Apr १०, २०१७ १०:३५ Asia/Kolkata

मुल्ला हुसैन वाएज़ काशेफ़ी बरसों तक धर्म, धार्मिक आदेशों और शिष्टाचार के प्रचार तथा उपदेश के कार्य में व्यस्त रहे। सुलतान हुसैन बायक़ुरा के सत्ता में आने और उनके मंत्री अमीर अली शीर नवाई द्वारा कला व साहित्य के समर्थन के कारण मुल्ला काशेफ़ी की ख्याति चारों ओर फैल गई।

इसके बाद हेरात में उपदेश का पद, जो बड़े धर्मगुरुओं और हदीसों के ज्ञानियों से विशेष था, उन्हें प्रदान किया गया। मुल्ला काशेफ़ी, जामी के माध्यम से नक़्शबंदी मत से अवगत हुए। हमने यह भी बताया था कि मुल्ला हुसैन वाएज़ काशेफ़ी ने गद्य और पद्य में अनेक किताबें लिखी हैं जिनमें से एक अत्यंत विख्यात किताब रौज़तुश्शोहदा है।

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रौज़तुश्शोहदा नामक किताब शताब्दियों से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं विशेष कर मुहर्रम की मजलिसों में प्रचलित रही है और इसी की विषय वस्तु इमाम हुसैन पर पड़ने वाली मुसीबतों के रूप में पढ़ी जाती थी। इसे पढ़ने वालों का लोगों के बीच काफ़ी प्रभाव होता था और यह किताब इमाम हुसैन के शोकाकुलों के हाथ में रहती थी और सुलेखकों द्वारा इसकी हज़ारों प्रतियां लिखी गई थीं। मुल्ला काशेफ़ी ने तैमूरी शासनकाल में साहित्य, इतिहास और धर्म के क्षेत्र में अनेक किताबें लिखीं लेकिन निश्चित रूप से उनकी सबसे अहम और किसी हद तक विवादास्पद किताब, रौज़तुश्शोहदा ही है। इस्लामी इतिहास के एक अत्यंत अहम विषय अर्थात कर्बला और आशूरा की घटना पर आधारित होने के कारण इस किताब को ईरान में इतिहास व साहित्य की दृष्टि से अत्यधिक महत्व प्राप्त है। इस किताब का महत्व इतना है कि कुछ लोगों का मानना है कि फ़ारसी भाषा में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभा के लिए प्रयोग होने वाला शब्द “रौज़े” इसी किताब से लिया गया है।

तैमूरी शासन काल के अंतिम दिनों के राजनैतिक व धार्मिक हालात का, जिनके अंतर्गत रौज़तुश्शोहदा लिखी गई, इस किताब पर बहुत अधिक प्रभाव रहा है। तैमूरियों के सत्ता में आने के बारे में थोड़ा सा भी ग़ौर करने से यह बात समझी जा सकती है कि उनकी सत्ता का आरंभ, ईरान के शहरों की राजनैतिक और धार्मिक परिस्थितियां शिया मुसलमानों के पक्ष में आने के साथ-साथ था और तैमूरी भी इस बात से अवगत थे। पहले तैमूरी शासक तैमूर ने, अपने हितों के दृष्टिगत और इसी तरह धार्मिक टकरावा से बचने के लिए ईरान के शियों का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की। अनेक इतिहासकारों व अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि ईरान के शियों के प्रति तैमूर का स्नेह उसके हार्दिक भावनाओं और आस्थाओं के कारण नहीं था बल्कि शियों द्वारा अत्याचारी शासकों से संघर्ष की भावना इसका मुख्य कारण थी। ईरान में तैमूरियों के आगमन के साथ ही इस देश के शियों ने विशेष कर गीलान व माज़ंदरान के क्षेत्रों में उनका विरोध किया। तैमूरी, जो शियों की दिन प्रति दिन बढ़ती शक्ति से अवगत थे, प्रतिशोध लेने का प्रयास नहीं किया बल्कि शियों का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की।

तैमूरियों के शासन के आरंभिक दिनों में न केवल सैयदों अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के वंश से संबंध रखने वाले शियों पर शासन और स्वयं तैमूर ने विशेष ध्यान दिया बल्कि इस मत के प्रतिष्ठित लोगों ने भी अपनी राजनैतिक और धार्मिक स्थिति की रक्षा की कोशिश की ताकि इस प्रकार लोगों पर शासकों के अत्याचारों को रोक सकें। तैमूरी शासन के कुछ कालों में शियों का वैचारिक प्रभाव इस सीमा तक था कि टकसालों में ढाले जाने वाले सिक्कों पर पैग़म्बर इस्लाम के परिजनों और वंशजों के नाम लिखे जाते थे और अनेक शिया दरबार में मौजूद थे बल्कि कई तो मंत्री पद पर भी पहुंच गए थे। शियों ने, सुलतान हुसैन बायक़ुरा के काल में, जो वास्तव में मुल्ला वाएज़ काशेफ़ी के जीवन का काल है, हेरात में तैमूरियों की केंद्रीय सत्ता अपने हाथ में ले ली और इस प्रकार उन्हें अत्यधिक महत्व प्राप्त हो गया। उनका यह महत्व और प्रभाव इस हद तक था कि इतिहासकारों के अनुसार सुलतान हुसैन बायक़ुरा ने शिया मत को सरकारी धर्म घोषित करने का फ़ैसला कर लिया लेकिन दरबार के प्रतिष्ठित लोगों की ओर से होने वाले विरोध के कारण उन्होंने अपना फ़ैसला बदल दिया। कुल मिला कर तैमूरी शासन के अंतिम काल को राजनैतिक व धार्मिक दृष्टि से अन्य मतों की तुलना में अधिक प्रभाव व प्राथमिकता का काल कहा जा सकता है। इस काल में शिया मत के विभिन्न धार्मिक प्रतीक, साहित्यिक, कलात्मक और ऐतिहासिक क्षेत्रों में प्रकट हुए और इसी राजनैतिक व धार्मिक परिस्थितियों के अनुसार कुछ पुस्तकें भी लिखी गईं जो पूरी तरह से शिया पहचान रखती हैं।

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मुल्ला हुसैन वाएज़ काशेफ़ी की किताब रौज़तुश्शोहदा तैमूरी शासन के अंतिम काल की सबसे अहम ऐतिहासिक व साहित्यिक किताबों में से एक है। इस किताब को ईरान के लोगों और इसी तरह बाद के लेखकों विशेष कर सफ़वी काल से क़ाजारी काल के लेखकों के बीच अत्यधिक ख्याति प्राप्त हुई। इस किताब में जो लेखक के अनुसार उनकी वृद्धावस्था में लिखी गई है, दस अध्याय हैं। किताब के आरंभ में लेखक ने संक्षेप में पैग़म्बरों के इतिहास का वर्णन किया है और फिर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की जीवनी पर प्रकाश डाला है। इसके बाद उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारियों की जीवनी पर रौशनी डाली है। इस किताब में, कर्बला की घटना से संबंधित अध्याय, जो किताब लिखने में लेखक का मुख्य लक्ष्य था, सबसे विस्तृत है।

एक दक्ष वक्ता व उपदेशक के रूप में मुल्ला वाएज़ काशेफ़ी विभिन्न ज्ञानों से अवगत थे। एक उपदेशक के लिए अत्यंत आवश्यक ज्ञान, इतिहास विशेष कर पैग़म्बरों, इमामों और सहाबियों के इतिहास सहित धार्मिक इतिहास का ज्ञान है। मुल्ला काशेफ़ी की किताबों से पता चलता है कि उन्हें इस संबंध में अच्छा ज्ञान था और उस काल में जो किताबें उपलब्ध थीं उनसे वे निरंतर लाभ उठाते रहते थे। अगर यह मान लिया जाए कि हेरात की जामा मस्जिद में उपदेश के बाद काशेफ़ी शोक सभाओं को संबोधित नहीं करते थे तब भी यह बात तो निश्चित है कि उनके काल में हेरात और सब्ज़ेवार में इमाम हुसैन की शोक सभाएं आयोजित हुआ करती थीं। इतिहासकारों का कहना है कि इन सभाओं में नौहे और मरसिये पढ़े जाते थे और निश्चित रूप से पहले से तैयार विषय वस्तु भी होती थी। वाएज़ काशेफ़ी ने रौज़तुश्शोहदा में एक स्थान पर मुहर्रम के अवसर पर पढ़ी जाने वाले इन विषय वस्तुओं की ओर संकेत किया है और कहा है कि इन्हें इमामों और आशूरा की घटना के संबंध में दस्तावेज़ी हैसियत प्राप्त नहीं है।

मुल्ला काशेफ़ी ने विदित रूप से हेरात के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति मुरशिदुद्दौला के आग्रह पर जो सैयद मीरज़ा के नाम से प्रख्यात थे, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं में पढ़े जाने के लिए एक विषय वस्तु तैयार करने का निर्णय किया था। उन्होंने इमाम हुसैन पर रोने के महत्व के बारे में विस्तार से लिखने के बाद कहा है कि हर साल मुहर्रम का महीना आने पर पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के श्रद्धालु कर्बला के शहीदों पर पड़ने वाली मुसीबतों को याद करके शोक मनाते हैं। कर्बला की घटना से दिल में आग लग जाती है और आंखों से आंसू बहने लगते हैं।

मुल्ला काशेफ़ी ने इसके बाद इन शोक सभाओं में पढ़ी जाने वाली विषय वस्तु के संक्षिप्त होने की ओर संकेत करते हुए कहा है कि यही कारण था कि सैयद मीरज़ा ने मुझे आदेश दिया कि मैं पैग़म्बरों, इमामों और कर्बला के शहीदों के बारे में एक व्यापक व विस्तृत विषय वस्तु तैयार करूं। उन्होंने कोशिश की है कि अपनी किताब में कर्बला के 72 शहीदों के शहीद होने का संपूर्ण विवरण लिखें क्योंकि उनका मानना था कि आशूरा की घटना के बारे में जो बातें लिखी गई हैं उनमें इन संघर्षकर्ताओं के संघर्ष और रणकौशल की स्थिति विस्तृत रूप से बयान नहीं हुई है बल्कि उनके नाम और उनके बारे में कुछ शेर लिखने को ही पर्याप्त समझ लिया गया है।