Apr १०, २०१७ १०:४० Asia/Kolkata

हमने बताया कि कमालुद्दीन हुसैन बिन अली सब्ज़वारी जो मौलाना हुसैन वाएज़ काशेफ़ी के नाम से प्रख्यात थे नवीं शताब्दी हिजरी बराबर 15वीं शताब्दी ईसवी में थे।

उन्होंने आरंभिक शिक्षा सब्ज़वार में प्राप्त की जो उस समय ज्ञान का केन्द्र समझा जाता था। इसके बाद वह मशहद और फिर हेरात गए।

वह वर्षों तक उपदेश और धर्म के प्रचार में व्यस्त रहे। सुलतान हुसैन बायक़रा तथा उनके विद्वान मंत्री अमीर अलीशीर नवाई के काल में उन्हें हेरात का मुफ़्ती बना दिया गया। जामी ने काशेफ़ी को नक़्शबंदी सूफ़ीवाद से परिचित करवाया। हमने यह भी बताया था कि वाएज़ी काशेफ़ी की कई गद्य और पद्य रचनाएं है। रौज़तुश्शोहदा नाम की उनकी पुस्तक बहुत विख्यात है और लंबे समय तक उसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में आयोजित शोक सभाओं में पढ़ा जाता रहा। यही नहीं तैमूरी काल के अंतिम वर्षों में यह अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और साहित्यिक पुस्तक के रूप में विख्यात रही है। यह पुस्तक सफ़वी और क़ाजारी काल में भी बहुत प्रचलित थी। इस पुस्तक के आरंभिक भाग में लेखक ने पैग़म्बरों का संक्षिप्त इतिहास बयान दिया है और इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन के बारे में विस्तार से चर्चा की है और फिर इमामों की जीवनी की चर्चा की है। इस पुस्तक का वह भाग जो कर्बला की घटना से संबंधित है सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत है, बल्कि पुस्तक इसी घटना को मुख्य रुप से दृष्टिगत रखकर लिखी गई है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि रौज़तुश्शोहदा पुस्तक बहुत लंबे समय तक शीया मुसलमानों ही नहीं बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से श्रद्धा रखने वाले सुन्नी मुसलमानों के बीच भी जो प्रचलित रही तो उसका कारण पुस्तक का उच्च कोटि का गद्य है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस पुस्तक का साहित्यिक पहलू ऐसा है कि बहुत लंबे समय तक इसे मजलिसों में पढ़ा जाता रहा है। यदि इसमें इतनी उच्च कोटि का साहित्य न होता तो इतने लंबे समय तक यह किताब प्रचलित न रह पाती। दसवीं शताब्दी हिजरी के महान गद्य लेखकों में काशेफ़ी का नाम बहुत ऊपर है।

काशेफ़ी ने यह पुस्तक उस समय लिखी जब उनका बुढ़ापा शुरू हो गया था। जाने माने साहित्यकार उसताद जाफ़रियान का कहना है कि इस पुस्तक से सुंदर साहित्यिक वाक्यों को चुनना बहुत कठिन काम है क्योंकि जब भी कोई वाक्य चुनिए दूसरा वाक्य उससे अधिक सुंदर प्रतीत होता है। इसके अलावा किसी ही अवसर के लिए अति संवेदनात्मक शेर भी इस पुस्तक में मौजूद हैं।

काशेफ़ी ने अपनी इस पुस्तक में शैख़ सअदी की पुस्तक गुलिस्तान की शैली अपनाई है और उसी अंदाज़ में गद्य और पद्य की रचना की है। उनके वाक्यों में विशेष प्रकार की खनक है। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं है कि इस पुस्तक की ख्याति का एक कारण इसके वह वाक्य हैं जो गद्य होने के बावजूद शेर का स्वर पेश करते हैं। साथ ही कथावाचक कौशल भी साफ़ झलकता है। इस तरह साहित्य और कला के संगम के नतीजे में यह बड़ी विचित्र रचना सामने आई है इसमें इतिहास पर साहित्य का पहलू छाया हुआ दिखाई देता है इसी लिए कुछ कहानियां ऐसी भी शामिल कर दी गई हैं जो इतिहास में नहीं हैं।

काशेफ़ी ने आशूर की घटना तथा अन्य एतिहासिक घटनाओं को बयान करने के लिए कथावाचक शैली अपनाई है। लक्ष्य इतिहास बयान करना है लेकिर अंदाज़ क़िस्से सुनाने वाला है। किताब में जगह जगह इस तरह दृयों को उभारा गया है कि वह इतिहास बयान करने वाली शैली से बिल्कुल अलग नज़र आते हैं। यह शैली आम लोगों को बहुत पसंद आती है। अध्ययनकर्ताओं और आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार की शैली पाठकों की भावनाओं को उत्तेजित करती है और पढ़ने वाला किताब की विषयवस्तु में डूबता चला जाता है। अनेक अवसरों पर योद्धा की शक्ति और रणक्षेत्र की विशेषताओं को बड़े विस्तार से बयान किया गया है।

काशेफ़ी ने कर्बला की घटना का चित्रण करते समय बड़ी निपुणता का परिचय दिया है और यह घटना बड़ी सुंदरता और आवेश में बयान की गयी है। इस किताब में शहीद और शहादत का व्याख्यान इस तरह किया गया है कि फ़ारसी साहित्य में इसका कोई और उदाहरण नहीं है। काशेफ़ी कर्बला की घटना को पूरी तरह ग़ैर सियासी नज़र से देखते हैं लेकिन इसके साथ ही उन्होंने फ़ार्सी भाषी की इस महत्वपूर्ण रचना को शहादत के विचार से भर दिया है।

रौज़तुश्शोहदा किताब की कुछ कहानियां काल्पनिक हैं और इनका कोई ठोस ऐतिहासिक आधार नहीं है। इसी लिए इस किताब को विश्वस्त ऐतिहासिक स्रोत के रूप में नहीं देखा जाता। जैसे कि इस किताब में हाशिम इब्ने अत्बा की शहादत की घटना बयान की गई है जबकि यह वीर योद्धा कर्बला से कई साल पहले सिफ़्फ़ीन की लड़ाई में शहीद हो चुका था। इसी प्रकार की कुछ और भी घटनाएं इस किताब में बयान की गई हैं जिनसे लगता है कि काशेफ़ी ने अपनी पुस्तक लिखते समय विश्वस्त एतिहासिक दस्तावेज़ों के साथ ही ग़ैर विश्वस्त स्रोतों का भी प्रयोग किया है। इसी लिए इसे साहित्यिक रचना के रूप में देखा जाता है। कुछ लोग इसे एतिहासिक नावेल मानते हैं क्योंकि एतिहासिक नावेल में एतिहासिक घटनाओं के साथ ही काल्पनिक घटनाएं भी शामिल होती हैं। रौज़तुश्शोहदा किताब इसी शैली में लिखी गई किताब है।

शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि काशेफ़ी ने कर्बला की घटना के बारे में आध्यात्मिक पहलुओं का प्रसार किया है। वह एक सूफ़ी हैं जिन्होंने ऐतिहासिक अनुसंधान किया है इसी लिए दुनिया और उसमें मौजूद चीज़ों के बारे में उनके विशेष प्रकार के विचारों का उनके अध्ययन पर गहरा असर है। उन्होंने जो इतिहास लिखा है उसे सूफ़ियानी इतिहास कहना चाहिए। काशेफ़ी एक उपदेशक हैं, नक़्शबंदी सूफ़ी हैं और पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके परिजनों से गहरी श्रद्धा रखने वाले मुसलमान थे। साथ ही वह ऊंची सतह के शायर और लेखक थे। काशेफ़ी की यह सारी विशेषताएं उनकी किताब रौज़तुश्शोहदा में साफ़ झलकती हैं। किताब का वैचारिक आयाम पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के प्रति लेखक की श्रद्धा तथा उनके सूफ़ियानी रुजहान पर आधारित है। उनका सूफ़ियाना स्वभाव हर घटना को अलौकिक रंग दे देता है। यह सोच कहती है कि जब भी कोई घटना होती है तो उसका विशेष आध्यात्मिक पहलू भी ज़रूर होता है।

काशेफ़ी ने किताब के शुरू में ही संकेत कर दिया है कि उनकी लेखन शैली समीक्षात्मक आयाम पर आधारित है। सूफ़ी व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन को कठिनाई में गुज़ारता है ताकि आध्यात्मिक दृष्टि से उसका उत्थान हो। उनका मानना है कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों और वलियों को कठिनाइयों में डाला ताकि उनका स्थान ऊंचा हो। दुनिया में धार्मिक इतिहास इसी प्रकार की परीक्षाओं से भरा हुआ  है सारे पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों को इन परक्षाओं से गुज़रना पड़ा है। इस किताब के आख़िर तक कहीं भी कर्बला की घटना के राजनैतिक आयामों के बारे में कोई बात नहीं की गई है। इसका कारण वाएज़ी की ख़ास सूफ़ियाना सोच है। काशेफ़ी के अनुसार कर्बला के शहीदों का स्थान इस दुनिया में उनके अनुकूल नहीं था जबकि शहादत के बाद उन्हें उनका वास्तविक स्थान मिला है। तो फिर वह क्यों इस दुनिया में रहते। काशेफ़ी के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों तथा विशेष रूप से इमाम हुसैन से श्रद्धा रखने वालों के लि सबसे महत्वपूर्ण कर्म यह है कि इमाम हुसैन की क़ुरबानियों को याद रखें उनका शोक मनाएं क्योंकि वह प्रलक के दिन एसे लोगों की सिफ़ारिश करेंगे।