म्यांमार के मुसलमानों पर होने वाला अत्याचार ।
पिछले कई साल से म्यांमार के मुसलमानों पर होने वाले अत्याचार की चर्चा थोड़े थोड़े समय के बाद होती-रहती है।
मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करने वाले बहुत से देश, संगठन और संस्थाएं यह दर्शाने का प्रयास करते हैं कि मानो म्यांमार में होने वाले मुसलमानों पर अत्याचारों की खबर उन्होंने सुनी ही नहीं। म्यांमार की सरकार मुसलमानों को इस देश का नागरिक मानती ही नहीं है। यही कारण है कि इस देश के बहुसंख्यक बौद्ध, यहां तक कि म्यांमार की सरकार भी मुसलमान पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को परेशान करती है और यातनाएं देती है। म्यांमार में होने वाली हिंसा में अब तक सैकड़ों व्यक्ति हताहत और हज़ारों बेघर हो चुके हैं।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार उच्चायोग ने नवंबर 2016 में एक विज्ञप्त जारी करके म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले कुछ अत्याचारों की ओर संकेत किया था जैसे मनमाने ढंग से रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता समाप्त कर देना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए बाघाएं उत्पन्न करना, जान व माल का ख़तरा, चिकित्सा और शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार से वंचित कर देना, काम करने के लिए मजबूर करना और यौन शोषण आदि। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इस संबंध में चेतावनी दी थी कि म्यांमार में मुसलमानों के विरुद्ध लगातार और व्यापक पैमाने पर होने वाले मानवाधिकार हनन को मानवता विरोधी अपराध का नाम दिया जा सकता है। म्यांमार की सेना और पुलिस भी अल्प संख्यक रोहिंग्या मुसलमानों पर दया नहीं करती।
19 दिसंबर वर्ष 2016 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से जो रिपोर्ट प्रकाशित की गयी उसके अनुसार म्यांमार के सैनिक और पुलिस अकारण ही रोहिंग्या के आम मुसलमानों पर फायरिंग करके उनकी हत्या करते और लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं, उनके घरों को आग लगा देते हैं। वे रोहिंग्या मुसलमान पुरुषों को गिरफ्तार करते हैं और उन्हें कहां रखते हैं और उनके ऊपर क्या आरोप लगाते हैं इसकी भी जानकारी नहीं देते हैं।
हालिया वर्षों में बौद्धधर्म के मानने वाले अतिवादियों के हमलों के कारण म्यांमार विशेषकर राखीन प्रांत के बहुत से रोहिंग्या मुसलमान हताहत व बेघर हुए हैं। वर्ष 2012 में मुसलमानों के विरुद्ध अतिवादी गुटों व बौद्धों की हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई। इस हिंसा के परिणाम में कई गांवों को पूर्णरूप से जला दिया गया। इसी तरह यह कार्य इस बात का कारण बना कि हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान अस्थाई शिविरों में शरण लें परंतु म्यांमार के उत्तर में इस देश की सेना की दमनकारी कार्यवाहियां पिछले वर्ष नौ अक्तूबर को सीमा सुरक्षा बलों पर हमले के बाद आरंभ हुईं। इस हमले के लिए म्यांमार की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को ज़िम्मेदार बताया था जिसमें नौ सुरक्षा कर्मी मारे गये थे। संयुक्त राष्ट्रसंघ के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि म्यांमार के उत्तर में इस देश के सैनिकों की कार्यवाही में एक हज़ार से अधिक रोहिंग्या मुसलमान मारे गये हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ के इन दो वरिष्ठ अधिकारियों ने सांकेतिक रूप से घोषणा की है कि इन कार्यवाहियों उससे कहीं उससे बहुत अधिक लोग मारे गये हैं जिनकी इससे पहले रिपोर्ट दी गयी थी। संयुक्त राष्ट्रसंघ के ये दोनों वरिष्ठ अधिकारी हिंसा से तंग आकर भाग रहे मुसलमानों से संबंधित मामलों के संबंध में कार्य कर रहे हैं। बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रहने वाले मुसलमानों के संबंध में चार महीने पहले जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी उसके आधार पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के दोनों में से एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि अब तक चर्चा सैकड़ों मरने वालों के बारे में थी। संभवतः यह आंकड़ा वास्तविकता से कम है। इन कार्यवाहियों में शायद हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान मारे गये हैं। इन शरणार्थियों के बारे में एकत्रित जानकारियां इस बात की सूचक हैं कि मारे जाने वाले व्यक्तियों की संख्या एक हज़ार से अधिक है।
म्यांमार के लगभग समस्त रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण ले रहे हैं। उन्हें स्थाई व अस्थाई शरणार्थी शिविरों में रखा जाता है और इसी प्रकार उन्हें बांग्लादेश के दक्षिणपूर्वी गांवों में रखा जाता है। उनमें से बहुतों ने म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा सामूहिक रूप से दी जाने वाली भयावह यातना और की जाने वाली हत्या एवं बलात्कार आदि की सूचना दी है। कुछ महिलाओं ने मानवाधिकार की जांच करने वालों के साथ वार्ता में बताया है कि म्यांमारों के सुरक्षा बल किस प्रकार उनके बच्चों यहां तक कि नवजात शिशुओं की हत्या करते हैं।
म्यांमार की सरकार की ओर से व्यापक पैमाने पर रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध जो अपराध किये गये हैं उसके संबंध में ह्यूमन राइट्स वॉच ने जो रिपोर्ट तैयार की है उसमें आया है कि मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा की जो ताज़ा कार्यवाही हुई है उसमें कम से कम डेढ़ हज़ार रोहिंग्या मुसलमानों के मकान जलाये गये हैं और महिलाओं व लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न की कार्यवाहियां हुई हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी इस रिपोर्ट में घोषणा की है कि म्यांमार की सेना और पुलिस ने वर्ष 2016 के अंत में रोहिंग्या मुसलमान महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार करने के लिए एक कंपेन का गठन किया। इस रिपोर्ट में आया है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जो कार्यवाही की है उसमें कम से कम नौ गांवों में रोहिंग्या महिलाओं के साथ बलात्कार किये और दूसरे अपराध अंजाम दिये। प्रत्यक्षदर्शियों ने ह्यूमन राइट्स वॉच के कर्मचारियों से वार्ता में कहा है कि जिन लड़कियों से बलात्कार किया गया उनमें से कुछ की उम्र लगभग 13 साल थी।
ह्यूमन राइट्स वॉच के आपात मामलों की समीक्षा करने वाली महिला कर्मचारी (प्रियंका मोटापार्टी) ने इस रिपोर्ट में लिखा है कि म्यांमार की हिंसा का इतिहास लंबा है परंतु इस देश के सुरक्षा बलों की ओर से रोहिंग्या महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ जो भयावह अपराध किये जा रहे हैं वह इसका नया अध्याय है।
50 पृष्ठों पर आधारित संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट में भी रोहिंग्या मुसलमान लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध होने वाले बलात्कारों व अपराधों का विवरण दिया गया है। इस रिपोर्ट को हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में रहने वाले सैकड़ों मुसलमानों से बातचीत के बाद पेश किया गया था।
चार महीने पहले से म्यांमार की सेना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जो सफाई अभियान आरंभ किया है अब तक उसमें 70 हज़ार से अधिक रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश भाग चुके हैं। अपनी सीमा खोलने के लिए बांग्लादेश की सरकार पर दबाव था पंरतु ढ़ाका सरकार ने इन दबावों की उपेक्षा करते हुए रोहिंग्या मुसलमानों के प्रवेश को रोकने के लिए अपनी सीमा चौकियों और तटवर्ती गार्डों को चौकस कर दिया। बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बलों ने गत तीन महीनों के दौरान म्यांमार के हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान महिलाओं, पुरूषों और बच्चों को इस देश में प्रवेश करने से रोक दिया। रोचक बात यह है कि रोहिंग्या मुसलमान नावों में सवार होकर म्यांमार से बांग्लादेश गये थे।
इन सब के बावजूद पिछले चार महीनों के दौरान जब से म्यांमार की सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों का दमन आरंभ किया है लगभग 73 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश जा चुके हैं। इनमें से अधिकांश शरणार्थी बांग्लादेश के कागज़ क्षेत्र में रहते हैं और यह क्षेत्र म्यांमार के राखीन प्रांत की सीमा पर स्थित है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार दूत यांग ही ली ने 21 फरवरी को बांग्लादेश के पूर्व में स्थित रोहिंग्या शरणार्थियों के रहने के स्थान कागज़ बाजार का निरीक्षण किया। यह वह स्थान है जहां म्यांमार की सेना के दमन के बाद हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान भागकर शरण लिए हुए हैं।
मानवाधिकार मामलों में संयुक्त राष्ट्रसंघ के दूत ने बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इस देश के अधिकारियों से रोहिंग्या मुसलमानों के संकट के बारे में वार्ता की। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अभी तक इस यात्रा के बारे में कोई दृष्टिकोण नहीं अपनाया है परंतु बांग्लादेश के विदेशमंत्रालय ने घोषणा की है कि ढाका ने इस देश में रोहिंग्या मुसलमानों की उपस्थिति के प्रति अपनी चिंता जता दी है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ की शरणार्थी एजेन्सी ने बांग्लादेश से मांग की है कि वह इस एजेन्सी को इस बात की अनुमति दे कि वह म्यांमार के लगभग दस हज़ार रोहिंग्या मुसलमानों को अमेरिका, कनाडा और कुछ यूरोपीय देशों में बसाने के बारे में वार्ता करे। रोहिंग्या मुसलमानों को फिर से बसाने की योजना का कुछ विकसित देशों विशेषकर अमेरिका ने विरोध किया है उसके बावजूद संयुक्त राष्ट्रसंघ के शरणार्थी उच्चायोग बेघर होने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के बसाने का कार्यक्रम लागू करने का आग्रह कर रहा है।
बांग्लादेश में संयुक्त राष्ट्रसंघ के शरणार्थी उच्चायोग के प्रतिनिधि शिन्जी कूबो ने इस संबंध में कहा है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीकी अधिकारियों सहित संबंधित अधिकारियों से सहकारिता जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि सरकार और राजनीति बदले या न बदले, मैं सोचता हूं कि बेघर लोगों को बसाने के संबंध में प्रयास संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्पष्ट जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि लगभग एक हज़ार रोहिंग्या मुसलमानों को फिर से बसाने के संबंध में पहचान कर ली गयी है जिन्हें बसाए जाने में प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
अलबत्ता म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या और उनके विरुद्ध होने वाली हिंसा पर पूरी दुनिया में प्रतिक्रिया जताई गयी है। शांति के नोबल पुरस्कार से सम्मानित 23 व्यक्तियों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के नाम खुला पत्र लिखकर मांग की है कि वह म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध मानवीय संकट का समाधान करे। इस पत्र में म्यांमार में मानवीय और नस्ली सफाये के बारे में चेतावनी दी गयी है इन अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में लापरवाही से काम लेने के कारण आंग सान सूची की आलोचना की है। रोचक बात है कि शांति के नोबल पुरस्कार से आंग सान सूची को भी सम्मानित किया गया है। म्यांमार के रोहिंग्या मुसलानों की दुर्दशा सुनकर पोप फ्रांसीस ने भी उनके लिए दुआ की है। पोप फ्रांसिस ने रोहिंग्या मुसलमानों को अच्छा और शांतिप्रेमी बताया और कहा कि वे कई साल से पीड़ा झेल रहे हैं। पोप फ्रांसिस म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध किये जाने वाले दुर्व्यवहार के बारे में 8 फरवरी को भाषण दे रहे थे जिसमें उन्होंने यह बात कही।
विश्व में कैथोलिक ईसाईयों के धार्मिक नेता ने कहा कि आज मैं आप लोगों के साथ और विशेष तरीके से अपने रोहिंग्या भाई बहनों के लिए दुआ करना चाहता हूं। इन लोगों को म्यांमार से भगा दिया गया है। वे एक जगह से दूसरी जगह पर जाते हैं क्योंकि उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता है। वे अच्छे और शांतिप्रेमी लोग हैं। वे ईसाई नहीं हैं परंतु अच्छे इंसान हैं। वे हमारे भाई- बहन हैं किन्तु वे सालों से पीड़ा झेल रहे हैं। केवल अपने धर्म का अनुसरण करने जैसे सामान्य विषय के कारण उनकी हत्या की जा रही है उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। हम एक दूसरे के साथ अपने रोहिंग्या भाई -बहनों के लिए दुआ करते हैं।