इस्लाम और मानवाधिकार-32
हमने आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम की दृष्टि से इसकी सीमाओं के बारे में बताया था।
इस्लाम की दृष्टि में मूल रूप से सभी मामलों में आज़ादी साबित है लेकिन उस समय तक जब तक यह आज़ादी भौतिक व आत्मिक लौकिक व परालौकिक हितों से न टकराए। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे खाद्य पदार्थ के उत्पादक को इस बात की आज़ादी है कि वह जिस प्रकार का चाहे खाद्य पदार्थ पैदा न करे लेकिन इस शर्त के साथ कि वह जिस खाद्य पदार्थ का उत्पादन कर रहा है वह इंसान के स्वास्थ्य के लिए नुक़सानदेह न हो। जैसे ही इस बात की संभावना पैदा होती है कि अमुक उत्पादक के उत्पाद में ख़तरनाक व विषैला पदार्थ मौजूद है, उसके उत्पाद पर रोक लग जाती है और यह क़दम व्यापार की आज़ादी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ नहीं है।
इस्लामी संस्कृति में वैचारिक वाइरस या पथभ्रष्टता को शारीरिक बीमारी से ज़्यादा ख़तरनाक माना गया है। क्या वह वाइरस ज़्यादा ख़तरनाक है जिससे इंसान की पचास साल की ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ जाए या वह विचार अधिक ख़तरनाह है जो इंसान की परलोक में हमेशा बाक़ी रहने वाली ज़िन्दगी को ख़तरे में डाल दे?
आज के आधुनिक दौर में अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रिंट मीडिया की आज़ादी बहुत ज़्यादा चर्चित विषय रहा है। संचार उद्योग में दिन ब दिन तरक़्क़ी हो रही है और आज कंप्यूटर, सैटलाइट और इंटरनेट के ज़रिए किसी भी विषय को बहुत ही कम समय में बहुत तेज़ी के साथ पूरी दुनिया में प्रसारित किया जा सकता है। सूचना व प्रिंट मीडिया की आज़ादी का स्रोत दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनी। 1946 में संयुत राष्ट्र महासभा ने अपने पहले अधिवेशन में कहा,“सूचना की आज़ादी इंसान के मूल अधिकार में शामिल है और यह सभी प्रकार की आज़ादी का आधार है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ अहमियत देता है।” इस संदर्भ में मानवाधिकार घोषणापत्र के 19वें अनुच्छेद में आया है, “हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आज़ादी और अपनी मर्ज़ी की आस्था अपनाने का अधिकार है। इस अधिकार में यह बात शामिल है कि हर व्यक्ति को अपनी आस्था के संबंध में किसी प्रकार की चिंता व डर नहीं होना चाहिए। सूचनाओं की प्राप्ति और उसे सभी मुमकिन साधन से बिना किसी बाधा के प्रसारित करने की आज़ादी हो।”
इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र के दूसरे अनुच्छेद के अनुसार, “हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आज़ादी है। इस अधिकार में हर प्रकार की सूचनाओं को हासिल करना, उसकी छानबीन और उसका प्रसार करना शामिल है चाहे वह ज़बानी या लिखित या प्रकाशित या कलात्मक या किसी भी दूसरे रूप में उसका प्रयोग करे।” अलबत्ता इस अधिकार को दूसरे अनुच्छेद के आधार पर लागू करने की स्थिति में मुमकिन है दूसरे के अधिकार व प्रतिष्ठा के सम्मान, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामान्य व्यवस्था और सामान्य नैतिकता जैसी निर्धारित परिधि का पालन करना पड़े।
इसी प्रकार हर वह बात जिससे बुराई फैले उसे बयान नहीं किया जा सकता। जैसा कि इस प्रतिज्ञापत्र के 20वें अनुच्छेद में आया है, “किसी प्रकार की जंग और राष्ट्रीय या जातीय या धार्मिक घृणा को बढ़ावा देने वाला प्रचार वर्जित है।”
प्रिंट मीडिया की आज़ादी का विषय दो आयाम से अहम है। एक तो यह कि बहुत से लोगों का यह ख़्याल है कि यह आज़ादी बाक़ी दूसरी प्रकार की आज़ादी की तुलना में भिन्न है और इसके लिए किसी प्रकार की सीमा नहीं होनी चाहिए। दूसरे यह कि कुछ लोगों का यह ख़्याल है कि चूंकि यह विषय नया है और विगत में इसका वजूद नहीं था इसलिए इस बारे में इस्लाम ने कुछ नहीं कहा है।
सवाल यह उठता है कि क्या मीडिया और प्रिंट मीडिया को पूरी तरह आज़ाद होना चाहिए? क्या वास्तव में इस संदर्भ में इस्लाम का कोई दृष्टिकोण नहीं है और हमें इस बारे में आम लोगों के विचार को आधार मानना चाहिए? या यह कि इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर इस बारे में कोई हुक्म निकलता है?
पहला सवाल कि क्या मीडिया व प्रिंट मीडिया को आज़ाद होना चाहिया या नहीं, यह कहना सही है कि जब किसी विषय के बारे में यह बहस उठे कि ऐसा होना चाहिए या नहीं तो इसका यह अर्थ निकलता है कि समाज में कुछ मूल्य हैं जिनके आधार पर यह तह पता है कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि हर समाज के मूल्य उस समाज के लोगों की इच्छाओं व रीति पर आधारित होते हैं इसलिए क्या होना चाहिए क्या नहीं होना चाहिए और मूल व स्थिर मूल्यों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए। स्वाभाविक सी बात है कि ऐसे आधार पर यह तय होना चाहिए कि हम किस दौर और किस समाज में हैं ताकि यह समझ सकें कि उस दौर और उस समाज के लोगों की इच्छानुसार हमें क्या कहना चाहिए।
लेकिन इस आधार को इस्लाम अस्वीकार करता है। इस्लाम की नज़र में सभी सामाजिक मूल्यों व संस्कारों को आम लोगों की इच्छाओं के अनुसार तय नहीं किया जा सकता बल्कि बहुत से मूल्य व संस्कार इंसान के वास्तविक हित के मद्देनज़र परिभाषित होंगे। इसलिए प्रिंट मीडिया की आज़ादी के संबंध में क्या बिन्दु शामिल होंगे क्या नहीं होंगे, यह बात इस्लाम की नैतिक व्यवस्था के अधीन परिभाषित होंगे, उसी तरह जिस तरह कोई दूसरी नैतिक व्यवस्था अपने मद्देनज़र प्रिंट मीडिया के बिन्दुओं को परिभाषित करती है।
इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह क़लम और लेख की अहमियत के बारे में कहते हैं, “अपने लेख में ईश्वर को मद्देनज़र रखिए। जान लीजिए कि आपके हाथ में मौजूद क़लम से निकली हर बात ईश्वर के सामने पंजीकृत हो रही है। हर लिखे शब्द के बारे में बाद में सवाल होगा कि इसे क्यों लिखा गया है।”
इस्लाम की नैतिक व्यवस्था पिरामिड की तरह है कि जिसका सबसे ऊपर वाला बिन्दु केन्द्र बिन्दु की हैसियत रखता है। पिरामिड रूपी नैतिक व्यवस्था के सबसे ऊपर वाले बिन्दु को हम ईश्वर का सामिप्य कहते हैं। अर्थात हर वह कर्म जो इंसान को ईश्वर के निकट करे वह अच्छा समझा जाएगा और हर वह कर्म जिससे इंसान ईश्वर को भूल जाए और जो उसे भौतिकता व बर्बरता की तरफ़ ले जाए वह बुरा समझा जाएगा। इस्लामी सरकार की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अच्छे संस्कारों की रक्षा करे और उन्हें फैलाए और बुरे संस्कारों को फैलने से रोके। इस आधार पर अगर प्रिंट मीडिया इंसान की परिपूर्णतः और उसे ईश्वर के निकट करने में प्रभावी हो तो उसे मूल्यवान समझा जाएगा और अगर लोगों के ईश्वर से दूर होने का कारण बने तो उसे मूल्यों के ख़िलाफ़ समझा जाएगा इसलिए कुछ अवसरों पर सरकार के लिए ज़रूरी होगा कि वह इस तरह के प्रिंट मीडिया पर रोक लगाए, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह लोगों की शारीरिक सेहत के लिए दूषित मांस, खाद्य पदार्थ या दवा के वितरण को ख़तरनाक होने के कारण रोका जाता है।
इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह इस बारे में कहते हैं, “प्रिंट मीडिया बहुत अच्छी चीज़ है, इस शर्त के साथ कि उसमें वर्णित बातें शिक्षाप्रद हों और उसमें काम करने वाले प्रतिबद्ध हों तो ऐसी पत्रिका सबसे ज़्यादा अहम होगी। इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि व्यक्ति अपना क़लम लोगों के हित में इस्तेमाल करे और धर्मपरायणता का भी यही तक़ाज़ा है। हमारी पत्रिकाएं उपयोगी होनी चाहिए और हमें समाज में सुधार करना चाहिए।”
इस्लामी मूल्यों का संबंध नैतिकता और क़ानून दोनों से है। नैतिकता का संबंध इंसान की व्यक्तिगत ज़िन्दगी से है बल्कि क़ानून इंसान की सामाजिक ज़िन्दगी के संचालन के लिए बनते हैं। सीधी सी बात है कि अभिव्यक्ति और प्रिंट मीडिया की स्वतंत्रता क़ानूनी नियम के अधीन हैं क्योंकि भाषण और लेख दो ऐसे व्यवहार हैं जो किसी एक व्यक्ति से विशेष नहीं होते बल्कि ये समाज के सभी लोगों से संपर्क बना सकते हैं।
भाषण और लेख का न सिर्फ़ यह कि समाज पर प्रभाव पड़ता है बल्कि इसकी सामाजिक व्यवहार में गणना होती है। क्योंकि इनका समाज पर इतना असर होता है कि किसी भी दूसरे व्यवहार का इतना असर नहीं पड़ता। बड़े से बड़े सामाजिक बदलाव इन्हीं दो व्यवहारों के सार्थक व नकारात्क प्रभाव का परिणाम रहे हैं। पूरे इतिहास में मानव जीवन में सबसे ज़्यादा बदलाव लाने वाले ईश्वरीय दूतों का सबसे अहम साधन भाषण रहा है। बहुत सी सामाजिक व राजनैतिक अराजकता भाषण और लेख का नतीजा होती हैं। इसलिए सरकार को यह अधिकार हासिल है कि क़ानूनी नियम के संकलन में विशेष नियमों को मद्देनज़र रखे। यही कारण है कि इस्लाम ने भी भाषण व संवाद को विशेष अहमियत दी है और बात करने व ज़बान के बारे में बहुत सी मूल्यवान शिक्षाएं बयान की हैं।