Apr ०९, २०१७ १४:१० Asia/Kolkata

हमने फ़्रांस के राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी के बारे में बताया था जिसे यूरोप में सबसे मज़बूत अतिवादी दक्षिणपंथी दलों में गिना जाता है।

फ़्रांस में मई 2017 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी की नेता मैरिन लोपेन, अपने अन्य प्रतिद्वंद्वियों से आगे चल रही हैं। सभी सर्वे दर्शाते हैं कि वह चुनाव के पहले चरण में ही सबसे ज़्यादा मत हासिल करेंगी। यूरोपीय मामलों के बहुत से पर्यवेक्षक 2002 के चुनावी नतीजे और सर्वे के आधार पर मान रहे हैं कि मैरिन लोपेन की राष्ट्रपति पद के चुनाव के दूसरे चरण में पहुंचने पर भी जीत की उम्मीद नहीं है। 2002 के चुनाव में मैरिन लोपेन के पिता जान मैरी लोपेन जो राष्ट्रीय मोर्चा पार्टी के पूर्व नेता रह चुके हैं, जाक शिराक के साथ राष्ट्रपति पद के चुनाव में दूसरे चरण में पहुंचे थे लेकिन वामपंथियों और मध्यमार्गी दक्षिणपंथी पार्टियों ने जाक शिराक का साथ दिया जिससे वह लगभग 82 फ़ीसद मत के साथ दूसरी बार एलीज़ा भवन पहुंचे।

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फ़्रांस के बाद अतिवादी दक्षिणपंथी जर्मनी में भी सक्रिय हो गए हैं जिसे यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति समझा जाता है। यूरोप में जर्मनी को अतिवादी दक्षिणपंथ का उद्गम समझा जाता है, क्योंकि एक ओर नीचे, शोपेनहावर और फ़ीख़्ते जैसे जातीय वरीयता के समर्थक विचारक जर्मन हैं और 19वीं सदी के सबसे बड़े दार्शनिकों में से एक हेगल राष्ट्रवाद और जर्मन सभ्यता पर बहुत ज़्यादा बल देते थे तो दूसरी ओर एडॉल्फ़ हिटलर ने भी जर्मनी में अतिवादी दक्षिणपंथ के विचारों को लागू किया। पहले विश्व युद्ध के बाद सामाजिक हताशा के साथ साथ उचिव वैचारिक पृष्ठिभूमि ने भी जर्मनी में धीरे-धीरे नाज़ीवाद और हिटलर के पैर जमाने का रास्ता साफ़ किया। जैसा कि हिटलर को जर्मनी में अतिवादी दक्षिणपंथ का प्रतिनिधि समझा जाता है। हिटलर जिन्होंने ‘मेरा संघर्ष’ नामक किताब में अपने अतिवादी व भेदभावपूर्ण विचारों को साफ़ तौर पर बयान किया था, नाज़ी दल की अगुवाई करते हुए अपनी व्यक्तिगत क्षमता और जर्मनी की दयनीय स्थिति का फ़ायदा उठाया और इस तरह इस देश की सत्ता पर 1930 से 1945 तक वे विराजमान रहे और अपने विचारों को लागू किया।       

हिटलर के साथ साथ इटली में मोसोलिनी ने फ़ासीवादी विचारधारा को फैलाया और विभिन्न क्षेत्रों में अतिवादी दक्षिणपंथी नीति को लागू किया। दोनों ही नेताओं और नाज़ीवाद व फ़ासीवाद का नव अतिवादी दक्षिणपंथ से गहरा संबंध है। वास्तव में इन्हें की अतिवादी दक्षिणपंथी दलों व आंदोलनों के सिर उठाने का स्रोत समझा जाता है। जातीवाद, सत्तावाद, शोवनिज़्म अर्थात अतिवादी देश-भक्ति, जातीय अल्पसंख्यकों का वरोध और अतिवादी राष्ट्रवाद वे संयुक्त बिन्दु हैं जो अतिवादी दक्षिण पंथ, नाज़ीवाद और फ़ासीवाद में पाए जाते हैं। इस आधार पर अतिवादी दक्षिणपंथ ने जातीवादी तत्व के सहारे धार्मिक व जातीय अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अपने हमले तेज़ कर दिए हैं।

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जिस तरह यहूदियों, अश्वेतों और स्लाव जाति को ग़ैर आर्याई कहते थे और बहुत से यहूदियों की हत्या की गई अतिवादी दक्षिणपंथी आंदोलन भी पलायनकर्ताओं, अश्वेतों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ हैं और उन पर अपनी जातीय वरीयता पर बल देते हैं। दूसरा विश्व युद्ध के नतीजे में हालांकि जर्मनी में नाज़ीवादी और इटली में फ़ासीवादी सरकारें ख़त्म हो गयीं लेकिन इन देशों के हर भाग में, दूसरों पर ख़ुद को वरीयता देने और विदेशियों का विरोध करने की जातिवादी भावना अभी भी बाक़ी रह गयी। जब भी योरोप को संकट व शून्य का सामना हुआ उसी समय अतिवादी चरमपंथी विचारधारा ने सिर उठाया। यही कारण है कि जर्मनी और कुछ योरोपीय देशों में अतिवादी दक्षिणपंथी दलों की गतिविधियों को दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई चरणों में विभाजित करते हैं। योरोप में 2008 के जटिल व अभूतपूर्व वित्तीय संकट और मध्यपूर्व तथा उत्तरी अफ़्रीक़ा के कुछ देशों में संकटके कारण भी जर्मनी में अतिवादी दक्षिणपंथ को सिर उठाने का मौक़ा मिल गया जो इस्लाम विरोधी व विदेशी विरोधी है। जर्मनी में पेगीडा नामक आंदोलन नया अतिवादी दक्षिणपंथी दल है कि जिसकी गतिविधियां कुछ दूसरे योरोपीय देशों तक फैल गयी हैं। इस गुट ने 2014 में जर्मनी के ड्रेस्डन शहर से हर हफ़्ते सोमवार के दिन इस्लाम विरोधी नारों के साथ अपना प्रदर्शन शुरु किया।

जर्मनी में ‘जर्मनी के लिए विकल्प’ नामक दल जल्द भी ही वजूद में आया है। यह दल भी अतिवादी दक्षिणपंथी दल की श्रेणी में आता है। यह दल भी विदेशियों का विरोधी है। इस दल के प्रतिनिधि 2014 में योरोपीय संसद के चुनाव में 7 फ़ीसद मतों के साथ पहली बार योरोपीय संसद में सीट हासिल करने में सफल हुए। इस बात की संभावना प्रबल है कि यह दल सितंबर 2017 में जर्मनी के संसदीय चुनाव में भी सीटें जीतने में सफल होगा। ताज़ा सर्वे के अनुसार, इस दल की लोकप्रियता 11 फ़ीसद है। अगर  ‘जर्मनी के लिए विकल्प’ दल जर्मन संसद में सीटें जीतने में सफल हो जाता है तो यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार होगा कि विदेशी विरोधी व अतिवादी राष्ट्रवादी रुझान वाले किसी दल ने ऐसी सफलता हासिल की है।

पूर्वी जर्मनी में 38 फ़ीसद से ज़्यादा जवान विदेशियों के ख़िलाफ़ हैं। समाज के बारे में अध्ययन करने वाली संस्था ‘फ़्रेडरिश एबर्ट’ के शोध से पता चलता है कि पूर्वी जर्मनी में 39 फ़ीसद और पश्चिमी जर्मनी में 22 फ़ीसद लोग विरोधियों के ख़िलाफ़ हैं। ब्रिटेन में भी जो योरोप का एक बड़ा अहम देश है, अतिवादी दक्षिणपंथी बहुत सक्रिय हैं। इन अतिवादी दक्षिणपंथी दलों में एक दल का नाम ‘यूकीप’ है। यूकीप योरोपीय संघ के वजूद के ख़िलाफ़ है। यह दल ब्रिटेन को इस संघ से बाहर निकालने वालों में आगे आगे था। इस दल ने योरोपीय संघ से ब्रिटेन को निकालने के संघर्ष को अपने प्रचार का केन्द्र बिन्दु क़रार दिया था और अपने प्रचारिक पोस्टर में दिखाया था कि ब्रिटेन के झंडे को योरोपीय संघ का झंडा निगल रहा है। 23 जून 2016 को योरोपीय संघ से ब्रिटेन के निकलने के लिए जनमत संग्रह के आयोजन के पीछे यूकीप दल की गतिविधियां और उसके नारों को कुछ कन्ज़र्वेटिव नेताओं की ओर से हासिल समर्थन था। यह ऐसा जनमत संग्रह था जिसने ब्रिटेन के योरोपीय संघ से बाहर निकलने के फ़ैसले का मार्ग प्रशस्त किया। फ़्रांस, जर्नमी, इटली और नेदरलैंड में भी अतिवादी दक्षिणपंथी दल हैं जो अपने अपने देश के योरोपीय संघ से बाहर निकलने की मांग कर रहे हैं।

योरोप में सबसे ज़्यादा इस्लाम विरोधी अतिवादी दक्षिणपंथी दल का नाम नेदरलैंड का ‘स्वतंत्रता दल’ है जिसकी लगाम गैरेट विल्डर्स के हाथ में है। इस दल के अतिवादी दृष्टिकोण का फैलना और नेदरलैंड के राजनैतिक ढांचे में धीरे धीरे प्रभाव बनाने के कारण नेदरलैंड के समाज में चिंता पैदा हो गयी है। अन्य योरोपीय देशों में अतिवादी दृष्टिकोणों के फैलने में भी इसी दल की भूमिका है। इस दल के दृष्टिकोण के कारण बहुत से योरोपीय क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों और ख़ास तौर पर मुसलमान विरोधी लहरें मज़बूत हुयी हैं। पारंपरिक दक्षिणपंथी दलों और मध्यमार्गी वामपंथी दलों की लोकप्रियता ‘स्वतंत्रता दल’ से कम है। नेदरलैंड में दूसरे विश्व युद्ध के बाद प्रजातंत्र के इतिहास में यह पहली बार है जब एक अतिवादी दक्षिणपंथी व विदेशी विरोधी कोई दल इस हद तक जनता में पैठ बनाने में सफल हुआ है। जैसे जैसे गैरेट विल्डर्स की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है वैसे वैसे उनके इस्लाम विरोधी उनके नारे तेज़ होते जा रहे हैं। विल्डर्स ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा है कि वह नेदरलैंड की सीमाओं को मुसलमान देशों के पलायनकर्ताओं पर बंद मस्जिदों को बंद करने और क़ुरआन पर पाबंदी लगाना चाहते हैं। उन्होंने नेदरलैंड के टीवी चैनल से बातचीत में दावा किया, “इस्लामी विचारधारा समाजवादी राष्ट्रवाद के विचारों जैसी ख़तरनाक है।”    

2002 में जब फ़्रांस में राष्ट्रपति पद के चुनाव के पहले चरण में जान मैरी लोपेन ने जाक शिराक पर बढ़त बनायी तो फ़्रांसीसियों ने अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में अपने यहां फ़ासीवाद की तेज़ दस्तक महसूस की। लेकिन आज फ़ासीवाद नए दक्षिणपंथी सांचे में पूरे योरोप पर दस्तक दे रहा है। नियोफ़ासीवाद, जातीवाद, विदेशी विरोध और अंततः प्रजातांत्रिक सिद्धांतों की बलि एक गंभीर ख़तरा बन चुका है। योरोप में विदेशी विरोध और इस्लाम विरोध का अर्थ एक ही है। मध्यमार्गी दक्षिणपंथी दल जिस जगह इस्लाम विरोधी अपने दृष्टिकोण नहीं प्रकट कर पातीं वहां पर विदेशी विरोध और विरोधियों के लिए रुकावट पैदा करने के नारों की आड़ में अपने इस्लाम विरोधी लक्ष्य आगे बढ़ाते हैं। जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने कुछ साल पहले इस बात को स्वीकार किया कि जर्मन समाज में सांस्कृतिक विविधता की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। उसके बाद पूर्व फ़्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी और पूर्व ब्रितानी प्रधान मंत्री डेविड कैमरन ने भी इस बिन्दु कते स्वीकार किया। अभी कुछ साल पहले तक समाज में सांस्कृतिक विविधता और विभिन्न धार्मिक व राजनैतिक रुझान वालों के मिल कर रहने का विषय पश्चिम के विकसित देशों के लिए गौरव की बात हुआ करती थी। लेकिन अब तो मध्यमार्गी दक्षिण पंथी व वाम पंथी दोनों ही अपने जनाधार को खोने के डर से अतिवादी दक्षिणपंथी दलों की तरह नारे लगा रहे हैं। यह बदलाव योरोपीय देशों की धुंधली छवि को चित्रित कर रहा है जो सभी जातियों व दूसरे धर्मों के अनुयाइयों के संबंध में उदार व्यवहार अपनाने का दावा करते हैं। यह धुंधला क्षितिज ही योरोप की सांस्कृतिक विविधता की योजना को नाकाम बनाने के लिए गंभीर ख़तरा है।