इस्लाम और मानवाधिकार-41
ऐतिहासिक प्रमाण इस बात के साक्षी रहे हैं कि क़ानून की भूमिका सदैव से ही मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण रही है।
क़ानून उसे कहते हैं जो सामाजिक जीवन में मनुष्य के लिए यह निर्धारत करता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नही करना चाहिए। बिना क़ानून के जीवन, समस्याओं और कठिनाईयों से ग्रस्त हो जाता है। सामाजिक संबंधों के जटिल होने के बाद मनुष्य इस निषकर्ष पर पहुंचा है कि सफल एवं संकट रहित जीवन व्यतीत करने के लिए क़ानून का होना बहुत ज़रूरी है।
क़ानून उन नियमों का संग्रह है जिसे विशेषज्ञ बनाते हैं। क़ानून में व्यक्ति, समाज और सरकार के परस्पर संबन्धों को स्पष्ट किया जाता है। क़ानून में सबके अधिकारों को समान रूप से बांटा जाता है। क़ानून को समाज के हर वर्ग, वर्ण और गुट के हित में होना चाहिए। क़ानून उसी को कहते हैं जिसके अनुसार हर व्यक्ति या गुट के हितों की पूर्ति दूसरों के हितों से समन्वित हो। इसका मुख्य कारण यह है कि वह मानव के वैध अधिकारों को स्पष्ट करते हुए लोगों के मूल दायित्वों को निर्धारित करता है। कहा जाता है कि यदि क़ानून न हो तो लोग भटकते रह जाएंगे और उनके लिए यह स्पष्ट नहीं होगा कि उनके दायित्व क्या हैं? वास्तव में यह क़ानून ही है जो आवश्यक दायित्वों के निर्वाह को निर्धारित करता है। इन बातों से यह निष्कर्श निकलता है कि समाज को बाक़ी रहने और शांतिपूर्ण जीवन गुज़ारने के लिए क़ानून की आवश्यकता है।
क़ानून का प्रभुत्व, क़ानून का ही एक मूल स्तंभ है जिसके आधार पर जीवन के हर क्षेत्र में क़ानून का बोलबाला होना चाहिए। इसके अनुसार क़ानून लागू करने वालों और आम लोगों, सबको क़ानून का पूरा सम्मान करना चाहिए। यदि इस बात को व्यवहारिक बनाया जाए तो समाज से अन्याय और क़ानून लागू करने वालों की ओर से की जाने वाली ज़ोर ज़बरदस्ती को समाप्त किया जा सकता है। आम नागरिकों के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित बनाने के लिए भी क़ानून के प्रभुत्व की ही आवश्यकता पड़ती है।
कहते हैं कि कोई भी व्यवस्था उसी समय उपयोगी होगी जब उसमें मानवजाति के हर आयाम को दृष्टिगत रखा जाए। उसका मुख्य लक्ष्य यह होना चाहिए कि लोग, लोक-परलोक दोनों जगहों पर सफल रहें। यह एसी व्यवस्था है जो मनुष्य को कभी भी उसके हाल पर नहीं छोड़ती चाहे मनुष्य व्यक्तिगत जीवन व्यतीत करे या सामाजिक।
अन्य समाजों की ही भांति इस्लामी समाज को भी अपने लिए क़ानून की आवश्यकता है। अब सवाल यह पैदा होता है कि क़ानून बनाने का अधिकार है किसे? ऐसा कौनसा क़ानून है जो इस्लामी जगत को उसके लक्ष्य की ओर ले जा सकता है? यह बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि अपने सीमित ज्ञान और लोगों के अधिकारों एवं उनकी सही ज़िम्मेदारियों से पूर्ण रूप से अवगत न होने के कारण मानवजाति के लिए क़ानून बनाना मनुष्य के बस की बात नहीं है। मानव इतिहास के अध्धयन से पता चलता है कि क़ानूनों में लगातार परिवर्तनों की प्रक्रिया इस बात की सूचक है कि संपूर्ण मानवजाति के लिए उचित क़ानून बनाने की क्षमता किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के दल के बस की बात नहीं है। यह काम केवल ईश्वर से ही विशेष है क्योंकि वह पूरी मानवता से भलिभांति अवगत है और उसी ने ही सृष्टि की रचना की है। पश्चिमी विचाधाराओं के विपरीत इस्लामी नियमों के निर्धारण का अधिकार केवल सर्वगुण संपन्न ईश्वर को ही है।
इस्लामी दृष्टिकोण के हिसाब से ईश्वर द्वारा बनाए गए क़ानून को ईश्वरीय संदेश अर्थात वहय के माध्यम से आना चाहिए। यही कारण है कि ईश्वरीय क़ानून ईश्वरीय दूतों के माध्यम से लोगों तक पहुंचे हैं। इस्लाम के क़ानून पवित्र क़ुरआन के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के माध्यम से लोगों तक पहुंचे हैं। ईश्वर द्वारा बनाए गए क़ानून दो प्रकार के होते हैं स्थिर और अस्थिर। अस्थिर क़ानून, स्थान और परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं। इस्लामी नियमों को ईश्वरीय प्रतिनिधि के माध्यम से लागू होना चाहिए जिनमें सर्वोपरि पैग़म्बरे इस्लाम (स) हैं। उनके बाद पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का नंबर आता है और अंत में उनका नंबर है जिन्हें पैग़म्बर या इमाम ने निर्धारित किया हो।
ईश्वरीय क़ानून की महत्वपूर्ण विशेषता, इन क़ानूनों का नैतिकता के साथ मिला होना है। व्यक्ति या समाज के स्तर पर क़ानून लागू करने में नैतिकता की अति महत्वपूर्ण भूमिका है। नैतकिता के कारण ईश्वरीय शिक्षाएं, लोगों के अस्तित्व में रचबस जाती हैं। यही कारण है कि ईश्वर के नेक बंदे, पूरी निष्ठा के साथ ईश्वरीय नियमों का पालन करते हैं। उनका मानना है कि ईश्वरीय क़ानून, मानव की सृष्टि के अनुरूप हैं जिसकी वजह से लोग इन नियमों का पालन पूरी तनमयता से करते हैं। हमारे हर काम को चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामाजिक, उसे नियमों के अनुरूप होना चाहिए। इस्लाम ने व्यक्ति और समाज सबके लिए जीवन के हर क्षेत्र में क़ानून निर्धारित किये हैं।
सामाजिक जीवन की भौतिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोगों का परस्पर सहयोग ज़रूरी है। किसी भी समाज में उत्पन्न होने वाले मतभेदों को समाप्त करने के लिए किसी व्यवस्था का होना ज़रूरी है जिसे सरकार कहा जाता है। इस्लाम की दृष्टि में सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार का होना अति आवश्यक है। स्वभाविक सी बात है कि किसी सरकार के न होने की स्थिति में सामाजिक जीवन में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए क़ानून का होना ज़रूरी है जिसे सरकार लागू करती है। यह क़ानून जितना भी प्रभावी एवं परिपूर्ण होगा, समस्याओं के समाधान में वह उतना ही प्रभावी सिद्ध होगा। एसा क़ानून केवल ईश्वर ही बना सकता है और उसको ही इसका अधिकार है।
इस्लाम की दृष्टि में व्यवस्था को चलाने के लिए सरकार का होना ज़रूरी है। वैसे बुद्धि भी इस बात को स्वीकार करती है कि समाज के संचालन के लिए किसी व्यवस्था का होना नितांत आवश्यक है। स्पष्ट सी बात है कि जब किसी समाज में सरकार नहीं होगी तो सामाजिक जीवन को नाना प्रकार की समस्याओं का सामना होगा। इन समस्याओं का समाधान एक सरकार ही क़ानून के माध्यम से कर सकती है। हम यह बात पहले भी कह चुके हैं कि वास्तव में शासन करने का मूल अधिकार तो केवल ईश्वर को ही है।
यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अन्य व्यवस्थाओं की भांति इस्लामी शासन व्यवस्था की स्थापना और उसका संचालन केवल आकांक्षाओं से नहीं होता बल्कि इसके लिए लोगों को आगे आना पड़ता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि शासन व्यवस्था का गठन लोगों के प्रयासों से ही होता है। इस्लामी सरकार और अत्याचारी सरकार के बीच मूल अंतर यह है कि इस्लामी सरकार का संचालन जनता की इच्छाओं के अनुरूप किया जाता है जबकि अत्याचारी, जनता पर अत्याचार करके अपनी सरकारें चलाते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस्लामी सरकार ईश्वरीय क़ानून के साथ ही जनता के सहयोग से संचालित होती है।