Apr ०५, २०१७ ०९:३३ Asia/Kolkata

मौलाना हुसैन वाएज़ काशेफ़ी के नाम से प्रसिद्ध कमालुद्दीन हुसैन इब्ने अली सब्ज़वारी, ईरान के प्रसिद्ध लेखक, विभिन्न ज्ञानों में दक्ष, , पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकर्ता और गणितज्ञ थे।

वह तैमूरी शासन काल में थे। उनकी उपाधि काशेफ़ी थी जिसे वह शेर करने के लिए प्रयोग करते थे और चूंकि वह लोगों को उपदेश देते थे और अच्छे परामर्श दिया करते थे, इसीलिए वह वाएज़ अर्थात उपदेशक के नाम से प्रसिद्ध हुए। वाएज़ काशेफ़ी का जन्म सब्ज़वार के बैहक़ क्षेत्र में हुआ। उनके जन्म के वर्ष के बारे में सही जानकारी नहीं है। उनका जन्म लगभग 835 से 840 हिजरी क़मरी के बीच हुआ है। काशेफ़ी ने सब्ज़वार शहर में अपनी आरंभिक शिक्षा प्राप्त की जो  उस समय ज्ञान का पालने के नाम से प्रसिद्ध था। प्रसिद्ध धर्मगुरू तबरसी ने अपनी पुस्तक मजमउल बयान में लिखा है कि सब्ज़वार उस काल में इस्लाम, धर्म और ज्ञान का पालना था। बहुत से सुन्दर स्कूल और मस्जिदें थीं। प्राचीन काल से ही इस शहर के धर्मगुरू ज्ञान के प्रचार प्रसार में व्यस्त होते थे और लोगों को उपदेश दिया करते थे। इसी आधार पर शहर का वातावरण पूरी तरह तैयार था जिससे लाभ उठाते हुए वाइज़ी ने पूरी दुनिया में अपने मंत्रमुग्ध संदेश और उपदेश दुनिया तक पहुंचाए।

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काशेफ़ी तैमूरी शासनकाल में भी थे और सुल्तान हुसैन बायक़ुरा और उनके मंत्री अमीर अलीशेर नवाई के काल में भी थे। काशेफ़ी ने धार्मिक ज्ञान, गणितज्ञ और सुलेखन की शिक्षा जवानी में ही प्राप्त कर लिया और उसके बाद वह परिज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने लगे। उन्होंने इसी प्रकार उस काल में प्रचलित समस्त ज्ञानों को प्राप्त किया और उनमें दक्षता प्राप्त की।

मुल्ला हुसैन वाएज़ काशेफ़ी ने तफ़सीर, हदीस, भाषण देने के कला, गणित, ज्योतिष विज्ञान जैसे विभिन्न ज्ञानों में दक्षता प्राप्त की। उन्होंने काफ़ी समय तक सब्ज़वार, नीशापूर, मशहद और विशेषकर हेरात में धर्म का प्रचार प्रसार किया, उपेदश दिए और शिष्टाचार की शिक्षाएं दी। वे अपने मनमोहक और सुन्दर बयानों से लोगों को उपदेश दिया करते थे और रौज़तुस्सफ़ा नामक पुस्तक के लेखक के अनुसार वह सुन्दर, मनमोहक और मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज़ से लोगों को उपदेश दिया करते थे और उचित बयानों और बातों से आयतों के अर्थ को बयान करते थे और पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों के रहस्य और उसकी जटिलताओं को सब पर स्पष्ट करते थे।

काशेफ़ी ने सब्ज़वार के वरिष्ठ धर्मगुरूओं की सेवाओं में उपस्थित होकर ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उस सपने की व्याख्या के लिए जो उन्होंने देखा था, सादुद्दीन काशग़री की तलाश में नीशापूर और मशहद गये किन्तु उन्हें पता चला कि उक्त धर्मगुरू का हेरात में देहान्त हो गया। उसके बाद वह इस महान धर्मगुरू के मज़ार के दर्शन के लिए हेरात गये। काशेफ़ी मौलाना के मज़ार पर ईरान के प्रसिद्ध शायर नूरूद्दीन अब्दुर्रहमान जामी से परिचित हुए। जामी ने काशेफ़ी को नक़शबंदी मत के सिद्धांतों से अवगत कराया और उनके मार्ग दर्शन से वह नक़शबंदी मत शैली पर चल पड़े।

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काशेफ़ी अपने काल में प्रचलित ज्ञान में दक्ष और निपुण होने के साथ साथ अपनी आयु के अधिकांश भाग में लोगों को उपदेश देते और उनको सही मार्ग पर ले जाने के प्रयास में रहे। कहा जाता है कि उपदेश देने और भाषण देने के क्षेत्र में वह अपने काल में अद्वितीय थे। वह इतना अच्छा और मनमोहक बयान करते थे कि उनकी सभाएं लोगों से भरी रहती थीं। अच्छे और भले बयान के अतिरिक्त उनकी आवाज़ में एक जादू था। उन्होंने इसी ईश्वरीय उपहार से भरपूर लाभ उठाते हुए अपने बयान को विविधता के श्रंगार से सजाया और यही विषय उनकी ओर लोगों के आकर्षित होने का कारण बना। बताया जाता है कि वह उचित समय पर पवित्र क़ुरआन की उचित आयत को अपनी सुन्दर आवाज़ में पढ़ते थे।

वर्ष 873 हिजरी क़मरी में सुल्तान हुसैन मिर्ज़ा बायक़रा के सत्ता में आने के बाद, उनकी ख्याति बढ़ गयी। सुल्तान हुसैन मिर्ज़ा बायक़ुरा के बुद्धिमान मंत्री अमीर अलीशेर नवाई उन लोगों में से एक थे जिन्होंने काशेफ़ी को पूरे समप के साथ फ़ारसी भाषा में पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया। यही कारण है कि उनकी अधिकतर पुस्तकें इन्हीं दोनों लोगों के नाम से है। उपदेश और भाषण का यही उच्च स्थान जो धर्मगुरूओं और बुद्धिजीवियों से विशेष था, उनको हेरात में भी प्राप्त हुआ। वह हर शुक्रवार की सुबह राजमहल में, नमाज़े जुमा के बाद अलीशेर नामक मस्जिद में, हर मंगलवार को मदरसए सुल्तानी में और हर बुधवार को अबुल वलीद अहमद वाएज़ की मज़ार पर उपदेश दिया करते थे।

उनके उपदेश की सभाएं ऐसी हुआ करती थीं कि स्वयं सुलतान हुसैन बायक़रा और अन्य दरबारी भी उनमें उपस्थित हुआ करते थे । अमीर अलीशेर उनकी उपदेश की सभाओं के बारे में मजालिस अन नफ़ाएस नामक पुस्तक में लिखते हैं कि मौलाना काशेफ़ी , चूंकि सब को मालूम है, बहुत ही अच्छे उपदेशक हैं दुनिया में उनके स्तर का कोई भी उपदेशक न तो है और न होगा। उनके उपदेश की सभाओं में हर वर्ग के लोग उपस्थित होते हैं और लोग इतने अधिक भर जाते थे कि भय था कि कहीं कोई कुचल कर मर न जाए। उनकी सभाओं में भीड़ का कारण, उनकी सुन्दर और मनमोहक आवाज़ और उनके बयान का अंदाज़ है जिसको बहुत ही सुन्दर अंदाज़ से सजा संवार कर श्रोताओ के सामने पेश किया जाता है। वास्तव में हज़रत दाऊद की सुन्दर आवाज़ उनमें समा गयी है। मुसलमानों में उनके अतिरिक्त हज़रत दाऊद की विशेषता से कोई भी संपन्न नहीं था। काशेफ़ी एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी होने के साथ साथ बात करने और भाषण देन में दक्ष और अपने समय में अद्वितीय थे। उनकी उपदेश सभाओं में कोई ऐसा भी था जो काशेफ़ी के उपदेशों को पद्य में ढाल देता था और उनकी सभा के समाप्त होने के बाद लोगों के सामने पढ़ता था।

काशेफ़ी के उपदेश के बाद जिस दूसरी विशेषता के लिए उन्हें याद किया जाता है वह ज्योतिष विज्ञान और आश्चर्यचकित करने वाले इस ज्ञान में उनकी दक्षता है। अमीर अलीशेर नवाई मजालिस अन नफ़ाएस और अपनी दूसरी अन्य पुस्तकों में इस बिन्दु की ओर संकेत करते हैं। काशेफ़ी के काल में इतिहासकार ख़ांदमीर रौज़तुस्सफ़ा नामक पुस्तक में लिखते हैं कि वह ज्योतिष विज्ञान में अद्वितीय थे और अन्य ज्ञानों में भी उनका कोई समकक्ष नहीं था। उनकी सात निशानियां नामक पुस्तक, ज्योतिष विज्ञान में लिखी उनकी अद्वितीय पुस्तक है। उनकी व्याख्याओं से पता चलता है कि वह पवित्र क़ुरआन में बहुत रुचि रखते थे और वह पवित्र क़ुरआन की तावील वाली व्याख्या में निपुण थे। इन सबके अतिरिक्त वह इतिहास और साहित्य के भी विशेषज्ञ थे और इसी निपुणता से लाभ उठाते हुए उन्होंने इतिहास और साहित्य को मिश्रित करके एक अनोखा कारनामा अंजाम दिया और उन्होंने इतिहास पर अधिक ध्यान देने के बजाए विषय वस्तु को बहुत ही सुन्दर अंदाज़ में पृष्ठ पर उतार दिया।

अधिकतर इतिहासकार और जीवनी लिखने वालों ने लिखा कि हेरात में सन 910 हिजरी क़मरी में काशेफ़ी का निधन हो गया। उनके पुत्र का नाम फ़खरूद्दीन सफ़ी अली था और वह भी अपने पिता की भांति प्रसिद्ध उपदेशक थे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी हैं। वह भी नक़्शबंदी मत के अनुयायी थे और वर्ष 939 में उनका भी निधन हो गया। उन्होंने अपने पिता की पुस्तक असारे क़ासिमी को संक्षिप्त रूप में किया। इसके अतिरिक्त उनकी कई अन्य पुस्तकें भी हैं जिनमें रशहाते एनुल हयात जो नक़्शबंदी मत पर चलने वाले बुद्धिजीवियों और धर्मगुरूओं की जीवनी पर है, यह पुस्तक वर्ष 909 क़मरी में लिखी गयी। वर्ष 993 में लिखी पुस्तक का नाम लताएफ़ुत्तवाएफ़ है जिसमें कहानियां बयान की गयी हैं। हिरज़ुल अमान मिन फ़ितने आख़िरुज़्ज़मान है जो क़ुरआन के रहस्य और उसके शब्दों के स्रोत व उसकी विशेषताओं पर लिखी गयी है। इसी प्रकार उन्होंने मसनवीए महमूद व अयाज़ भी लिखा है।