Mar ०१, २०१७ ०८:५५ Asia/Kolkata

2006, इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ दुजैल गांव के 148 से अधिक आम नागरिकों का जनसंहार करने और कई अन्य गंभीर आरोपों के तहत मुक़दमे की सुनवाई शुरू हुई।

1993, मुंबई में 13 बम धमाकों में 257 लोग मारे गए और क़रीब 800 लोग घायल हो गए थे।

1998, प्रथम टर्बोनेट इंजन निर्माता हेन्स जोशिम पाबस्ट वान ओहेन का निधन हो गया।

2003, सर्बिया के प्रधानमंत्री जोरान जिनजिब की बेलग्रेड में हत्या कर दी गई।

2004, दक्षिण कोरियाई संसद में महाभियोग पारित होने के बाद राष्ट्रपति रोह मू हुन पद से निलम्बित कर दिए गए।

2006, इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ दुजैल गांव 148 से अधिक लोगों का जनसंहार करने और कई अन्य आरोपों के तहत मुक़दमे की सुनवाई शुरू हुई।

2008, भारत सरकार के मंत्रिमण्डल ने नागालैण्ड में राष्ट्रपति शासन हटाने का निर्णय लिया।

2008, अमरीकी वायुसेना ने विश्व के पहले स्टील्थ लड़ाकू विमान एफ़-117 को अपने बेड़े से हटाया।

 

12 मार्च वर्ष 1635 ईसवी को मुग़ल बादशाह शाहजहां पहली बार तख़्ते ताऊस पर बैठा। तख़्ते ताऊस वह प्रसिद्ध सिंहासन था जिसे शाहजहां ने विशेष रूप से अपने लिये बनवाया था। यह सिंहासन 3 ग़ज लंबा, ढाई गज़ चौड़ा और पांच गज़ ऊंचा था। इस के छह पाये थे जो शुद्ध सोने के थे। सिंहासन की छत को पन्ने के बारह स्तंभ थामे हुए थे। छत के ऊपर दो मोर आमने सामने खड़े थे। इन मोरों की गर्दनों में संसार के दुर्लभ और बेहतरीन मोतियों की मालाएं लटकी हुई थीं। इन्हीं मोरों के कारण इसको तख़्ते ताऊस कहा जाता है क्योंकि फ़ारसी भाषा में मोर को ताऊस कहा जाता है।

 

12 मार्च वर्ष 1854 ईसवी को फ़्रांस, ब्रिटेन और उसमानी शासन के मध्य एतिहासिक क़ुस्तुनतुनिया समझौता हुआ। इस समझौते के आधार पर इन तीनों देशों को ज़ार रूस के मुक़ाबले में बहुत सी सफलताएं मिलीं। इन देशों को करीमा युद्ध में मिलने वाली सफलता भी इसी समझौते के बाद मिली।

 

12 मार्च वर्ष 1930 ईसवी को भारत में महात्मा गांधी के आदेश पर नागरिक अवज्ञा आंदोलन आरंभ हुआ। इस आंदोलन में भारत के समस्त देश प्रेमियों और स्वतंत्रता प्रेमियों ने भाग लिया। अंग्रेज़ों की साम्राजी सरकार की ओर से नमक पर कर में वृद्धि के निर्णय के बाद यह आंदोलन आरंभ हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी ने 78 हज़ार लोगों के साथ इस आंदोलन में भाग लेकर नमक एकत्रित करना आरंभ किया। अंग्रेज़ों ने हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया और इसी कारण सरकारी कार्यालयों में बहुत काम प्रभावित हुआ।

 

12 मार्च वर्ष 1949 ईसवी को पाकिस्तान की संसद ने देश की व्यवस्था के संचालन के लिए एक प्रस्ताव पारित किया जिसे लक्ष्य प्रस्ताव का नाम दिया गया। इस प्रस्ताव का मसौदा अल्लामा शब्बीर अहमद उस्मानी ने तैयार किया था जिसमें पाकिस्तान के संविधान का आधार और पाकिस्तान सरकार के उद्देश्य बयान किए गए थे। इस प्रस्ताव को संसद ने कुछ बदलाव के बाद पारित कर दिया और वर्ष 1985 में इस प्रस्ताव को पाकिस्तान के संविधान का भाग बना दिया गया।

 

12 मार्च वर्ष 1968 को दक्षिणी अफ़्रीक़ा के छोटे से देश मॉरिशस को ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिली। सत्रहवहीं शताब्दी में हॉलैंड के लोग इस द्वीप में पहुंचे और फ़्रान्स ने अट्ठारहवीं शताब्दी में इस पर नियंत्रण कर लिया। वर्ष 1814 में अंग्रेज़ों ने मॉरिशस पर क़ब़्ज़ा करके उसे अपना उपनिवेश बना लिया। इस देश की जनता के संघर्ष और संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के कारण ब्रिटेन ने वर्ष 1968 में मॉरिशस की स्वाधीनता को स्वीकार कर लिया। इस देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है इस देश का क्षेत्रफल लगभग दो हज़ार किलो मीटर है। मॉरिशस की जनसंख्या दस लाख से कुछ अधिक है।

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22 इसफ़ंद सन 1358 हिजरी शम्सी को ईरान की इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने अपने एक संदेश में आदेश दिया कि क्रान्ति के शहीदों के परिवारों की देख भाल के लिए एक संस्था बनायी जाए।

इमाम ख़ुमैनी ने इस संदेश के एक भाग में कहा था कि हम सब जानते हैं कि इस्लामी आंदोलन और इस्लामी क्रान्ति की सफलता जनता के विभिन्न वर्गों के बलिदान का प्रतिफल है अत: पहले ही चरण में चाहिए कि क्रान्ति के शहीदों और इस मार्ग में अपंग हो जाने वालों की सराहना की जाए और इसके लिए शहीद और अपंग हो जाने वालों के परिवारों की ओर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सही प्रकार से उनके सम्मान को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

इमाम ख़ुमैनी के इस आदेश के बाद बुनियादे शहीदे इंक़लाबे इस्लामी नामक संस्था  की स्थापना हुई जिसने स्थापना से अब तक अनगिनत सराहनीय कार्य किये हैं।

 

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17 रजब सन 1271 हिजरी क़मरी को प्रसिद्ध मुसलमान धर्म गुरु व शिक्षक सैयद अबू तुराब खुन्सारी का ईरान के केंद्रीय नगरों में गिने जाने वाले खुन्सार नगर में जन्म हुआ। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ुन्सारी ने अपने समय के महान धर्मगुरुओं से शिक्षा ली यहॉ तक कि स्वयं भी इस्लामी ज्ञानों में दक्ष हो गये। उन्होंने विभिन्न विषयों में कई पुस्तकें लिखी हैं जो उन्के गहरे और व्यापक ज्ञान की परिचायक हैं। उनकी पुस्तकों में क़स्दुस्सबील और मिसबाहुस्सालेहीन का नाम लिया जा सकता है। वर्ष 1364 हिजरी क़मरी में आयतुल्लाह ख़ुन्सारी का देहान्त हुआ।