इस्लाम और मानवाधिकार- 33
हमने उल्लेख किया था कि बोलने और लिखने का समाज में प्रभाव होता है, इसी कारण इसे सामाजिक व्यवहार माना जाता है।
इस बारे में कहा जा सकता है कि इनका प्रभाव किसी भी अन्य व्यवहार से अधिक है। इसलिए सरकार को अधिकार है कि वह इस संदर्भ में कुछ नियम बनाए।
मीडिया की आज़ादी का अर्थ, असीमित आज़ादी नहीं है। मीडिया को हर प्रकार की बात प्रसारित करने का अधिकार नहीं है, इसिलए कि मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवस्था और शांति को प्राथमिकता हासिल है। समाज के सुधार और उसे भटकाने में मीडिया की बहुत अहम भूमिका होती है। ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी इस संदर्भ में कहते हैः अगर ख़ुदा न करे आपका क़लम लड़खड़ा जाए और ईश्वर के प्रति जो प्रतिबद्धता होनी चाहिए आप उसकी उपेक्षा कर बैठें, तो ऐसा नहीं होगा केवल आपको, आपके दोस्तों और धर्म वालों को ही नुक़सान होगा, बल्कि सभी को नुक़सान होगा, इसलिए यह कोई छोटा नुक़सान नहीं है। आप को जो अधिक संख्या में प्रकाशित होने वाले अख़बार की ज़िम्मेदारी हैं, तो आपको ध्यान देना चाहिए कि आपके ऊपर लोगों की और राष्ट्र की बड़ी ज़िम्मेदारी है, अगर आप लोगों का मार्गदर्शन करेंगे तो वह उस इबादत और पुण्य से बेहतर है जो आप घर के एक कोने में बैठकर करते हैं या हज़ारों लोगों की उपस्थिति में अंजाम देते हैं। अगर आपके क़लम से सुधार हो रहा है तो वह लोगों को भटकने से बचा सकता है।
अगर कोई किसी पर ज़बानी आरोप लगा रहा है और उनका अपमान कर रहा है और कोई लिखकर या किताब में यही काम कर रहा है तो इसमें क्या अंतर है? कुछ लोग सोचते हैं कि ज़बान से किसी पर ग़लत आरोप नहीं मढ़ा जा सकता, लेकिन बिना किसी सुबूत और प्रमाण के केवल इस आधार पर कि ऐसा कहा जाता है या सुना गया है, अख़बार के पूरे पेज को ग़लत आरोपों से भरा जा सकता है। हालांकि मीडिया द्वारा अफ़वाह और झूठ फैलाने का असर कहीं अधिक होता है। जब किताब या अख़बार द्वारा कोई झूठ फैलाया जाता है, तो उसका असर सैकड़ों और हज़ार गुना होता है और वह लोगों की बड़ी संख्या तक पहुंचता है।
मीडिया द्वारा किसी के चरित्र को ख़राब करने के बारे में इमाम ख़ुमैनी कहते हैः जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं उन पर अख़बारों को नज़र डालनी चाहिए, कभी आलोचना होती है, अर्थात स्वस्थ आलोचना, यह लाभदायक है। कभी बदला लिया जाता है, उसे आलोचना नहीं कहा जा सकता और ऐसा नहीं होना चाहिए, यह मानकों पर पूरा नहीं उतरता है। अगर किसी के किसी से अच्छे संबंध नहीं हैं तो मीडिया में उसकी धज्जियां उड़ा दी जाती हैं, यह सही नहीं है। हां अगर किसी ने कोई ग़लत काम किया है तो उसे नसीहत करनी चाहिए, उस पर पर्दा नहीं डालना चाहिए, लेकिन आलोचना सार्थक होनी चाहिए, ताकि आम लोग समझ सकें कि कया करना चाहिए और कैसे करना चाहिए।
जो समस्या बाक़ी रह जाती है वह यह है कि कभी कभी मीडिया में कोई बात कहने का मतलब उनका प्रचार प्रसार नहीं है, बल्कि एक सवाल उठाना है। इस्लाम इस बारे में क्या कहता है, यह जानने की ज़रूरत है।
इस्लाम किसी सवाल के उठाने को और ज्ञान के आधार पर वाद विवाद करने को विशेष महत्व देता है। वह कभी भी सवाल उठाने से नहीं रोकता है। न यह कि केवल रोकता नहीं है, बल्कि सवाल के जवाब देने और भ्रम दूर करने को इतना अधिक महत्व देता है कि अगर इस्लाम का कोई दुश्मन युद्ध की स्थिति में कहे कि मुझे तुम्हारे धर्म की वास्तविकता के बारे में सवाल करना है, तो इस्लाम कहता है कि उसके लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए कि वह अपने सवाल का जवाब हासिल कर सके।
सवाल करना और पूछना सम्मानजनक है। लेकिन सवाल मूल्यों के दायरे में ही होना चाहिए। अर्थात, सवाल इस प्रकार से नहीं उठाया जाना चाहिए कि उससे दूसरों को नुक़सान पहुंचे और उनकी आध्यात्मिक प्रगति में रुकावट उत्पन्न करे। उचित समय और स्थान देखकर सवाल उठाया जाना चाहिए। उदाहरण स्वरूप, बच्चों के सामने या आम लोगों के सामने दार्शनिक सवाल उठाना और धर्मशास्त्र संबंधित वाद विवाद करना, तार्किक नहीं है।
सही सवाल उठाना, दो पहलवानों के बीच कुश्ती का प्रबंध करने जैसा है। कुश्ती की प्रतिस्पर्धा में कोई समस्या नहीं है, लेकिन इस शर्त के साथ दोनों पहलवान हम पल्ला हों। अगर किसी पतले दुबले और अनाड़ी पहलवान को किसी भारी भरकम और अनुभवी पहलवान से लड़ा दिया जाए तो उसका नतीजा पहले से ही स्पष्ट होगा। शैक्षिक मामलों में ज़ोर अज़माना और धार्मिक मामलों में वाद विवाद करने में कोई समस्या नहीं है। न केवल कोई समस्या नहीं है, बल्कि इससे विकास और प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
लेकिन अगर कोई नियमों का पालन नहीं करता है और इस प्रकार से सवाल उठाता है कि वह धार्मिक मान्यताओं में ख़राबी या दूसरों के भटकने का कारण बने तो उसे रोका जाना चाहिए। बिल्कुल उसी तरह से कि जैसे किसी अन्य नुक़सानदेह चीज़ के वितरण को रोका जाता है। क्या मेडिकल साइंस की आज़ादी के नाम पर हर प्रकार के बैक्टेरिया को गली कूचों में फैलाया जा सकता है? हालांकि इसी बैक्टेरिया को शोध के लिए प्रयोगशाला में ले जाने में कोई समस्या नहीं है, बल्कि लाभदायक है।
किताब, अख़बार, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इंटरनेट और हर वह चीज़ जिसे प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यह सब संचार माध्यम के दायरे में आते हैं और इन पर वही नियम लागू हो सकते हैं, जो मीडिया पर होते हैं। मीडिया की आज़ादी भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की तरह असीमित नहीं है, बल्कि उसकी भी कुछ सीमाएं हैं, जिसकी ओर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज़ों में और इस्लाम में संकेत किया गया है।
इस्लाम की दृष्टि में हर कोई अपने विचार बयान करने के लिए आज़ाद है, लेकिन यह विचार मानव समाज के हितों से न टकराते हों। इन हितों में समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक हित शामिल हैं। मीडिया की आज़ादी के बारे में भी यही दृष्टिकोण पाया जाता है। मीडिया को जिन रेड लाइनों को पार नहीं करना चाहिए उनमें से धार्मिक मान्यताओं का अपमान नहीं करना, इंसानों का सम्मान करना और उनके अपमान से बचना है। समाज की व्यवस्था का सम्मान और क़ानूनों का पालन, नैतिकता और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना भी इसी में शामिल है। दूसरी सीमितताएं यह हैं कि किसी भी नागरिक को व्यक्तिगत या दलीय विचारों के प्रचार के नाम पर भ्रष्ट राजनीतिक लक्ष्य नहीं साधने चाहिएं। इसीलिए मीडिया पर शासन की निगरानी समाज और नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी है।
मीडिया की आज़ादी के बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई कहते हैः मेरा मानना है कि मीडिया की निगरानी करना ज़रूरी है। निगरानी के बिना, मीडिया राष्ट्रीय हितों को पूरा नहीं कर सकता। कुछ लोगों का मानना है कि सामान्य विचार एक आज़ाद इलाक़ा है, जहां जिसके दिल में जो आए वह कर सकता है। सामान्य विचार कोई लेबोरेटरी का चूहा नहीं है, जिसके दिल में जो आए वह उसके साथ कर सकता है। ग़लत तरीक़ों से विश्लेषण करके और झूठ एवं अफ़वाह फैलाकर लोगों के ईमान और भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। यह सही नहीं है। इसीलिए इन कार्यों से बचने के लिए निगरानी ज़रूरी है। यह एक ज़िम्मेदारी है, अगर इसे पूरा नहीं किया जाएगा तो सवाल पैदा होगा कि ऐसा क्यों नहीं किया गया। यह किस की ज़िम्मेदारी है? सबसे पहले शासन की और उसके बाद न्यायपालिका की। अगर प्रशासन अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करेगा तो बात न्यायपालिका तक नहीं पहुंचेगी। अगर शासन-प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी नहों करेगा तो जज को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। जज भी रेफ़री की भांति होता है। जज से यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि वह आदेश नहीं देगा। खेल के मैदान में एक रेफ़री ग़लती करने वाले खिलाड़ी को चेतावनी देता है। अगर चेतावनी का कोई असर नहीं होता है तो उसे यैलो कार्ड दिखाता है। अगर उसका भी कोई असर नहीं होता है तो रेड कार्ड दिखाता है। जिस खिलाड़ी को चेतावनी दी जाती है, वह आश्वस्त नहीं होता है और उस चेतावनी की उपेक्षा करता है। इसीलिए उसे दोबारा चेतावनी दी जाती है। उसका भी कोई लाभ नहीं होता है, तो उसे यैलो कार्ड दिखाया जाता है, लेकिन उसका भी कोई लाभ नहीं होता। प्राकृतिक रूप से उसे रेड कार्ड दिखाया जाता है। कोई विकल्प नहीं होता है। जज से कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए। जो कोई ग़ैर ज़िम्मेदाराना तरीक़े से सामान्य विचार पर निंयत्रण करना चाहता है, उसमें इस बात की योग्यता नहीं होती है। नशे में या नींद में ड्राइवर को ड्राइविंग की अनुमति नहीं दी जा सकती। अगर उसे ड्राइविंग की अनुमति दे भी दी गई तो आप उसकी गाड़ी में सवार नहीं होंगे। जो कोई हाथ में क़लम थामे उसे भी दूसरों के साथ सच्चाई और न्याय के साथ अमल करना चाहिए।