Mar ११, २०१७ १३:२३ Asia/Kolkata

हमने सुल्तान हुसैन बायक़रा के वज़ीर अमीर निज़ामुद्दीन अलीशीर नवाई के कला और शिक्षा में योगदान के बारे में चर्ची की थी।

उनका जन्म हेरात में 9 फ़रवरी 1441 को हुआ था। शिक्षा ग्रहण करने के बाद और सुल्तान हुसैन बायक़रा के सत्ता संभालते ही वे उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश चुने गए और उन्होंने लोगों के लिए मूल्यवान सेवाएं अंजाम दीं। सुल्तान ने उनका समर्थन किया और उन्होंने ईरान की कला के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अमीर अलीशीर नवाई ने दरबारियों की ईर्ष्या के कारण, मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और सुल्तान के आदेश के अनुसार, उस्तराबाद राज्य के गवर्नर बन गए और 906 हिजरी क़मरी में वहीं उनका निधन हो गया।

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आज के साहित्य में ताज़गी, नयापन और लेखन शैली एक लेखक के लिए विशिष्टता का कारण है। लेकिन फ़ारसी के क्लासिक साहित्य में ऐसा नहीं था, कवि सामान्य रीतियों का पालन करके और अपनी कला का प्रदर्शन करके अपनी कला को लोगों के सामने पेश करता था। 12वीं शताब्दी में ईरान के साहित्यकार निज़ामी ने पूर्वी साहित्य के कुछ विषयों को ख़म्सा नामक संग्रह में संकलन किया। जिन विषयों पर निज़ामी ने शायरी की थी, उसके बाद वह कवियों और लेखकों के साहित्य को परखने की एक कसौटी बन गए।

निज़ामी द्वारा ख़म्सा लिखे जाने के बाद से ख़म्सा लिखना शायरी के लिए विशिष्टता क़रार दिया जाने लगा। ख़म्सा लिखना शायर की प्रतिभा को साबित करने का एक मानदंड समझा जाने लगा। इसलिए कि ख़म्सा कहने के लिए केवल पांच दास्तानों को पद्य में लिखना काफ़ी नहीं था। दास्तानों के लिए ज़रूरी था कि निज़ामी के ख़म्से के समान होने के अलावा, अपनी अलग पहचान भी रखती हों। इसी कारण, ख़म्सा लिखना एक कठिन कार्य था। ख़म्सा लिखने वाले अधिकांश कवि अपनी रचना को अंत तक नहीं पहुंचा सके और इस परीक्षा से सफल होकर बाहर नहीं निकल सके।

जो भी नया लेखक ख़म्सा लिखता था, वह उसके मूल विषय में और योद्धाओं की व्याख्या में कुछ बदलाव कर दिया करता था, इस प्रकार पुराना विषय नए रंगों में रंग गया और उसने साहित्य का नया रूप धारण कर लिया। यह नया साहित्य भाषा के कारण समकालीन लोगों के लिए समझना सरल था। इसी वास्तविकता के कारण, ख़म्सा के विषय आने वाली नस्लों के लिए भी सुरक्षित हो गए।

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निज़ामी के बाद भारत और ईरान के लोकप्रिय कवि अमीर ख़ुसरो दहलवी ने और उनके दो शताब्दियों बाद, अमीर अलीशीर नवाई ने ख़म्सा लिखा। रूस के विशेषज्ञ बर्टलस ने अपनी किताब, नवाई और निज़ामी में उल्लेख किया है कि अमीर अलीशीर ने अपनी मसनवियों की प्रस्तावना में अपने पूर्ववर्तियों की प्रशंसा की है। उन्होंने निज़ामी को रहस्यों के कोष का मोती और अमीर ख़ुसरो को भारतीय तलवार लिए हुए एक ऐसा वीर क़रार दिया है, जो लोगों के बीच निज़ामी का एकमात्र उत्तराधिकारी बनने के योग्य है और लोगों के बीच ऐसा ही है जैसे इधर उधर पड़ी हुई घास और फूस में कोई फूल।

अमीर अलीशीर ने अपने बारे में और अपने ख़म्सा के बारे में लिखा है कि वह निज़ामी और अमीर ख़ुसरो से अपनी तुलना करने का साहस करते हुए इस बात से भयभीत हैं कि वह उस घासफूस की भांति हों जो शतरंज की बिसात पर जम जाती है औऱ काले और सफ़ैद पयादों के बीच घोड़ों और हाथियों के सुमों के नीचे रौंद दी जाती है।

अमीर अलीशीर का ख़म्सा, तुर्की साहित्य में एक उत्तम रचना मानी जाती है। यह ख़म्सा यद्यपि पारम्परिक ख़म्सा की एक कड़ी है जो उस काल में सामान्य मानी जाती थी, लेकिन यह केवल उसकी कॉपी नहीं है, बल्कि इसमें काफ़ी नयापन है। हालांकि अलीशीर ने अपनी मसनवियों में अपने पूर्ववर्तियों के विषयों का ही चयन किया है, लेकिन तुर्क लोगों के ज़बानी साहित्य से नई चीज़ों और शैली को शामिल करने से इसने एक नया रूप ले लिया है। अलीशीर की रचनाओं के आलोचकों के अनुसार, उन्होंने ख़म्सा लिखकर, पूर्ण रूप से एक नई रचना को पेश किया है।

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तुर्क भाषी लोगों के साहित्य में ख़म्सा का काफ़ी महत्व है। जैसा कि नवाई के बाद, उनकी मसनवियों पर तुर्क कवियों ने ध्यान दिया और उस शैली में मसनवियों की रचना की। उदाहरण स्वरूप, दसवीं हिजरी शताब्दी के कवि मौलाना मोहम्मद फ़ुज़ूली ने तुर्की आज़री भाषा में लैला मजनू मसनवी लिखी। उन्होंने नवाई की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपने गुरू का स्थान दिया है। अलीशीर के गुरू और दोस्त, मौलाना नुरूद्दीन अब्दुर्रहमान जामी भी उनकी इस रचना को बहुत महत्व देते थे और उन्होंने इस्कंदरनामे और हफ़्त औरंग मसनवियों में उनकी प्रतिभा की सराहना की है।

अमीर अलीशीर के ख़म्से का संकलन पांच जिल्दों और 27 हज़ार बैत में किया गया है। 888 हिजरी में उन्होंने हीरतुल अबरार लिखा, जो निज़ामी के मख़ज़नुल असरार और ख़ुसरो के मतलउल अनवार की याद दिलाता है। 889 हिजरी में फ़रहाद व शीरीन की रचना की। उनकी तीसरी रचना लैला व मजनू है जो इसी नाम से निज़ामी और ख़ुसरो की रचनाओं की याद दिलाती है। 889 में ही उन्होंने सबआ सय्यारा मसनवी लिखी, जो निज़ामी की हफ़्त पैकर और ख़ुसरो की हश्त बहिश्त की याद दिलाती है। अलीशीर की पांचवी मसनवी सद इस्कंदरी है, जो 890 में लिखी गई और वह निज़ामी की इस्कंदरनामे और ख़ुसरो की आईनए इस्कंदरी मसनवियों की याद दिलाती है।

नवाई ने इन कहानियों को दो वर्ष में लिखा, जो काफ़ी लोकप्रिय हो गईं, यह कारनामा ख़ुद कवि के लिए आश्चर्यजनक था। उन्होंने अपनी कविता में इस कार्य को मानव शक्ति से बाहर बताया है और दावा किया है कि उनके काल में कोई उनके जैसा कारनामा नहीं कर सका।

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तुर्की भाषा में नवाई के गद्य में सबसे महत्वपूर्ण, मजालिस नफ़ायस किताब है, जो 897 में लिखी गई। इसे पूर्वी तुर्की साहित्य की पहली रचना क़रार दिया जा सकता है। इस किताब में तुर्क भाषा के 459 कवियों के नामों का उल्लेख है, जिनमें से अधिकांश फ़ारसी में भी शेर कहते थे। यह किताब साहित्य की पहली रचना है, जिसमें नवाई के समकालीन कवियों या उन कवियों का उल्लेख है, जो कुछ ही समय पहले गुज़रे थे। लेखक इसकी प्रस्तावना में इस किताब के संकलन का उद्देश्य बताते हुए कहते हैं कि यह जामी की बहारिस्तान और दौलतशाह समरक़ंदी की तज़करत्तुश्शोरा का समापन है। तुर्क शोधकर्ता तूग़ान ने इस किताब को ग़लती से जामी की नफ़हातुल उन्स का समापन बताया है, हालांकि वह सूफ़ियाना तज़केरा है और नवाई का तज़करा साहित्य तज़करा है, इसलिए इन दोनों के बीच कोई समानता नहीं है। नवाई ने अपनी इस रचना में बहुत ही संक्षेप में लेकिन बहुत ही संपूर्ण बात की है, उनका परिचय दिया है, उनकी रचनाओं के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां की हैं। उनकी इस रचना का कई बार फ़ारसी में अनुवाद हो चुका है।

तुर्की चुग़ताई भाषा में अमीर अलीशीर की अधिक रचनाओं के कारण, उनकी कठिन रचनाओं को समझने के लिए शब्दकोशों का संकलन किया गया। उसी ज़माने में सुल्तान हुसैन बायक़रा के आदेश के अनुसार, बदायेउल लुग़ा लिखी गई, जिसे 1084 हिजरी में ताले हेराती ने पुनः लिखा और दूसरे शब्दकोशों के संकलन में उससे लाभ उठाया। लोग़ते अबूशका भी ऐसा शब्दकोश है, जिसका लेखक अज्ञात है। दसवीं शताब्दी के शुरू में इसे अनातोलिया में लिखा गया। इस किताब में नवाई, लुत्फ़ी और अन्य चुग़ताई कवियों की रचनाओं के नमूनों का उल्लेख है। नादिर शाह अफ़शार के विशेष मुंशी मिर्ज़ा मेहदी उस्तराबादी ने भी संगलाख़ शब्दकोश का संकलन किया और उसकी प्रस्तावना में उल्लेख किया कि इसे नवाई की रचनाओं की कठिनाईयों के समाधान के लिए लिखा गया है।