May ०१, २०१७ ०८:५० Asia/Kolkata

अब तक वाएज़ काशेफ़ी की मशहूर किताब ‘मवाहिबुन अलैह’ की पान्डुलीति या हाथ से लिखी किताब की सैकड़ों प्रतियों की सूचि ईरान, केन्द्रीय एशिया, पाकिस्तान और भारत में दर्ज हैं।

यह किताब ‘तफ़ीसीरे हुसैनी’ के नाम से भी जानी जाती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि वाएज़ काशेफ़ी की पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की किताब साहित्यिक सहित अन्य विशेषताओं की दृष्टि से बेजोड़ किताब है। यह किताब ‘तफ़सीरे मुल्ला’ के नाम से भी जानी जाती है। यूं तो काशेफ़ी पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की विभिन्न शाखाओं के ज्ञानी थे, ‘मवाहिबुन अलैह’ में उन्होंने यदा कदा ही भाषा विज्ञान, शब्दावली और धर्मशास्त्र की विशेष शाखा कलाम की दृष्टि से चर्चा की है। उन्होंने पहले पवित्र क़ुरआन की आयत का सरल व संक्षेप रूप में फ़ारसी में अनुवाद किया और कुछ दूसरी आयतों से विशेष आयत की व्याख्या की है। उसके बाद दूसरी तफ़सीरों तथा सूफ़ियों के विभिन्न पंथ के मानने वालों के गद्य व पद्य के हवाले के साथ पवित्र क़ुरआन की एक संक्षिप्त तफ़सीर पेश की है।

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पवित्र क़ुरआन की फ़ारसी में व्याख्या का इतिहास चौथी हिजरी क़मरी के विख्यात विद्वान अबू जाफ़र मोहम्मद बिन जरीर तबरी की मशहूर किताब ‘जामेउल बयान’ के अनुवाद से शुरु हुआ। तबरी की तफ़सीर की किताब तफ़सीरे तबरी के नाम से भी मशहूर है। जिस समय धर्मगुरु फ़ारसी भाषा में पवित्र क़ुरआन का अनुवाद और व्याख्या को सही समझते थे वह सामानी शासक अबू सालेह मंसूर बिन नूह का दौर था। वह अनुवाद व व्याख्या के काम को प्रोत्साहित करते थे। उनका शासन ख़ुरासान और ट्रैनसोज़ैनिया के क्षेत्र तक फैला हुया था। फ़ारसी भाषा में अनुवाद का शुरु होना था कि दूसरी किताबों के अनुवाद का तांता लग गया। तबरी के फ़ारसी अनुवाद के लगभग डेढ़ सौ साल के दौरान पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की दो अहम किताबें लिखी गयीं एक रौज़ुल जेना व रूहुल जेनान थी जिसके लेखक अबुल फ़ुतूट राज़ी हैं। दूसरी किताब कशफ़ुल असरार व एदतुल अबरार है जिसके लेखक रशीदुद्दीन मैबुदी हैं।                     

तफ़सीरे अबुल फ़ुतूह राज़ी फ़ारसी भाषा में पहली शिया धर्मगुरु द्वारा पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर है। पवित्र क़ुरआन की यह तफ़सीर या व्याख्या अत्तिबयान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरआन की अहम शिया तफ़सीर से मिलती जुलती है। अत्तिबयान फ़ी तफ़सीरिल क़ुरआन पांचवीं हिजरी क़मरी के शिया धर्मगुरु मोहम्मद अबु जाफ़र तूसी ने अरबी भाषा में लिखी है। रशीदुद्दीन मीबदी की किताब कश्फ़ुल असरार को पवित्र क़ुरआन की सूफ़ीवाद के प्रभावित एक साहित्यिक व्याख्या के रूप में पेश किया जा सकता है। यह किताब फ़ारसी भाषा में पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की एक नई शैली का नमूना समझी जाती है। इस व्याख्या में हर आयत तीन भाग में विभाजित है। पहला आयत का फ़ारसी में शब्दशः अनुवाद और पवित्र क़ुरआन कि आयतों से उसके वास्तविक अभिप्राय के बारे में चर्चा। दूसरे भाग में आयत की शब्दावली, आयत के बारे में रवायत और धर्मशास्त्र की दृष्टि से वर्णन है और तीसरे भाग में विषयों का अरबी और फ़ारसी दोनों में वर्णन है और आयतों के बारे में सूफ़ी मत के विचार पेश हैं। इस भाग में ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी हेरवी, क़शीरी और सूफ़ी मत की दूसरी हस्तियों की व्याख्या का वर्णन है।

वाएज़ काशेफ़ी की ‘मवाहिबुन अलैह’ कि जिसका संकलन 897 से 899 के बीच हुआ है, मैबुदी तफ़सीर की तरह पवित्र क़ुरआन की साहित्यिक व सूफ़ी व्याख्या की श्रेणी में आती है। काशेफ़ी ने पवित्र क़ुरआन की बड़ी व्याख्या के उद्देश्य से ‘जवाहेरुल तफ़सीर’ नामक किताब लिखनी शुरु की ताकि तत्कालीन शासक हुसैन बायक़रा के मंत्री अमीर अलीशीर नवाई को तोहफ़े के तौर पर दें जो उनके समर्थक थे। वाएज़ काशेफ़ी पूरे क़ुरआन की व्यापक व्याख्या लिखना चाहते थे लेकिन जब पवित्र क़ुरआन के चौथे सूरे तक पहुंचे तो ‘जवाहेरुल तफ़सीर’ का काम अधूरा छोड़ दिया लेकिन कुछ साल बाद ‘मवाहिबुन अलैह’ शीर्षक के तहत पवित्र क़ुरआन की बहुत ही संक्षिप्त व्याख्या लिखी और उसे अमीर अलीशीर नवाई को भेंट की।

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काशेफ़ी ने ‘मवाहिबुन अलैह’ में कश्फ़ुल असरार मैबुदी की तरह आम बातों को सूफ़ी मत के विचारों के साथ मिला दिया है। काशेफ़ी ने मीबदी के स्रोतों को हवाले के तौर पर पेश करने के साथ साथ इबने अरबी, अब्दुर्रज़्ज़ाक़ काशानी, सदरुद्दीन क़ूनवी जैसी सूफ़ी हस्तियों, किबरविया और नक़्शबंदिया मत की हस्तियों की बातें भी अपनी व्याख्या में पेश की हैं। इसी प्रकार वाएज़ काशेफ़ी ने ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी, सनाई, फ़रीदुद्दीन अत्तार, जलालुद्दीन मोहम्मद मोलवी और अब्दुर्रहमान जामी के शेर भी अपनी तफ़सीर में पेश किए हैं।

पवित्र क़ुरआन की किसी आयत की शेर के ज़रिए व्याख्या काशेफ़ी से बहुत पहले सूफ़ी मत के व्याख्याकर्ताओं की शैली रही है लेकिन काशेफ़ी ने इस शैली को नए स्तर पर पहुंचाया। वाएज़ी की ‘मवाहिबुन अलैह’ में शायद ही कोई पेज ऐसा हो जिसमें कई शेर का उल्लेख न हो। पवित्र क़ुरआन की आयत की व्याख्या में शेर का इस्तेमाल उस दौर में सूफ़ी व्याख्याकर्ताओं की शैली रही है। ग़ैर सूफ़ी व्याख्याकर्ता शेर को पवित्र क़ुरआन की आयत के वाक्यों और मोर्फ़ो फ़ेनेमिक्स के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करते थे।                

‘मवाहिब अलैह’ किताब की अहमियत सिर्फ़ इस वजह से नहीं है कि यह एक मशहूर किताब है बल्कि इसकी अहमियत इसलिए ज़्यादा है कि इस किताब से बाद में अरबी और फ़ारसी में पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकार प्रभावित हुए हैं। मुल्ला फ़त्हुल्लाह काशानी जो सफ़वी शासन काल के आरंभिक समय के व्याख्याकार हैं, पवित्र क़ुरआन की व्याख्या पर आधारित अपनी किताब ‘मिनाहजुस सादेक़ीन फ़ी इलज़ामिल मुख़ालेफ़ीन’ में फ़ारसी अनुवाद से फ़ायदा उठाया है और इस किताब का शब्दशः अनुवाद वाएज़ काशेफ़ी की किताब ‘मवाहिब अलैह’ से मिलता जुलता है। काशानी ने विषयवस्तु को उसी क्रम में पेश किया है जिस तरह वाएफ़ काशेफ़ी ने पेश किया है लेकिन इसके साथ ही काशानी ने अमुक आयत की व्याख्या के मुख्य अरबी स्रोत के उद्धरण और दूसरी रवायतों के हवाले के साथ पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की अपनी किताब को विस्तृत किया है। इन दोनों किताबों के बीच सबसे अहम फ़र्क़ यह है कि वाएज़ काशेफ़ी ने ऐसी बातें नहीं पेश कीं जिससे सांप्रदायिक भावना आहत हो जबकि काशानी ने ऐसा किया है और बहुत सी आयतों की शिया दृष्टिकोण से विवेचना की है।

एक और व्याख्याकार जिन पर काशेफ़ी का प्रभाव नज़र आता है वह इस्माईल हक़्क़ी ब्रूसवी हैं। इस्माईल हक़्क़ी ब्रूसवी पवित्र क़ुरआन के तुर्क ज़बान में व्याख्याकार हैं। इस्माईल हक़्क़ी ने अपनी किताब ‘रूहुल बयान’ में जगह जगह पर काशेफ़ी का हवाला दिया है। हालांकि हक़्क़ी की व्याख्या की यह किताब अरबी भाषा में है लेकिन किसी कथन का हवाला देने की शैली के ज़रिए काशेफ़ी की तफ़सीर की किताब में वर्णित फ़ारसी शेरों का अपनी तफ़सीर की किताब में बहुत ज़्यादा वर्णन किया है।

‘मवाहिब अलैह’ मूल रूप से पवित्र क़ुरआन की तफ़सीर अर्थात व्याख्या की ऐसी किताब है कि उसके बारे में यह कह सकते हैं कि व्याख्याकार ने दूसरों की बातों व हवालों को चुना और उसे सुव्यवस्थित करके दूसरों तक पहुंचाने की कोशिश की है। ‘मवाहिब अलैह’ में काशेफ़ी ने सूफ़ी धर्मगुरुओं के बीच प्रचलित जटिल विषयों का उल्लेख नहीं किया है बल्कि इसके विपरीत कहानियों, शेरों और व्याख्या को अपनाया। इस शैली के नतीजे में उन्होंने पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की ऐसी किताब पेश की है जो आम लोगों को आसानी से समझ में आने वाली है ख़ास तौर पर वे लोग जिन्हें क़ुरआन की तफ़सीर के जटिल बिन्दुओं में कोई रूचि नहीं है।

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काशेफ़ी की किताब ‘मवाहिब अलैह’ के मशहूर होने की एक वजह उसकी लेखन शैली है। उन्होंने पवित्र क़ुरआन की आयत का अनुवाद सरल अंदाज़ में पेश किया है और आयत की व्याख्या भी बहुत ही रोचक अंदाज़ में पेश की है जिसे समझना पढ़ने वाले के लिए मुश्किल नहीं है। उन्होंने आयत के नाज़िल होने के समय का उल्लेख किया है और उसके अर्थ को पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन से जोड़ने की कोशिश की है।  उन्होंने आयत की व्याख्या में रवयात बयान करने वालों की बातें और किसी आयत के बारे में पद्य रूप में कही गयी बात को अपनी तफ़सीर में पेश किया है। उनकी इस शैली ने ही उनकी किताब को साहित्यिक विशेषता प्रदान की है। उनकी तफ़सीर पढ़ने में बहुत ही रोचक है। ‘मवाहिब अलैह’ में अरबी उद्धरण के कम इस्तेमाल की वजह से उन पाठकों के लिए जिन्हें अरबी ज़बान की अधिक जानकारी नहीं है और वे ‘कश्फ़ुल असरार’ जैसी किताब को समझना चाहते हैं, ‘मवाहिब अलैह’ को समझना आसान है। ‘मवाहिबुन अलैह’ में धर्मशास्त्र की नज़र से विवादित विषय का हाशिये पर वर्णन किया है। काशेफ़ी अपनी तफ़सीर में किसी विषय के शिया या सुन्नी दृष्टिकोण से वर्गीकरण से दूर रहे इसी वजह से वह एक ऐसे लेखक के रूप में सामने आए कि सूफ़ी मत की ओर रुझान रखने वाले शिया और सुन्नी दोनों ही मत के लोग वाएज़ काशेफ़ी को अपना समर्थक समझते हैं।