अमीर अली शीरनवाई -7
अमीर अलीशीर नेवाई, नवीं हिजरी क़मरी के महान साहित्यकार थे।
वे साहित्य के अतिरिक्त राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यवान संवाएं की हैं जो बहुमूल्य उपलब्धि के रूप में आज भी मौजूद हैं।
अमीर अलीशीर नवाई की अधिकतर रचनाएं तुर्की ज़ुग़ताई भाषा में हैं। इसे चग़ताई भी कहते हैं जो वास्तव में विलुप्त होने वाली एक तुर्की भाषा है। यह भाषा एक समय मध्य एशिया के विस्तृत क्षेत्र में बोली जाती थी। कहा जाता है कि बीसवीं सदी तक यह प्रचलन से हट चुकी थी लेकिन एक साहित्यिक भाषा के रूप में इसका फिर भी प्रयोग किया जाता रहा। वर्तमान समय में इसे प्राचीन उज़्बेकी भाषा के नाम से भी जानते है। अमीर अलीशीर नवाई ने अपनी रचनाओं को “ख़ज़ाएनुल मआनी” नामक काव्य संग्रह में एकत्रित किया है। बाद में उन्होंने एक काव्य संकलन को चार भागों में विभाजित किया। यही कारण है कि ताजिकी भाषा में अमीर अलीशीर नेवाई के काव्य को “चहार दीवान” के नाम से जाना जाता है।
अमीरअली शीरनवाई ने अपने काव्य संकलन के हर भाग का नामकरण विश्व विख्यात कवि अमीर ख़ुस्रो देहलवी की कविताओं के संकलन का अनुसरण करते हुए किया है। उनके संकलन में 55000 शेर, दोहे और ग़जले हैं। उन्होंने अपने जीवन के चार कालों में विभाजित किया है और हर काल में जो शेर कहे या रचनाएं कीं उनको उस काल से संबन्धित बताया है जैसे किशोर अवस्था, युवाअवस्था, अधेड़ और वृद्धावस्था।
इन चार काव्यों में जो चीज़ सबसे अधिक स्पष्ट है और जिसे विशेष महत्व प्राप्त है वह उनकी ग़ज़लें हैं। इस काव्य संकलन पर दृष्टि डालने से अमीर अलीशीर नेवाई की ग़ज़ल कहने की अदभुत क्षमता का आभास होता है। नेवाई ने अपने समय से प्रचलित शैली से अलग हटकर अपनी ग़ज़लों में सामाजिक जीवन का बहुत ही उचित ढंग से चित्रण किया है जबकि उनके काल में सामान्यतः कवि की व्यक्तिगत भावनाओं को ही प्रदर्शित किया जाता था। उन्होंने तुर्की और उज़बेकी भाषाओं की ग़ज़लों को एक नया आयाम देते हुए उसे विषयवस्तु की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध बनाया। अमीर अलीशीर नेवाई ने अपनी शायरी में बड़ी ही दक्षता के साथ अरबी और फ़ारसी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करके शायरी को नया आयाम प्रदान किया।
अमीर अलीशीर नवाई के चार काव्यों विशेषकर ग़ज़लों से संबन्धित काव्य के अध्धयन से उनकी विचारधारा को बड़ी सरलता से समझा जा सकता है। वे स्वभाविक रूप से मानवतावादी कवि थे। उन्होंने लोगों के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को सुधारने के लिए अथक प्रयास किये। वे लोगों की समस्याओं और कठिनाइयों को देखकर दुखी हो जाया करते थे। उनका मानना था कि वह व्यक्ति जो दूसरों के दर्द का आभास नहीं करता वह वास्वत में मनुष्य ही नहीं है। अमीर अलीशीर नेवाई, लोगों के बीच मित्रता और भाईचारे के पक्षधर थे। वे कहते थे कि लोगों को एक-दूसरे से शत्रुता नहीं रखनी चाहिए और हर प्रकार के द्वेष से दूर रहना चाहिए। उनका मानना था कि दूसरों के साथ शत्रुता रखना कोई अच्छा काम नहीं है बल्कि सबसे अच्छा काम, परस्पर प्रेमपूर्ण संबन्ध रखना हैं।
वे न्याय के प्रबल समर्थक थे। उनका यह मानना था कि न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करके समाज में समृद्धि लाई जा सकती है। इस बात को उन्होंने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से अपनी मसनवियों या पद्ध रचनाओं में पेश किया है विशेषकर “सद्दे सिकंदरी” नामक मसनवी में।
अमीरअली शीरनेवाई की रचनाओं, विशेषकर उनके शेरों और चारबैतों में मानवीय विशेषताओं का उल्लेख बहुत ही प्रमुखता से दखाई देता है जैसे मानवप्रेम, सदाचार, भलाई, परोपकार, आत्मसम्मान, दानशीलता, दूरदर्शिता और इसी प्रकार की अन्य विशेषताएं। साथ ही उन्होंने लोगों को इन विशेषताओं को अपनाने के लिए प्रेरित किया है। इसके विपरीत अमीर अलीशीर नेवाई ने बुराइयों की कड़ी निंदा करते हुए लोगों से इन बुराइयों से बचने का आह्वान किया है। उन्होंने लोगों को अज्ञानता, अत्याचार, लालच, चापलूसी, लोगों को धोखा देना और एसी ही बुराइयों से बचने का सुझाव दिया है। वे भले लोगों, परोपकारियों और सच्चे लोगों का बहुत सम्मान किया करते थे। इस प्रकार के लोगों का वे यथासंभव समर्थन करते थे तथा उनकी सहायता के लिए वे सदैव तैयार रहते थे। अपने शेरों में वे आलसी, बेकार और स्वार्थी लोगों की कड़ी निंदा करते हुए उन्हें समाज पर अतिरिक्त बोझ मानते थे।
अमीर अलीशीर नेवाई की एक अन्य रचना का नाम है, “चेहल रुबाई”। यह वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के 40 कथनों का तुर्की भाषा में अनुवाद है। जैसाकि हमने आपको पहले बताया कि अलीशीर नेवाई, ईरान के जानेमाने कवि अब्दुर्रहमान जामी के शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरू के संरक्षण में “तरीक़ते नक़श्बंदी” शैली सीखी थी। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में “नक़श्बंदिये तरीक़त” से संबन्धित कुछ बातें देखने को मिलती हैं।
हालांकि अमीर अलीशीर के धर्म को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद पाया जाता है किंतु एतिहासिक प्रमाणों से इस बात की पुष्टि होती है कि उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से विशेष लगाव था। उनकी पुस्तक “नज़्मुज़्ज़वाहिर” हज़रत अली से उनके प्रेम को प्रकट करती है। यह पुस्तक तुर्की भाषा में है। “नज़्मुज़्ज़वाहिर” वास्तव में वरिष्ठ शिया धर्मगुरू शेख तबरसी की किताब, “नस्ररुल्लेआली” का तुर्की अनुवाद है। यह पुस्तक हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कथनों का संग्रह है।
“नज़्मुज़्ज़वाहिर” की भूमिका में अमीर अलीशीर नेवाई लिखते हैं कि “सुल्तान हुसैन बाएक़रा” ने मेरे ऊपर जो उपकार किये थे उनके बदले में मैं उनके साथ कुछ करना चाहता था। मेरे मन में यह था कि मैं कोई एसा काम करूं जो राजाओं के मान-सम्मान के अनुरूप हो। वे लिखते हैं कि इस बारे में मैंने बहुत सोचा किंतु कुछ समझ में नहीं आया। बाद में एक बार मेरे मन में यह विचार आया कि क्यों न “नस्ररुल्लेआली” का तुर्की भाषा में अनुवाद करके उसे राजा की सेवा में पेश करूं। उनका कहना था कि राजा के लिए इससे अच्छा उपहार और क्या हो सकता है? बस मैंने अनुवाद का काम आरंभ किया। इस किताब में 260 रुबाइयां हैं। कहते हैं कि अमीर अलीशीर नेवाई, से पहले तुर्की भाषा में किसी ने भी रुबाई नहीं कही थी।