Apr ०३, २०१७ १२:१२ Asia/Kolkata

हमने यूरोपीय संघ और यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच विरोधाभास की चर्चा की थी।

यूरोपीय संघ की एकजुटता के प्रति दक्षिणपंथी पार्टियां तीन आदर्शों का अनुसरण करती हैं। पूर्ण विरोध, सशर्त सहमति और समझौता। पूर्ण विरोध करने वाली पार्टियां यद्यपि यूरोप के संयुक्त इतिहास, धर्म और संस्कृति को स्वीकार करती हैं, लेकिन यूरोपीय संघ के तहत राजनीतिक सहयोग की विरोधी हैं। उनका मूल उद्देश्य, सरकार को शक्तिशाली बनाना, राष्ट्रवादी संस्थाओं को सत्ता में वापस लौटाना और यूरोपीय संघ की व्यवस्था का विरोध करना है। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि इस आदर्श में यूरोपीय संघ की संस्थाओं और नीतियों की आलोचना होती है। यह आदर्श यूरोप की सतह तक सहयोग की इस हद तक अनुमति देता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सरकारों की सत्ता के लिए ख़तरा न बनें।

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सशर्त आदर्श में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा फ़ैसले लेने का विरोध और राष्ट्रों की सत्ता को सुनिश्चित बनाने के लिए सुधारों से सहमति होती है। समझौता आदर्श का अनुसरण करने वाली दक्षिणपंथी पार्टियां, यूरोप की संयुक्त संस्कृति से सहमत हैं, एकता के सिद्धांतों का समर्थन करती हैं, लेकिन यूरोप को एक राजनीतिक इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करती हैं। इन पार्टियों का मानना है कि यूरोपीय एकजुटता कोई अच्छा आइडिया नहीं है, लेकिन उसके कुछ आयाम यूरोपीय सरकारों के लिए लाभदायक हो सकते हैं। हालांकि कुछ दक्षिणपंथी पार्टियां, यूरोप की संयुक्त संस्कृति और पहचान पर विश्वास रखती हैं और यूरोपीय देशों के बीच कुछ क्षेत्रों में एकजुटता को लाभदायक मानती हैं, लेकिन वे यूरोपीय संघ के नाम से एक राजनीतिक इकाई की विरोधी हैं और उनका मानना है कि यूरोपीय सरकारों की स्वाधीनता और प्रभुत्व अपनी जगह सुरक्षित रहना चाहिए।   

यूरोप में नई दक्षिणपंथी पार्टियों के गठन के समान कारण नहीं हैं। हालांकि उनके गठन के कुछ महत्वपूर्ण कारण इस प्रकार हैं। आर्थिक वैश्वीकरण का विस्तार, पलायन और बढ़ती हुई बेरोज़गारी, विभिन्न संस्कृतियों का विस्तार, सांस्कृतिक पहचान को ख़तरा, सुख सुविधाओं में कमी, आतंकवाद और अपराध में वृद्धि विशेष रूप से पलायनकर्ताओं और शरणार्थियों की ओर से। दक्षिणपंथी विचारधारा में वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण, पारम्परिक वामपंथी और मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टियों की नाराज़गी और यूरोपीय देशों की सरकारी संस्थाओं पर विश्वास का न होना है। वास्तव में दक्षिणपंथी पार्टियों के दृष्टिकोण का एक भाग वामपंथी और मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टियों का नकारात्मक दृष्टिकोण है। यूरोप की अधिकांश जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार करती है, इसके बावजूद, एक बड़ी संख्या अपनी सरकार की नीतियों से अप्रसन्न है। दक्षिणपंथी पार्टियां जब यह देखती हैं कि जनता वामपंथी और मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टियों से ख़ुश नहीं है तो वह इस अवसर का लाभ उठाते हुए ख़ुद को एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करती हैं।

दक्षिणपंथी पार्टियां सत्ताधारी पार्टियों और राजनीतिक व्यवस्था और उनसे जुड़े विद्वानों की वैधता को छीनने का प्रयास करती हैं। वे इस दृष्टिकोण के साथ मौजूदा मूल्यों के स्थान पर ऐसे विकल्प लाने का दावा करती हैं, जिसमें समस्त लोगों की संयुक्त चिंताओं का समाधान है। दक्षिणपंथी पार्टियों की ओर रूझान के लिए जो एक महत्वपूर्ण तर्क पेश किया जाता है वह आर्थिक समस्याएं और बेरोज़गारी है। इन पार्टियों का मानना है कि इन समस्याओं की जड़ वैश्वीकरण और पलायन में है। हालांकि कुछ यूरोपीय विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक समस्याएं और बेरोज़गारी दक्षिणपंथी पार्टियों की ओर बढ़ते रूझान के लिए ज़िम्मेदार नहीं है। उनका कहना है कि दक्षिणपंथी विचारधारा के फैलने और आर्थिक संकट के बीच सही संबंध नहीं है। इसलिए कि नई दक्षिणपंथी पार्टियों का गठन 1980 और 1990 के दशकों में हुआ। यह वह समय था जब यूरोप को आर्थिक संकट का सामना नहीं था। उदाहरण स्वरूप, ऑस्ट्रिया, स्विट्ज़रलैंड, स्वीडन और नॉर्वे में दक्षिणपंथी पार्टियों के गठन को आर्थिक संकट से नहीं जोड़ा जा सकता। यह देश विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से हैं और इन देशों की जनता को काफ़ी ज़्यादा सुख सुविधाएं प्राप्त हैं।

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दक्षिणपंथी पार्टियों का गठन हालांकि संयुक्त कारकों से होता है, इसके बावजूद यूरोप के हर देश में इनके गठन में कुछ विशेष कारणों की भूमिका रही है। यूरोपीय मामलों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया वर्षों में दक्षिणपंथी पार्टियों की लोकप्रियता का कारण आर्थिक मुद्दों से कहीं अधिक सांस्कृतिक एवं पलायन के मामलों में खोजना चाहिए। वास्तव में आर्थिक मुद्दे सांस्कृतिक मामलों के बाद दूसरे दर्जे पर हैं।

पिछले कुछ दशकों में यूरोप की दक्षिणपंथी पार्टियों ने यहूदी विरोधी अपनी नीतियों को त्याग कर शरणार्थी विरोधी विशेष रूप से इस्लाम विरोधी नीतियों को अपना लिया है। इन पार्टियों की नई नस्ल ने नाइन इलेवन की घटना के बाद जन्म लिया है। इन पार्टियों के अधिकांश सदस्य मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टियों को छोड़कर इनसे जुड़े हैं। नई दक्षिणपंथी पार्टियां, यूरोप में वामपंथी पार्टियों के असर को कम करने में किसी हद तक सफल रही हैं। इन पार्टियों के नेताओं ने राजनीतिक वैधता प्राप्त करने के लिए ख़ुद को इस्लाम के मुक़ाबले में राष्ट्रीय मूल्यों का रक्षक ज़ाहिर किया है। मिसाल के तौर पर इटैलियन नॉर्दर्न लीग पार्टी ने देश में मस्जिदों के निर्माण को सीमित करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना पेश किया और बेल्जियन व्लाम ब्लॉक ने सुरक्षा का बहाना बनाकर मुसलमानों को वित्तीय सहायता देने पर आपत्ति जताई। फ़्रांस की राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी ने भी फ़्रांसीसी समाज के इस्लामीकरण के प्रति चिंता ज़ाहिर की है। इस पार्टी के पूर्व प्रमुख जॉन मैरी लूपन के अनुसार, फ़्रांस में 60 लाख मुसलमान हैं, जो पिछले दशकों में फ़्रांस पहुंचे हैं। अगर यह मुसलमान, फ़्रांसीसी नागरिक होने के अलावा किसी और भावना से भी जुड़े रहे तो यह बहुत ख़तरनाक है।

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यूरोप के 8 देशों में मुसलमानों की स्थिति के बारे में हुए अध्ययन से पता चलता है कि इन देशों के नागरिकों में मुसलमान विरोधी भावनाएं पायी जाती हैं। इन देशों की अधिकांश जनता का मानना है कि मुसमलान अत्यधिक मांगें करते हैं और अस्थिरता उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार इन देशों में अल्पसंख्यक मुसलमानों को लेकर चिंताएं देखने में आती हैं, यहां तक कि ब्रिटेन, इटली और नीदरलैंड में हुए सर्वे के नतीजे के मुताबिक़, 40 प्रतिशत लोगों का मानना है कि उनके देशों में मुसलमानों की संख्या हद से ज़्यादा है।

दक्षिणपंथी पार्टियों की ओर बढ़ते रूझान के कारण, अन्य राजनीतिक पार्टियों ने भी शरणार्थियों और मुसलमानों के प्रति कठोर रवैया अपना लिया है। इसी कारण कुछ अवसरों पर शरणार्थियों के साथ कठोर रवैया अपनाया जाता है, विशेष रूप से अगर शरणार्थी मुस्लिम देशों से हों। शरणार्थी एवं मुस्लिम विरोधी दक्षिणपंथी पार्टियों के प्रचार में शरणार्थियों के विरुद्ध हिंसा को प्रोत्साहन दिया जाता है, जिसके कारण इनके भक्तों में वृद्धि होती है और शिक्षित लोग एवं अधिकारी भी इनसे जुड़ते हैं।

एक ज़माने में पिछड़े हुए इलाक़ों और गांवों के धार्मिक ईसाई, दक्षिण पंथी पार्टियों की गतिविधियों का केन्द्र हुआ करते थे, लेकिन आज अन्य वर्ग भी इनसे प्रभावित है। अध्ययनों से पता चलता है कि डेनमार्क, फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया में दक्षिण पंथी पार्टियों को वोट देने वाले 38 से 50 प्रतिशत लोगों में अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं।

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यह पार्टियां आम चुनावों में सफलता प्राप्त करने के अलावा भी अन्य क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं। यह पार्टियां नीतियों को प्रभावित करती हैं, राजनीतिज्ञों पर अपनी राय थोपती हैं और सामाजिक विचारधारा में परिवर्तन लाती हैं। यूरोपीय दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच अंतर होने के बावजूद, यह सब पलायन, धर्म और राष्ट्रीय संस्कृति के मुद्दों के बारे में समान दृष्टिकोण रखती हैं। इन पार्टियों का सत्ता में पहुंचने का मतलब है जातिवाद और भेदभाव में वृद्धि और सहिष्णुता का अभाव।   

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