रोहिंग्या, दुनिया का सबसे अधिक पीड़ित समुदाय
जनवरी 2017 में विश्व भर की मीडिया ने एक ऐसी तस्वीर पकाशित की जिससे दुनिया हिल कर रह गई।
इस तस्वीर में रोहिंग्या समुदाय के एक छोटे बच्चे को एक नदी के किनारे कीचड़ में औंधे मुंह पड़ा हुआ देखा जा सकता है। यह दर्दनाक तस्वीर देखकर सीरिया के शरणार्थी छोटे बच्चे एलन कुर्दी की याद आ जाती है, जो तुर्की के एक तट पर मरा हुआ मिला था।
म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम बच्चे का नाम मोहम्मद था। उसका परिवार म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों और नरसंहार से जान बचाकर भाग रहा था। लेकिन मोहम्मद, उसका तीन वर्षीय भाई, मां और मामू उस नदी में डूबकर मर गए जो बांग्लादेश और म्यांमार के बीच स्थित है। इस 16 महीने के मासूम बच्चे के बाप का कहना है कि जब भी मैं इस तस्वीर को देखता हूं तो सोचता हूं कि मैं मर क्यों नहीं गया। अब मेरे ज़िंदा रहने का कोई मतलब नहीं है।
म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर इतने अत्याचार किए जा रहे हैं कि दुनिया में आज तक किसी अल्पसंख्य समुदाय पर इतने अधिक और क्रूर अत्याचार नहीं हुए। म्यांमार सरकार उन्हें बंगाली शरणार्थी कहती है, जबकि विश्व भर के विशेषज्ञों का मानना है कि यह सदियों से राखीन प्रांत में रहते आ रहे हैं।
मोहम्मद के पिता का कहना है कि हमारे गांव में सैन्य हैलिकॉप्टरों से हम पर फ़ायरिंग की गई और म्यांमार के सैनिक हम पर गोलियां बरसाते हैं। हम अपने घरों में नहीं रह सकते, इसलिए वहां से जान बचाकर भागे और जंगल में छुप गए। मेरे दादा और दादी को ज़िंदा जलाकर मार डाला गया। सेना ने हमारे गांव को आग के हवाले कर दिया, पूरा गांव राख का ढेर बन गया। हम हिंसा से बचने के लिए एक गांव से दूसरे गांव भागते रहे।
मोहम्मद के पिता ने आगे कहा, मैं लगातार 6 दिनों तक चलता रहा। चार दिन तक मैंने खाना नहीं खाया। 6 दिनों तक मैं सो नहीं सका। सेना रोहिंग्या मुसलमानों को चुन चुन कर मार रही है। मैं रास्ते में अपने परिवार से बिछड़ गया और नाफ़ नदी तक पहुंच गया। मैं पानी में कूद पड़ा और मछुआरों की मदद से म्यांमार की सीमा से बाहर निकल कर बांग्लादेश पहुंच गया। बांग्लादेश पहुंचकर मैंने अपने परिवार को यहां लाने का प्रयास किया। मैंने एक नाव वाले से बात की और उससे सहायता के लिए गुहार लगाई कि वह मेरे बीवी बच्चों को नदीं पार करा दे। मैंने अपने परिवार से संपर्क किया, मेरे परिजन निराश हो चुके थे। यह अपने परिवार से मेरा अंतिम संपर्क था। जब मैं अपनी पत्नी से बात कर रहा था तो मुझे अपने छोटे बेटे की आवाज़ आ रही थी जो मुझे पुकार रहा था।
इस संपर्क के कुछ ही घंटों के बाद, इस परिवार ने नदी पार करने की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन जैसे ही म्यांमार के सैनिकों को यह भनक लगी कि कुछ लोग नदी पार करना चाहते हैं, उन्होंने उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी। नाव वाले ने गोलियों से बचने के लिए लोगों को जल्दबाज़ी में सवार करना शुरू कर दिया। नाव में अत्यधिक लोग सवार हो चुके थे, इसलिए वह डूब गई।
मोहम्मद के पिता को इस त्रासदी के एक दिन बाद, टेलीफ़ोन पर इसके बारे में सूचना मिली। किसी ने उसे फ़ोन पर बताया कि उसे उसके बेटे का शव मिला है। उसने मोबाइल फ़ोन से मेरे बेटे की तस्वीर खींचकर मुझे भेजी। मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
इस परिवार की कहानी एक ऐसी त्रासदी है, जिसका अनुभव रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार में प्रतिदिन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक़, हालिया महीनों में लगभग 34 हज़ार रोहिंग्या म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। मोहम्मद के पिता का कहना है कि केवल नदी को पता है कि कितने रोहिंग्या मुसलमान उसमें डूबकर मरे हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने रोहिंग्या मुसलमानों को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा सताए जा रहे समुदाय का दर्जा दिया है। लगभग प्रतिदिन इस समुदाय पर ज़ुल्म के पहाड़ ढाए जा रहे हैं और विश्व मीडिया के कान पर जूं तक नहीं रींग रही है। अब यह पीड़ित लोग कहां जाएं और कहां ज़िंदगी गुज़ारें? म्यांमार दक्षिण पूर्वी एशिया का एक ग़रीब मुल्क है। 1948 में यह देश ब्रिटेन के क़ब्ज़े से आज़ाद हुआ। अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की जंग में म्यांमार के मुसलमानों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था।
इसी कारण, ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने मुसलमानों से बदला लेने के लिए फूट डालने की नीति का इस्तेमाल किया और बौद्ध अनुयाईयों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काया। 1942 में बुद्धिस्टों ने ब्रितानी हथियारों से मुसलमानों का नरसंहार किया। अराकान प्रांत में हुए इस नरसंहार में एक लाख मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया।
म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों का इतिहास, सातवीं ईसवी शताब्दी से शुरू होता है। इतिहास में कुछ समय मुसलमानो ने इस इलाक़े पर शासन भी किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, इस देश में क़रीब 8 लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं और इनकी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 4 प्रतिशत है। म्यांमार सरकार की भेदभाव एवं अमानवीय नीतियों के कारण, इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। स्वाधीन सूत्रों के आंकड़ों के मुताबिक़, यह संख्या लगभग 15 लाख है।
पिछले कुछ दशकों के दौरान, म्यांमार की सरकार और चरमपंथी बौद्ध अनुयाई मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हैं और उनके जातीय सफाए में लगे हुए हैं। पीड़ित मुसलमानों को सामूहिक रूप से मौत के घाट उतार दिया जाता है या उन्हें उनके घरों से निकाल दिया जाता है। म्यांमार में बेघर होकर बांग्लादेश जाने वाले मुसलमानों की संख्या 1978 में 3 लाख, 1988 में 1.5 लाख, 1991 में 5 लाख थी। 1992 में भी लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को उनके घरों से निकाल दिया गया।
1970 तक रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार में अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में औपचारिकता हासिल थी। 1982 में सैन्य शासन ने संविधान में संशोधन करके रोहिंग्या मुसलमानों को देश का नागरिक नहीं माना। उसके बाद से रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचारों का सिलसिला शुरू हो गया और उनके बुनियादी अधिकारों का हनन किया जाने लगा। अमानवीय अत्याचारों के दबाव में मुसलमानों ने पड़ोसी देशों में शरण लेना शुरू कर दी। नाइन इलेवन की घटना के बाद, म्यांमार में मुसलमानों पर दबाव में अत्यधिक वृद्धि हो गई।
इस देश में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़, अत्याचारों की नई लहर में चरमपंथी बुद्धिस्टों ने हज़ारों निर्दोष रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। तीन जून 2012 को सैकड़ों बौद्धों ने एक बस पर हमला करके उसमें सवार मुस्लिम यात्रियों का नरसंहार कर दिया। इस हमले में शांति और अहिंसा के पुजारियों ने 8 मुसलमानों की बहुत ही बर्बरता एवं अमानवीय ढंग से हत्या कर दी।
एक प्रत्यक्षदर्शी ने इस घटना के बारे में बहुत ही दर्दनाक कहानी बयान की है। बौद्ध भिक्षुओं ने मुसलमानों की हत्या करने के बाद, सड़क पर उनके शवों को एक साथ रखा और उन पर थूका और शराब डालकर, तांडव किया और जीत का जश्न मनाया। 2012 में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार के शुरू होने के दो महीने के अंदर लगभग 20 हज़ार लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
म्यांमार में मुसलमानों के जातीय सफ़ाए और नरसंहार के लिए अभी तक कोई स्पष्ट कारण समझ में नहीं आ रहा है। इस देश के मुसमलानों ने इतिहास में कभी भी बौद्ध अनुयाईयों पर कोई अत्याचार नहीं किया है।
लोगों के सामने महिलाओं का बलात्कार और मुसलमानों को ऐसे अनैतिक कार्यों के लिए मजबूर करना जो हराम हैं, म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले अमानवीय अपराधों का एक छोटा सा उदाहरण है। म्यांमार की मुस्लिम महिला आयशा सुलही मिस्री अख़बार अल-वतन के साथ बातचीत में कहती हैं, इस देश के बौद्ध धर्मी मुसलमानों को सूअर का गोश्त खाने और शराब पीने या मौत का विकल्प चुनने के लिए मजबूर करते हैं, म्यांमार के मुसलमान मौत को इस तरह के जीवन पर वरीयता देते हैं।
रोहिंग्या मुसलमानों की कहानी बहुत ज़्यादा दर्दनाक है। मानवाधिकारों के वरिष्ठ पर्यवेक्षकों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में कभी इससे बुरे हालात नहीं देखे हैं। राष्ट्र संघ के मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय की 4 सदस्यीय टीम की प्रमुख लीनी एरिडसन का कहना है कि सच कहूं तो इन लोगों के साथ बातचीत और उनका दर्द सुनना असहनीय था।
इस टीम की रिपोर्ट हाल ही में प्रकाशित हुई है, जिसने दुनिया को झकझोर के रख दिया है। यह रिपोर्ट 70 हज़ार रोहिंग्याओं के बीच 204 महिलाओं और पुरुषों से बात करके तैयार की गई है, जो पिछले साल अक्तूबर में म्यांमार से बांग्लादेश भाग कर पहुंचे हैं। इंटरव्यू देने वालों में से अधिकांश का कहना है कि उनके अकसर जान पहचान वालों को या क़त्ल कर दिया गया या उनका बलात्कार किया गया है या उनका अपहरण कर लिया गया।
एरिडसन का कहना है कि मुझे अभी तक ऐसा अनुभव नहीं हुआ था कि बहुत ही कम समय में ऐसे बहुत से लोगों से मिलूं, जिनके ख़िलाफ़ ऐसे जघन्य अपराध अंजाम दिए गए हैं। उनका कहना है कि म्यांमार के सैनिकों और पुलिसकर्मियों द्वारा रोहिंग्या मुसमलानों का नरसंहार, बलात्कार और उनके साथ मारपीट की रिपोर्टें, झकझोर कर रख देने वाली हैं।