Apr २३, २०१७ ०८:१९ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि नवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के जानेमाने ईरानी विद्वान “मौलाना हुसैन वाएज़ काशेफ़ी” की कुछ रचनाओं की चर्चा की थी। 

वे तैमूरी राजवंश काल के महान विद्वान हैं।  उनका पूरा नाम “कमालुद्दीन हुसैन बिन अली सब्ज़वारी” था किंतु वे “मौलाना हुसैन वाएज़” के नाम से मश्हूर हुए।  उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा सब्ज़वार में प्राप्त की थी जिसके बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे मशहद और हेरात चले गए।  लंबे समय तक काशेफ़ी ने इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया और लोगों को उपदेश दिये।  “सुल्तान हुसैन बाएक़रा” के सत्ता में आने और उनके बुद्धिमान मंत्री “अमीरअली शीर नेवाई” की ओर से कला तथा साहित्य के समर्थन के कारण वाएज़ काशेफी की ख्याति में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई।  उस काल में काशेफ़ी ने हेरात में अपना अधिक समय धर्म उपदेश देने में व्यतीत किया।

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काशेफ़ी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक का नाम है “अख़लाक़े मोहसेनी” जिसको “जवाहेरुल असरार” के नाम से भी जानते हैं।  यह किताब सन 900 हिजरी क़मरी में लिखी गई।  मौलाना हुसैन वाएज़ के काल के एक इतिहासकार, “ख़ांदमीर” के अनुसार “अख़लाक़े मोहसेनी” या “जवाहेरुल असरार” काशेफ़ी की सात महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक है।  चेक मूल के जानेमाने ओरियन्टलिस्ट “Jan Rypka” जेन रिप्का का कहना है कि फ़ारसी भाषा में नैतिकता के क्षेत्र में लिखी जाने वाली पुस्तकों में अख़लाक़ें मोहसेनी, तीसरी महत्वपूर्ण पुस्तक है।  इस बारे में दो अन्य पुस्तकों के नाम हैं अख़लाक़े नासेरी और अख़लाक़े जलाली।  अख़लाक़े नासेरी को ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी ने और अख़लाक़े जलाली को जलालुद्दीन मुहम्मद दवानी नामक दो दर्शनशास्त्रियों ने लिखा है।  काशेफ़ी में दर्शनशास्त्र की ओर कोई विशेष लगाव नहीं था इसलिए उनकी पुस्तक में दर्शनशास्त्र के आयाम से कुछ भी नहीं है।  इसका एक कारण यह भी है कि तैमूरी राजवंश काल के विद्धानों में दर्शनशास्त्र की ओर विशेष झुकाव नहीं पाया जाता था।  यही कारण है कि काशेफ़ी की रचना, दर्शनशास्त्रियों की रचनाओं से कुछ अलग है।  संभवतः दर्शनशास्त्र जैसे विषय से दूर होने के कारण काशेफ़ी की “अख़लाक़े मोहसेनी” या “जवाहेरुल असरार” नामक किताब आम लोगों में अधिक मश्हूर हुई।  ज़बीहुल्लाह सफ़ा के अनुसार काशेफ़ी की किताब, नैतिकता के बारे में हालिया ज़माने की सबसे महत्वपूर्ण किताब है।  अपनी किताब में काशेफ़ी ने एक अध्याय, राजनीति में नैतिकता के नाम से जोड़ा है जिसमें शासकों, उनके मंत्रियों और अधिकारियों के कर्तव्यों के बारे में चर्चा की गई है।  अख़लाक़े मोहसेनी पर लिखे गए फुटनोट्स इस समय वियना के सूमेए पुस्तकालय में मौजूद हैं।

नैतिकता पर फ़ारसी भाषा में लिखी जाने वाली पुस्तकों को दो शैलियों में लिखा गया है।  एक राजनीतिक आयाम से और दूसरी धार्मिक आयाम से।  राजनीति शैली में लिखी जाने वाली पुस्तकों में ऐसे राजनैतिक सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है जिनकी जड़ें नैतिकता में निहित हैं।  राजनीतिक आयाम से लिखी जाने वाली पुस्तकों में ख़ाजा निज़ामुलमुल्क तूसी की किताब को पेश किया जा सकता है जबकि धार्मिक आयाम से अहकामुस्सुल्तानिया का नाम लिया जा सकता है।  इसके अतिरिक्त कुछ लेखकों ने ऐसी शैली अपनाई है जिसमें राजनैतिक और धार्मिक दोनों ही आयाम पाए जाते हैं।  ईरान में इस प्रकार की शैली, शताब्दियों से प्रचलित  है।

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अख़लाक़े मोहसेनी नामक पुस्तक में यह बताया गया है कि मनुष्य मूल रूप से सामाजिक प्रवृत्ति का है जिसे सामाजिक पशु की संज्ञा दी गई है।  इस किताब के हिसाब से मनुष्य को एक समाज की आवश्यकता है जो क़ानून पर आधारित हो।  इसमें क़ानून की सूचि में इस्लामी क़ानून को सबसे महत्वपूर्ण क़ानून बताया गया है।  काशेफ़ी का कहना है कि शासकों को धार्मिक नियम का लागू करने वाला होना चाहिए और सबसे पहले स्वयं उनको धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए।

काशेफ़ी ने अपनी पुस्तक में शासकों के लिए 40 नियम निर्धारित किये हैं।  इन चालीस नियमों को उन्होंने 40 अलग-अगल अध्यायों में बयान किया है।  उन्होंने प्रत्येक अध्याय का आरंभ पवित्र क़ुरआन की आयत या पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथन से किया है।  हर अध्याय में लिखे नियम के अनुरूप ही उन्होंने आयतों और कथनों का चयन किया है।  हर अध्याय के समापन पर काशेफ़ी ने कुछ शेख़ लिखे हैं।  इन अध्यायों में काशेफ़ी ने उपासना, निष्ठा, धैर्य, भरोसे, वीरता, समय के सदुपयोग और इसी प्रकार की नैतिक विशेषताओं का उल्लेख करके बताया कि यह विशेषताएं शासक के भीतर होनी चाहिए।

अख़लाक़े मोहसेनी में काशेफ़ी ने जो कहानियां प्रयोग की हैं उनमें नैतिक पाठ छिपा हुआ है।  कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने जिन कहानियों का प्रयोग अपनी किताबों में किया है उनका उदाहरण उनसे पहले बहुत कम ही मिलता है।  उनकी किताबों में सम्राट अकबर, ईरान के प्राचीन राजाओं और इसी प्रकार के बहुत से क़िस्से देखने को मिलते हैं।

एसे काल में कि जब शासकों के क्रियाकलापों से घुटन का माहौल पैदा हो गया था काशेफ़ी ने बड़ी सूझबूझ से नैतिक उपदेश देकर यह बताने का प्रयास किया कि सरकार को चलाने के लिए शासक के लिए अनिवार्य है कि वह नैतिक नियमों का कड़ाई से पालन करे।  उन्हें इन बातों को बहुत ही सरल भाषा में पेश किया है।  इसकी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने काल में जटिल भाषा में प्रयोग की जाने वाली शैली से अलग हटकर सरल और साधारण भाषा का प्रयोग किया है।

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काशेफ़ी की रचनाओं के आलोचकों का कहना है कि वे राजनीति के क्षेत्र में केवल उपदेशों की सीमा तक सीमित रहे हैं जिसके अन्तर्गत उन्होंने कहीं-कहीं पर उपदेशों के अन्तर्गत कहानियों और कथाओं का सहारा लिया है।