Mar ०५, २०१७ १३:१३ Asia/Kolkata

हमने इस्लामी एकता के बारे में आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के दृष्टिकोण की चर्चा की थी।

हमने यह भी बताया था कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता, मुसलमानों के बीच मतभेदों को विष समान मानते हैं।  उनका मानना है कि वे वर्चस्ववादी शक्तियां जो, इस्लामी देशों के संसाधनों का दोहन कर रही हैं वे ही मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाने में सबसे आगे हैं।  वे कहते हैं कि वर्चस्ववादी, शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच मतभेद फैलाकर जहां अपने हितों को साध रहे हैं वहीं वे यह कार्य, इस्लाम से अपनी दुश्मनी के कारण करते हैं।  इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का कहना है कि कुछ शिया और सुन्नी मुसलमानों द्वारा एक-दूसरे पर आरोप लगाते से इस्लाम विरोधी शक्तियों को लाभ हो रहा है अतः उन्हें इस प्रकार के काम से बचना चाहिए। 

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इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने में इस्लामी संस्कारों व पर्वों की विशेष भूमिका है जिसमें हज सर्वोपरि है।  वे कहते हैं कि हज के माध्यम से भी मुसलमानों के बीच एकता स्थापित कराई जा सकती है।  उनका मानना है कि हज का मौसम, मुसलमानों के बीच विचारों के आदान-प्रदान और एक-दूसरे को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है।  वे कहते हैं कि हम यह मानते हैं कि इस्लाम, मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता का इच्छुक है और मुसलमानों का कर्तव्य है कि वे एक-दूसरे के साथ मिलजुलकर रहें।  उन्होंने कहा कि यह बात सही है कि हज का एक उद्देश्य, यह है कि विश्व के मुसलमान एक-दूसरे से निकट हों।  इस संबन्ध में सूरे हज की 27वीं आयत में कहा गया है कि लोगों को हज के लिए बुलाओ कि वे तुम्हारे पास पैदल और दुबली ऊँटनियों पर सवार होकर आए जो हर दूर मार्ग से आई होंगी। वास्तविकता यह है कि मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता, वर्चस्ववादियों विशेषकर अमरीका और उसके पिट्टठुओं के लिए बहुत ख़तरनाक है क्योंकि यह उसकी विस्तारवादी नीति की सबसे बड़ी बाधा है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई का मानना है कि मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने का एक अन्य मार्ग, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के प्रति निष्ठा रखना है।  उनका कहना है कि पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की शिक्षाएं, मुसलमानों के बीच एकता का केन्द्र बन सकती हैं।  इस बारे में वे कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के बारे में इस्लामी जगत, कम से कम दो बिंदुओं पर एकजुट हो सकता है।  इन बिंदुओं में से एक, प्रेम है जिसका उल्लेख पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों में मिलता है।  दूसरे उनकी शिक्षाएं हैं जिनका उल्लेख शिया और सुन्नी समुदाय के वरिष्ठ धर्मगुरूओं ने अपनी पुस्तकों में जगह-जगह पर किया है।  यह वे बातें हैं जिनको अपनाकर मुसलमानों के बीच एकता स्थापित की जा सकती है।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वर्तमान समय में यह अवसर समस्त मुसलमानों के पास उपलब्ध है।

इस्लामी पंथों के बीच एकता स्थापित करने के उद्देश्य से इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने जो प्रस्ताव दिये हैं उनमें से एक यह है कि इस्लामी मतों को निकट लाने के लिए एक संघ या संगठन बनाया जाए।  इस प्रकार के संघ के गठन का उद्देश्य, परस्पर मतभेदों को कम करते हुए मुसलमानों के बीच एकता का गठन करना है।  इस संबन्ध में आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि विश्व में एक अरब से अधिक लोग एसे हैं जो ईश्वर, पैग़म्बरे इस्लाम, नमाज़, रोज़े, हज, काबे और क़ुरआन के अतिरिक्त बहुत से इस्लामी आदेशों के बारे में समान दृष्टिकोण रखते हैं।  एक अरब से अधिक इन मुसलमानों के बीच कुछ आंशिक बातों में छोटे-मोटे मतभेद पाए जाते हैं।  वरिष्ठ नेता के अनुसार इन आंशिक मतभेदों का समाधान, आपसे में मिल बैठकर किया जा सकता है।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि क्या यह सही है कि अपने थोड़े से आंशिक मतभेदों के कारण मुसलमान आपस में झगड़े करें और इसका वे लोग दुरूपयोग करें जो न तो अल्लाह को मानते हैं, न पैग़म्बरे इस्लाम को, न काबे को और न ही नमाज़-रोज़े को।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि क्या यह तार्किक है? वे कहते हैं कि हमारा यह मानना है कि विभिन्न इस्लामी मतों के धर्मगुरू बैठकर उन विषयों का समाधान करें जिनके बारे में आंशिक मतभेद पाए जाते हैं।  वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस काम के लिए स्थानीय स्तर पर इस्लामी पंथों को निकट करने के लिए संघों का गठन किया जाए।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि इस्लामी मतों के निकट लाने के लिए स्थानीय स्तर पर संघों का गठन, इस्लामी एकता की महत्वपूर्ण रणनीति है।  वे कहते हैं कि वर्तमान समय में एसे किसी भी संघ का गठन मुसलमानों की ज्वलंत आवश्यकता है।  इसके माध्यम से समस्त मुसलमानों को एकजुट किया जा सकता है।  ऐसा संभव है कि विभिन्न मतों के धर्मगुरूओं का परस्पर बैठकर विचार-विमर्श, बहुत से आंशिक मतभेदों को दूर कर जा सकता है।  इस प्रकार इस्लाम के शत्रु, मुसलमानों के आंशिक मतभेदों का दुरूपयोग नहीं कर पाएंगे।  इस प्रकार के संघों के गठन का सबसे छोटा फाएदा यह है कि मुसलमानों के बीच पाए जाने वाले संयुक्त बिंदुओं को पुनः स्पष्ट किया जाए।  ऐसे में मतभेदों को किसी सीमा तक कम किया जा सकता है।

हो सकता है कि श्रोताओ के मन में यह प्रश्न पैदा हो कि मुसलमानों के बीच एकता स्थापित कराने के लिए कौनसी नीति अपनाई जाए? इस बारे में वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस संबन्ध में हमें संयुक्त नीति अपनानी होगी जिसमें मात्र राष्ट्रीय हितों को दृष्टिगत न रखा जाए बल्कि इसमें पूरे इस्लामी जगत के हितों को सर्वोपरि किया जाना चाहिए।  यदि इस्लामी जगत के हितों को दृष्टिगत रखा जाएगा तो राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा स्वंय हो जाएगी।

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इस नीति को व्यवहारिक बनाने के लिए सभी इस्लामी देशों के संयुक्त हितों को समझकर उनकी रक्षा करना है।  यह इस अर्थ में है कि अगर किसी राष्ट्र में वैज्ञानिक, आर्थिक या सैनिक दृष्टि से प्रगति होगी तो उसका प्रभाव पूरे इस्लामी देशों तक पहुंचेगा।  उदाहरण स्वरूप यदि ईरान, पाकिस्तान, इन्डोनेशिया या कोई अन्य मुस्लिम देश जब विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति करता है तो वह उसको अन्य इस्लामी देशों के साथ साझा कर सकता है।  वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस्लामी एकता के गठन में संयुक्त शत्रु की पहचान बहुत ज़रूरी है।  वे कहते हैं कि ज़ायोनी शासन, केवल फ़िलिस्तीनतियों का ही शत्रु नहीं है बल्कि वह पूरे इस्लामी जगत का खुला हुआ दुश्मन है।  इस्लामी एकता के गठन में इस विषय पर विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है कि कौन हमारा वास्तविक शत्रु है?

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस्लामी जगत में एकता उत्पन्न करने के लिए हमें मुसलमान बुद्धिजीवियों की सेवाओं से भी लाभ उठाना चाहिए।  जब इस्लामी देशों के बुद्धिजीवी आपस में बैठकर एकता के बारे में विचार-विमर्श करेंगे तो बहुत से विचार और बहुत सी एसी बातें सामने आएंगी जो इस एकता के गठन में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।  इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने में मुसलमान बुद्धिजीवियों को शामिल करने से बहुत लाभ होगा।  इस्लामी बुद्धिजीवियों के प्रभाव और महत्व के बारे में इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि इस प्रक्रिया में यदि उनको सम्मिलित नहीं किया गया तो हमारा प्रयास विफल हो सकता है।