिए बहुत से शब्दकोश संकलित हुए जो इस महान व्यक्ति की विशाल साहित्यिक क्षमता का पता देती हैं।

नवाई के बाद उनके शिष्यों ने जो विभिन्न क्षेत्रों से हेरात पहुंचे थे, उनके शेरों व साहित्यिक शैली को अपने वतन ले गए और ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा कि उनके शेर दूसरे क्षेत्रों में प्रचलित हो गए यहां तक कि अनातोली और आज़रबाइजान के शायरों ने जुग़ताई बोली में शेर कहे। आज़रबाइजान में काज़िम सालिक निशात, हुज्जत और कई दूसरे शायरों ने और अनातोली में अहमद पाशा, बू रसाई, शैख़ ग़ालिब, नदीम और मीर अलीशीर सानी ने जुग़ताई बोली में शेर कहे और अपने क्षेत्रों में इस ज़बान के साहित्यिक प्रभाव के बढ़ने में योगदान दिया।