मौलाना हुसैन वाएज़ काशेफ़ी- 2
हमने नवीं हिजरी क़मरी के जानेमाने ईरानी विद्वान मौलाना हुसैन वाएज़ काशेफ़ी की कुछ रचनाओं की चर्चा की थी।
उनका पूरा नाम “कमालुद्दीन हुसैन बिन अली सब्ज़वारी” था किंतु वे “मौलाना हुसैन वाएज़” के नाम से मश्हूर हुए। उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा सब्ज़वार में प्राप्त की थी जिसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे मशहद और हेरात चले गए। लंबे समय तक उन्होंने इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार किया और लोगों को उपदेश दिये। “सुल्तान हुसैन बाएक़रा” के सत्ता में आने और उनके बुद्धिमान मंत्री “अमीरअली शीर नेवाई” की ओर से कला तथा साहित्य के समर्थन के कारण वाएज़ काशेफी की ख्याति में बहुत वृद्धि हुई। उस काल में उन्होंने हेरात में अपना अधिक समय धर्म उपदेश देने में व्यतीत किया।
वाएज़ काशेफ़ी ने “जामी” के माध्यम से नक़श्बंदी शैली को अपनाया। कुछ इतिहासकार उन्हें नक़श्बंदी शैली का सूफी मानते हैं। हालांकि जब काशेफ़ी की रचनाओं का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि नक़श्बंदी शैली की ओर उनका झुकाव तो था किंतु वे उसके अनुयाई नहीं थे। कहते हैं कि वे न तो “ख़ाजा अब्दुल्लाह अहरार” के अनुयाई थे और न ही “अब्दुर्रहमान जामी” के शिष्य थे। उनकी कुछ रचनाओं में सूफ़ी मत की ओर जो झुकाव पाया जाता है वह उनकी आस्था में शामिल नहीं है बल्कि यह उनकी सोच थी।
हालांकि वाएज़ काशेफी की बहुत सी रचनाएं मौजूद हैं जिसमें से कुछ में उनके जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा है इसके बावजूद इस बारे में संदह पाया जाता है कि उनका वास्तविक धर्म क्या था? कुछ लोगों का मानना है कि वे सुन्नी मुसलमान थे जबकि कुछ का कहना है कि वे शिया मुसलमान थे। इसका एक कारण यह है कि वाएज़ काशफी का जीवन दो नगरों में बीता सब्ज़वार और हेरात में। सब्ज़वार नगर में उनका जन्म हुआ था जहांपर वे कुछ समय के लिए न्यायधीश भी रहे। यह शिया बाहुल्य नगर है। इसके अतिरिक्त हरात नगर में वाएज़ काशेफ़ी ने अपने जीवन के 50 वर्ष व्यतीत किये जो सामान्यतः सुन्नी बाहुल्य नगर था। यही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से कुछ लोग उनको सुन्नी मुसलमान तो कुछ शिया मुसलमान कहा करते थे। वाएज़ काशफी के बारे में जो बात विश्वास के साथ कही जा सकती है वह यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों से उन्हें हार्दिक लगाव था और उनके प्रति उनकी निष्ठा थी। इस बात को वे बहुत ही स्पष्ट रूप में बताया भी करते थे।
इस बारे में ईरान के तत्कालीन इतिहासकार रसूल जाफ़रियान ने शोध किया है जिससे यह पता चलता है कि पूर्वी ईरान में रहने वाले सुन्नी मुसलमानों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के प्रति विशेष लगाव पाया जाता है। इनको बारह इमामी सुन्नी भी कहते हैं। रसूल जाफ़रियान के अनुसार सातवीं हिजरी शताब्दी के बाद से इस प्रकार के सुन्नी मुसलमानों के बीच यह प्रथा प्रचलित थी कि वे अपनी बात कहने से पहले ईश्वर का नाम लेते, उसके बाद रसूल पर सलवात भेजते बाद में चारों ख़लीफ़ा का नाम लेते थे। अंत में वे बाहर इमामों के नाम ज़रूर लेते थे। इस शैली का प्रयोग मुल्ला हुसैन वाएज़ ने अपनी किताबों विशेषकर “फ़ुतूत नामे सुल्तानी” और “रौज़तुश्शोहदा” में भी किया है।
“फ़ुतूवत नामे सुल्तानी” में वाएज़ काशेफ़ी ने “दाएरे फुतूवत” में प्रेवश के लिए 12 इमामों के नामों का उल्लेख ज़रूरी बताया है। इस किताब की भूमिका में 3 ख़लीफ़ा के नामों का उल्लेख किया गया है जिसके बाद 12 इमामों के नाम लिखे हुए हैं। ईरान के तत्कालीन इतिहासकार रसूल जाफ़रियान का कहना है कि इस किताब के नवें अध्याय में जिन बातों का उल्लेख किया गया है उनसे वाएज़ काशानी के शिया होने की पुष्टि होती है। उनकी किताबों में “रौज़तुश्शोहदा” एसी किताब है जिसमें वाएज़ काशानी के शिया होने के कई प्रमाण मौजूद हैं। इस किताब में पहले तो ईश्वरीय दूतों के इतिहास का उल्लेख किया गया है फिर पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन पर चर्चा की गई है। बाद में 12 इमामों के जीवन का भी उल्लेख किया गया है। इस किताब का एक अध्याय करबला की घटना से विशेष है जिसमें विस्तार से करबला की घटना की चर्चा की गई है।
काशेफ़ी एक निपुर्ण एवं दक्ष साहित्यकार थे। उन्होंने फार्सी और अरबी भाषाओं में गद्ध तथा पद्ध में रचनाएं की हैं। उनकी रचनाएं आकर्षक और रोचक हैं। काशेफ़ी की रचनाओं को पढ़ने के बाद यह बात समझ में आती है कि उनकी कुछ रचनाओं का प्रकाशन उनके जीवन में किया जा चुका था। उस्मानी शासनकाल में काशेफ़ी की बहुत सी रचनाओं का अनुवाद तुर्की भाषा में किया गया। इस प्रकार से काशेफ़ी की रचनाएं, फ़ार्सी भाषी क्षेत्रों के साथ ही तुर्की भाषी क्षेत्रों में भी फैल गईं। वाएज़ काशेफी के देहांत के लगभग 19 वर्षों के बाद “ख़ांद मीर” ने वाएज़ी की जीवनी लिखी। इस जीवनी में लेखक ने वाएज़ी की कुछ विख्यात रचनाओं का उल्लेख किया है।
एक अन्य ईरानी तत्कालीन शोधकर्ता सईद नफ़ीसी ने काशेफ़ी की 37 किताबों का उल्लेख किया है जबकि डा. ग़ुलाम हुसैन यूसुफ़ी ने इनकी संख्या लगभग 40 बताई है जिनमें से कुछ का अनुवाद यूरोपीय भाषाओं में किया जा चुका है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी किताबें एसी भाषा में लिखा करते थे जिसे आम आदमी बड़ी सरलता से समझ सकता था।
काशेफ़ी की रचनाओं में “अख़लाकें मोहसेनी” “रौज़तुश्शोहदा” “फ़ुतूतनामे सुल्तानी”, “असरारे क़ासेमी” और “ज़वाहेरे तफ़सीर” आदि का नाम लिया जा सकता है। जहां पर काशेफ़ी ने धर्म, तत्वदर्शिता, खगोलशास्त्र, इतिहास और नैतिकशास्त्र जैसे विषयों पर किताबें लिखी हैं वहीं पर उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी बहुत रचनाएं की हैं। काशेफ़ी की एक किताब का नाम है, “मख़ज़नुल इन्शा”। इस किताब में उन्होंने लेखन शैली विशेषकर पत्र लिखने की शैली का उल्लेख किया है जिसमें बताया गया है कि किसी कार्यायल या विभागों में किसी प्रकार पत्र भेजे जाते हैं।
मुल्ला हुसैन वाएज़ काशेफ़ी के साहित्य पर, “मुल्ला अब्दुर्हमान जामी” और “अमीर अली शीर नेवाई” जैसे महान साहित्यकारों के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनकी रनाओं से पता चलता है कि उन्होंने इस साहित्यकारों की रचनाओं का बहुत गहन अध्ययन किया था। काशेफ़ी ने मौलवी की मसनवी की व्याख्या भी की है। वे एक दक्ष कवि भी थे। वाएज़ की लेखन शैली के बारे में ईरान के एक तत्कालीन शोधकर्ता डाक्टर ज़बीहुल्लाह सफ़ा का कहना है कि वे नवीं शताब्दी हिजरी के साधारण भाषा में लेखन करने वालों में अग्रणी थे।