शेख़ नजमुद्दीन कुबरा -1
नजमुद्दीन कुबरा का जन्म 540 हिजरी क़मरी में प्राचीन इलाक़े ख़्वारिज़्म के एक शिक्षित एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ।
उनका नाम अहमद रखा गया। इस बच्चे ने आगे चलकर सूफ़ीइज़्म में नाम रोशन किया। उनका पूरा नाम अबू अब्दुल्लाह अहमद बिन उमर बिन मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह हयूक़ी ख़्वारेज़मी है। वे नजमुद्दीन कुबरा और शेख़ वली तराश के लक़ब से मशहूर हैं। उन्होंने सूफ़ीइज़्म के कुबरविया मत की आधारशीला रखी। बेदिल और अन्य लूफ़ियों ने उनका अनुसरण किया। उनके लक़ब के बारे में शोधकर्ताओं की राय अलग अलग है। कुछ का मानना है कि अधिक बुद्धिमानी होने के कारण उन्हें कुबरा का लक़ब दिया गया, अन्य कुछ लोगों का मानना है कि क्योंकि वे युवावस्था में वाद विवाद में काफ़ी महारत रखते थे, इसलिए उन्हें यह लक़ब दिया गया।
उनके कुछ अनुयाईयों ने सम्मानपूर्वक उन्हें आयतुल कुबरा कहा है, आगे चलकर केवल कुबरा ही बाक़ी रह गया। लेकिन उन्हें शेख़ वली तराश इसलिए कहा जाता था, क्योंकि कई वरिष्ठ सूफ़ियों ने उन्हीं से प्रशिक्षण लिया था। रूसी ओरिएंटलिस्ट बर्टल्स का नजमुद्दीन कुबरा के बारे में कहना है कि यद्यपि उन्हें नजमुद्दीन कहा गया, लेकिन वे तारा नहीं बल्कि सूर्य थे, जो रहस्यवाद की दुनिया के पूरब से उदय हुआ और पूरे इस्लामी जगत पर छा गया, इराक़, फ़ार्स, ख़ुरासान, ट्रांसऑक्सेनिया और अन्य इलाक़ों में उनके अनुयाईयों ने उनकी दहलीज़ पर श्रद्धा से सिर झुकाया और उनमें से हर एक किसी इलाक़े का ध्रुव बन गया।
नजमुद्दीन ने प्राथमिक शिक्षा अपने वतन में ही प्राप्त की। जवानी में ही उनके व्यक्तित्व ने ख़्वारिज़्म के गुरुओं का ध्यान अपनी ओर खींचा। बाप और अपने गुरुओं की सलाह के अनुसार वे यात्रा पर निकल गए। निशापुर, इस्फ़हान, हमदान, तबरेज़, ख़ुज़िस्तान, हिजाज़ और मिस्र की सैर की और ज्ञान प्राप्ति के अलावा, अपने समय के वरिष्ठ सूफ़ियों से परिचित हुए। नजमुद्दीन ने जवानी में ही अपना वतन त्याग कर अपनी उम्र के बेहतरीन दिन जंगलों, पहाड़ों और घाटियों की ख़ाक छानने में बिताए, जिस विद्वान के बारे में भी सुनते थे, उसने मिलने और सीखने पहुंच जाते थे। यही कारण है कि वे केवल एक दक्ष सूफ़ी या रहस्यवादी नहीं थे, बल्कि वे क़ुरान के एक दक्ष व्याख्याकार, हदीस का उच्च ज्ञान रखने वाले, बेहतरीन खगोलशास्त्री, शोधकर्ता, साहित्यकार और दर्शनशास्त्री थे।
उन्होंने जवानी की शुरूआत में ही मिस्र की यात्रा की और वहां तत्कालीन वरिष्ठ रहस्यवादी एवं सूफ़ी शेख़ रोज़बहान वज़ान मिस्री के पास गए और उनसे शिक्षा प्राप्त की। अपनी किताब जवाहेरुल असरार में नजमुद्दीन कहते हैं, इस मिस्री विद्वान से शिक्षा प्राप्त करने और उनके मार्गदर्श में निरंतर रियाज़त एवं तपस्या से मुझे रहस्यवाद का उच्च स्थान प्राप्त हुआ और मैंने आध्यात्मिक जगत के उच्च चरणों का अनुभव किया।
नजमुद्दीन शेख़ रोज़बहान के विशिष्ट शिष्यों में से थे और बहुत ही कम समय में उच्च दर्जे पर पहुंचने के कारण, शेख़ के लिए इतने प्रिय थे कि उन्होंने उनसे अपनी लड़की की शादी कर दी। वे स्वयं इस बारे में कहते हैं, शेख़ ने मुझे पसंद किया और मुझे अपने बेटे के रूप में स्वीकार कर लिया और अपनी बेटी से मेरा विवाह कर दिया, जिससे मेरे दो बेटे पैदा हुए।
नजमुद्दीन मिस्र में रहने लगे, यहां तक कि उन्हें पता चला कि तबरेज़ में हदीस के दक्ष गुरु अबू मंसूर हफ़दा हदीस की शिक्षा देते हैं। वे ख़ुद इस बारे में कहते हैं, जब मैंने उनके बारे में यह सुना तो मुझे उनसे मिलने का शौक़ हुआ, मैं अपनी किताब शरहे सुन्ना उनकी सेवा में पढ़कर सुनाना चाहता था। शेख़ रोज़बहान से मैंने तबरेज़ जाने की आज्ञा ली और मैं अतीक़ चौक में स्थित सूफ़ियाना ख़ानक़ाह पहुंच गया। अबू मंसूर से शिक्षा प्राप्ति के दौरान, नजमुद्दीन का बाबा फ़रज तबरेज़ी से परिचय हुआ। उन्होंने उनकी सेवा में रहकर रहस्यवाद के उच्च दर्जों पर पहुंचे। इसके बाद नजमुद्दीन ने अनेक गुरुओं से लाभ उठाया और ज्ञान प्राप्त किया और जो सीखने योग्य था, वह सीखा और जो अनुभव करने योग्य था, उसका अनुभव किया।
नजमुद्दीन के अंतिम उस्ताद शेख़ इस्माईल क़सरी थे, जो इरशाद का लबादा ओढ़े हुए थे। उन्होंने नजमुद्दीन को आदेश दिया कि मिस्र से अपने परिवार को लेकर लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए ख़्वारिज़्म वापस लौट जाएं। सूफ़ी उस्तादों में यह रिवाज था कि वे अपने शिष्यों को लबादा उढ़ाते थे। यह लबादा दो प्रकार का होता था, तबर्रुक और इरशाद। तबर्रुक वह लबादा होता था, जिसे सूफ़ी उस्ताद रियाज़त करके कुछ चरणों को तय करने वाले अपने अनुयाईयों को प्रदान करते थे, जो प्रेम की निशानी होता था। इसी कारण, यह लबादा कई उस्तादों से प्राप्त किया जा सकता था। लेकिन इरशाद और ख़िलाफ़त का लबादा केवल एक दक्ष एवं पूर्ण उस्ताद से ही हासिल किया जा सकता था। इस लबादे के साथ उस सूफ़ी को मार्गदर्शन और शिष्यों की प्रशिक्षा की अनुमति प्राप्त हो जाती थी।
नजमुद्दीन मिस्र वापस लौट गए। वहां कुछ समय उन्होंने वरिष्ठ सूफ़ियों से मुलाक़ात में गुज़ारा। उसके बाद, 35 वर्ष की उम्र में 575 हिजरी में अपने वतन की ओर लौट गए। ख़ीवे पहुंचकर जिसे आज जुर्जानिया के नाम से जाना जाता है, उन्होंने इस्लामी विषयों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उनका मदसरा बहुत कम समय में ही काफ़ी मशहूर हो गया और लोगों ने उसका ख़ूब स्वागत किया। विद्वान उनसे मिलने ख़्वारिज़्म पहुंचने लगे और उनके मदरसे में शिक्षा देने लगे।
शेख़ नजमुद्दीन इस्लामी विषय पढ़ाने के साथ साथ रहस्यवाद या सूफ़ीवाद में रूची रखने वाले शिष्यों को प्रशिक्षण भी देने लगे। शेख़ उन्हें प्रशिक्षण देते थे और सूफ़ी उस्तादों की परम्परा के अनुसार, उन्हें तपस्या और रियाज़त के निमय भी सिखाते थे, जब उनकी शिक्षा पूरी हो जाती थी औऱ वे रहस्यवाद के चरणों को तय कर लिया करते थे, तो वे विभिन्न इस्लामी देशों की यात्रा करते थे, ताकि रहस्यवाद और अध्यात्म के प्यासों की प्यास बुझा सकें।
कुबरविया मत के संस्थापक नजमुद्दीन कुबरा 618 हिजरी में 78 साल की उम्र में अतिक्रमणकारी मुग़लों से मुक़ाबला करते हुए शहीद हो गए। जब मुग़ल अतिक्रमणकारी ख़्वारिज़्म पहुंचे तो शेख़ ने अपने साथियों और अनुयाईयों को आदेश दिया कि अपने शहरों और देशों को वापस लौट जाएं। उन्होंने शेख़ से अनुरोध किया कि वे भी उनके साथ ख़्वारिज़्म से चलें, लेकिन शेख़ ने कहा, मुझे यहां से जाने की अनुमति नहीं है, मुझे यहीं शहीद होना होगा।
कहा जाता है कि चंगेज़ और उसके बेटों ने ख़्वारिज़्म पहुंचने से पहले बुख़ारा में पड़ाव डाला, और वे वहां के वरिष्ठ विद्वान क़ाज़ी ख़ान को अपने साथ ख़्वारिज़्म ले गए। जब वहां पहुंचे तो क़ाज़ी ख़ान ने उनसे कहा यहां सुल्तानुल मशाएख़ शेख़ नजमुद्दीन रहते हैं, उनका और उनके अनुयाईयों का अपमान नहीं होना चाहिए। चंगेज़ के बेटों ने जो अग्र-दूत थे, क़ाज़ी ख़ान को शेख़ के पास भेजा और कहा कि हमें आपसे और आपके अनुयाईयों से कोई लेना देना नहीं है। शेख़ और उनके अनुयाई कृपा करके शहर से बाहर चले जाएं, ताकि उनके साथ कोई अप्रिय घटना न घटे। क़ाज़ी ने जब यह संदेश दिया तो शेख़ ने कहा, मैंने 70 साल ख़ुशी से इन लोगों के बीच में रहकर गुज़ारे हैं। अब वक़्त पड़ने पर मैं इनसे अलग हो जाऊं, यह अपमान है। मुग़लों की फ़ौज ने ख़्वारिज़्म पर हमला कर दिया। शेख़ पूरे साहस के साथ दुश्मन से लड़े और लड़ाई के दौरान सीने में तीर लगने से शहीद हो गए।