Aug १५, २०१५ ०७:५८ Asia/Kolkata

जवानी के दिन अधिक सुन्दर क्षण सुन्दर होते हैं और यह दिन जोश और भावनाओं से भरे होत हैं।

जवानी के दिन अधिक सुन्दर क्षण सुन्दर होते हैं और यह दिन जोश और भावनाओं से भरे होत हैं। इस उम्र में जवान मनोरंजन करते हैं, अच्छे और फ़ैशनेबल वस्त्र धारण करते हैं। वे सजते संवरते हैं एक दूसरे को आमंत्रित करते हैं और सैर सपाटे का आनंद लेते हैं। अधिकांश जवानों में कामों का आधार भावना होती है और कल और जीवन के भविष्य की परवाह किए बिना प्रसन्नता हमेशा उनके मन पर छायी रहती है। जवानी की अच्छी विशेषताओं के साथ ही, मगन रहना, विविधता को पसंद करना, परम्पराओं को तोड़ना और समाज एवं परिवार के नियमों की उपेक्षा करना जवानों को पसंद होता है। जीवन की ज़िम्मेदारी के प्रति जवान आशावान होते हैं और वे सीमित करने वाली हर बात और हर आचरण से बचते हैं।

 

 

ज़िम्मेदारी के तीन आयाम, व्यक्तिगत, सामाजिक और ईश्वरीय हैं, जो क्रमशः स्वयं, सृष्टि और ईश्वर से संबंधित हैं। व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी से तात्पर्य यह है कि इंसान को अपनी योग्यता की सीमा को अच्छी तरह पहचानना चाहिए और जितना भी संभव हो सके उसमें निखार लाना चाहिए। दूसरे शब्दों में ख़ुद पर जो ज़िम्मेदारी है उसे पूरा करे। निश्चित रूप से जब भी उसका जीवन इस प्रकार से गुज़रेगा, सफ़लता उसके क़दम चूमेगी और वह उसके जीवन का सुनहरा दौर होगा।

जब मां-बाप अपने प्यार से अपने तीन वर्षीय बच्चे को अपने खिलौने एकत्रित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, और बच्चा अपने छोटे छोटे हाथों से उन्हें उनकी जगह पर रखता है, तो वह ज़िम्मेदारी स्वीकार करने का पहला सुन्दर पाठ परिवार में सीखता है और बच्चा स्वाधीनता का पहला स्वाद चखता है। वर्षों बाद जवानी के काल में वह बच्चा अच्छी तरह यह जानता है कि ज़िम्मेदारी स्वीकार करने का अर्थ है कि जो काम जिस व्यक्ति को सौंपा जाए वह उसे अच्छी तरह अंजाम दे। स्वाधीनता की भावना उस समय शक्तिशाली होती है कि जब हममें से हर कोई इस बात का आभास करे कि हमने अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा का प्रदर्शन कर दिया है और ज़िम्मेदारी को स्वीकार करके अपनी गौरवपूर्ण प्रतिभा को प्राप्त कर लिया है।

 

 

ईश्वर से संपर्क और सृष्टि के प्रति ज़िम्मेदारी भी इंसान के व्यक्तित्व को उजागर करती है और स्पष्ट करती है कि वह दूसरी चीज़ों और जानवरों से विभिन्न है। बंदगी और दासता इस उज्जवल एवं मनमोहक वास्तविकता को ज़ाहिर करती है कि इंसान एहसास, भावना, विचार और पहचान रखता है। तार्किक रूप से सोचता है, बुद्धि के आधार पर फ़ैसला लेता है और समझकर अंजाम देता है और कभी अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने में फ़रिश्तों से भी बढ़ जाता है और ईश्वरीय उत्तराधिकारी होने का पद ग्रहण करता है।

वास्तव में जीवन में ज़िम्मेदारियों का होना एक ऐसी वास्तविकता है कि जिसका इनकार नहीं किया जा सकता और उसके अंजाम देने पर आयतें और रिवायतें बल देती हैं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया है, प्रलय के दिन कोई व्यक्ति क़दम नहीं आगे नहीं बढ़ाएगा, लेकिन यह कि उससे चार चीज़ों के बारे में सवाल कर लिया जाए। उसके वस्त्रों के बारे में कि किस प्रकार और किस मार्ग में वे घिसे और पुराने हुए? उसके जीवन की एकमात्र पूंजी आयु के बारे में कि किस प्रकार उसे ख़र्च किया और उसका अंत किया? उसकी संपत्ति के बारे में कि उसे किस प्रकार एकत्रित किया और किस तरह ख़र्च किया? और हम अहले बैत से मोहब्बत और प्रेम के बारे में?

यद्यपि बंदगी की ज़िम्मेदारियों को अंजाम देना कठिन होता है, लेकिन उससे आत्मा को प्राप्त होने वाली ख़ुशी कठिनाईयों पर क़ाबू पाने के लिए भूमि प्रशस्त करती है। यही कारण है कि जो कुछ विद्वानों का मानना है कि जो रास्ता स्वर्ग तक जाता है वह है ज़िम्मेदारियों का पूरा करना।

 

 

इसके अलावा, ज़िम्मेदारी को पूरा करने से युवाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और इससे वे बड़ी और व्यापक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के लिए तैयार होते हैं, इसके परिणाम स्वरूप सामाजिक विकास और प्रगति भी प्राप्त होती है।

जो युवा ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं और काम की दुनिया में प्रवेश करते हैं, तो वे जवानी के जोश का बेहतर ढंग से इस्तेमाल करते हैं और सामाजिक, वैचारिक एवं भावनात्मक रूप से तेज़ी से प्रगति करते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि जवानों को कार्य करने के दौरान इस बात का अवसर प्राप्त होना चाहिए कि वे अपने विचारों को व्यवहारिक बना सकें और अपने विकास में प्रगति ला सकें, अपनी सामाजिक भूमिका को पूरा करने के लिए योजना बना सकें और जीवन के कार्यक्रमों को निर्धारित कर सकें। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर सब लोग अपनी जिम्मेदारियां पूरी करें तो समाज तेज़ी से विकास करेगा और बहुत से अपराध कम हो जायेंगे। इस बीच, परिवार पहली ऐसी इकाई होती है जहां इंसान के व्यक्तित्व की रूपरेखा तैयार होती है और वह कर्तव्य के प्रति ज़िम्मेदार बनाने में अहम भूमिका अदा करती है।

 

 

युवाओं को ज़िम्मेदार बनाने के संबंध में मनोवैज्ञानिक डा. इब्राहीमी मुक़द्दम कहते हैं, युवाओं को ज़िम्मेदार बनाने के संबंध में अनेक बातें पेश की गई हैं, उनमें से एक यह सिद्धांत है कि हम उस समय सामाजिक ज़िम्मेदारी को अदा कर सकते हैं कि जब हम अपने निकट संबंधियों के प्रति ज़िम्मेदारी का एहसास रखते हों। दूसरे शब्दों में हम एक युवक से उस समय ज़िम्मेदारी अदा करने की आशा कर सकते हैं कि जब वह अपने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करता हो।

दूसरी चीज़ों से इंसान का स्पष्ट अंतर बुद्धि और तर्क के आधार पर है। इंसान एक ज़िम्मेदार प्राणी के रूप में ख़ुद अपने प्रति, सृष्टि और ईश्वर के प्रति ज़िम्मेदार है। जो लोग अपनी इस ज़िम्मेदारी के प्रति जागरुक रहते हैं वे कभी नहीं भटकते और असमंजस में नहीं पड़ते। निश्चित रूप से युवा नस्ल की इस प्रकार की सूझबूझ मानवीय पूंजी के नष्ट न होने का कारण बनती है और जीवन के सदउपयोग के लिए अच्छा अवसर प्रदान करती है।

इसके विपरीत हीनभावना, आत्मविश्वास का अभाव, नकारात्मक सिफ़ारिशें, अपमान और ज्ञान की कमी भय और डर के प्रबल होने का कारण बनते हैं और इसी के साथ इरादे को कमज़ोर, ज़िम्मेदारी से फ़रार और आराम की इच्छा उत्पन्न करते हैं। इसी के दृष्टिगत, भय विफ़लता, अपमान और गुणों एवं जीवन के सुन्दर मूल्यों की कमी का कारण बनता है। धार्मिक शिक्षाओं में भय को जहां एक व्यक्तिगत अनैतिकता के रूप में परिचित कराया गया है, वहीं इस समस्या से निपटने का समाधान भी पेश किया गया है। हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं, उत्साहहीनता, काहेली और अक्षमता समस्त इंसानों विशेष रूप से जवानों के लिए एक गंभीर समस्या है और दृढ़ता इस दर्द का बेहतरीन इलाज है।

 

 

अगर इस वास्तविकता को स्वीकार कर लिया जाए कि यह दुनिया, प्रतिस्पर्धा का मैदान है और इसमें दौड़ने से अधिक सबसे तेज़ दौड़ना महत्वपूर्ण है, तो इंसान कभी भी लापरवाही और सुस्ती से काम नहीं लेगा और आज-कल आज-कल करके अहम ज़िम्मेदारियों को टालेगा नहीं। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने उत्साहहीनता और सुस्ती से दूर रहने के लिए ईश्वर से दुआ की है और कहा है कि हे पालनहार, मैं उत्साहहीनता और सुस्ती से तेरी शरण चाहता हूं।

मनोवैज्ञानिक विचारों के शुद्धिकरण पर बहुत बल देते हैं और यह सफ़लता, ज़िम्मेदारी का एहसास एवं गौरव की शुरूआत है। इस चरण में इंसान के मन में बैठ जाने वाले विचारों को सकारात्मक विचारों में बदलना चाहिए और उन्ही के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। इस चरण के बाद, कदापि इस प्रकार के शब्दों का कोई स्थान नहीं रह जाता कि मैं नहीं कर सकता, मैं नहीं चाहता, मैं डरता हूं, मैं बहुत दुर्भाग्यशाली हूं।

धार्मिक शिक्षाओं में अक्षमता के प्रदर्शन का अर्थ जीवन के विभिन्न आयामों में ईश्वर की इच्छा की उपेक्षा है और इसकी बहुत निंदा की गई है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, ग़लत अनुमान लगाना उसी चीज़ के आधार पर है जो अपने मन में सोचते हो, अगर आसान समझोगे तो आसान है और अगर कठिन समझोगे तो कठिन है और अगर उपेक्षा करोगे तो कुछ नहीं होगा।

 

 

इस्लामी संस्कृति में नई शैलियों से लाभ उठाना और ज़िम्मेदारियों को स्वीकार करने के प्रति युवाओं के प्रोत्साहन के लिए परोक्ष मार्गों का इस्तेमाल बहुत महत्वपूर्ण है। इन शैलियों में से एक शैली युवाओं के लिए महान हस्तियों के जीवन का उल्लेख करना और उन्हें उनके जीवन से परिचित करवाना है। इसी प्रकार, युवाओं को जीवन से संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना ज़िम्मेदारी स्वीकार करने के मार्ग में महत्वपूर्ण क़दम है।

दूसरी ओर, युवाओं का ध्यान इस बिंदु की ओर दिलाना कि वे हर स्थिति में ईश्वर के समक्ष उपस्थित हैं और जो भी ज़िम्मेदारी वे स्वीकार करेंगे, ईश्वर उसका साक्षी है, युवाओं में नैतिकता के विकास की भूमि प्रशस्त करने का कारण बनता है और इस प्रकार, वे इस बात का ध्यान रखेंगे कि हमेशा ईश्वर को याद रखें ताकि स्वयं भी सुरक्षित रहें और सही जानकारी प्राप्त कर सकें।