May २३, २०१७ ०७:३९ Asia/Kolkata

पिछले कुछ वर्षों के दौरान बहुत तेज़ी से कुछ एसे परिवर्तन हुए हैं जिनसे यूरोपीय समाजों के वैचारिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा हो गयी हैं। 

वह क्षेत्र जहां पर उदारवादी लोकतंत्र का जन्म हुआ था और जहां से वह विश्व के अन्य क्षेत्रों में फैला था, वहीं पर उसे आज गंभीर चुनौतियों का सामना है।  वर्तमान समय में यूरोप में उदारवादी लोकतंत्र के सामने नाना प्रकार की चुनौतियां, मुंह बाए खड़ी हैं।  लिबरल डिमोक्रेसी में स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिवाद को विशेष महत्व प्राप्त है जो इसके मूल सिद्धांतों में शामिल है।  संस्कृति, राजनीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उदारवाद एक ऐसा वैचारिक सिद्धांत है जो एक प्रक्रिया के दौरान यूरोप में फलाफूला और फिर उतार-चढ़ाव से गुज़रता हुआ एक विचारधारा के रूप में सामने आया।  उदारवाद, समाज तथा राजनैतिक क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान अधिकारों का समर्थक है।

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उदारवादी विचारधारा में नागरिकों के मूल सिद्धांतों को इस प्रकार से वर्णित किया गया है।  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत व सामाजिक स्वतंत्रता तथा राजनीति में भागीदारी आदि।  लिब्रल सरकार की प्रमुख विशेषता यह है कि अर्थव्यवस्था, पूंजीनिवेश और स्वतंत्र आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हस्तक्षेप न करना।  उदारवादी सरकारों को अपने जीवनकाल में नाना प्रकार के एसे संकटों का सामना रहा है जिनके कारण वे आर्थिक उदारवादी नीतियों में परिवर्तन करने पर विवश हुई हैं।  वेलफेयर स्टेट और नियो लिबर्लिज़्म, इसी संकट की देन है।  वर्तमान समय में वेलफेयर स्टेट और नियो लिबर्लिज़्म, को भी गंभीर संकटों का सामना है।

बहुत से आर्थिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को कुछ समय के लिए तो आर्थिक संकट का सामना हो सकता है किंतु कुछ समय के बाद इस संकट में सुधार होगा और बाद में स्थिति सामान्य हो जाएगी।  हालांकि व्यवहारिक रूप से इस बात में कोई सच्चाई नहीं पाई गई।  इसका स्पष्ट उदाहरण सन 2008 की आर्थिक मंदी है।  सन 2008 से अमरीका में जो आर्थिक संकट आरंभ हुआ था वह अब भी जारी है।  इस आर्थिक संकट का शिकार कुछ पश्चिमी देश भी हुए हैं।  2008 के आर्थिक संकट ने तो कुछ देशों को दिवालियेपन की कगार तक पहुंचा दिया था।  आर्थिक संकट का शिकार इन सरकारों ने ख़र्चों में कटौती की नीति अपनाते हुए यूरोपीय संघ एवं आईएमएफ से ऋण लेकर किसी सीमा तक इस आर्थिक संकट को टाल तो दिया किंतु यह अब भी बाक़ी है।  इस नीति के आर्थिक दृष्टि से संकटग्रस्त देशों की अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं।  आर्थिक मंदी, मंहगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक दृष्टि से समाज में असमानता जैसी बातें, ख़र्चों में कटौती की नीति की ही देन हैं।

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पिछले एक दशक के दौरान दक्षिणपंथी व वामपंथी दलों की सरकारों ने अपने सत्ताकाल के दौरान आर्थिक संकट से निबटने में ख़र्चों में कटौती की नीति का सहारा लिया है।  यूरोप के कुछ देशों में दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण व्यापक स्तर पर उभरने वाले जनाक्रोश के परिणाम स्वरूप ही मध्यावधि चुनाव कराए गए।  इन मध्यावधि चुनावों में अतिवादी दक्षिणपंथी दल तेज़ी से राजनीतिक पटल पर उभरे।  दूसरे शब्दों में ख़र्चों में कटौती की नीति अपनाकर कई यूरोपीय देशों के शासनों को बहुत क्षति उठानी पड़ी है।  यूनान में पिछले तीन दशकों से अधिक समय से पूरे देश में सोशलिस्ट पार्टी का बोलबाला था किंतु वह भी इसी नीति का शिकार होकर टूट गई।  यूनान में एलेक्सिस सिप्रास के नेतृत्व वाली सरकार ने इस देश की सत्ता को अपने हाथों में लिया।  इस प्रकार से चार दशकों से स्पेन में दो पार्टियों पर आधारित व्यवस्था ध्वस्त हो गई और सोशिलिस्ट पार्टी अपने स्थान को सुरक्षित रखने में विफल रही।  वहां पर हालांकि कंज़रवेटिव्स दलों ने तुल्नात्मक रूप में संसद में अधिक सीटें प्राप्त कीं किंतु वे भी सरकार गठन करने में सफल नहीं हो सके।

वर्तमान समय में स्पेन की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय हो चुकी है।  दूसरी ओर आस्ट्रिया में राष्ट्रपति पद के चुनावों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी भी वामपंथी या दक्षिणपंथी दल का कोई भी प्रत्याशी, इन चुनावों में सफलता प्राप्त नहीं कर सका।  यूरोप में वर्तमान समय में सबसे बड़ा राजनैतिक परिवर्तन फ़्रांस में हुआ।  फ़्रांस एक एसा देश है जहां के परिवर्तन, यूरोप विशेषकर यूरोपीय संघ को बहुत प्रभावित करते हैं।  फ़्रांस के 2017 के राष्ट्रपति चुनाव ने इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक नए अध्याय को खोला।  फ़्रांस में मध्यमार्गी नेता इमैनुएल मैक्रों इस देश के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए।  मैक्रों को 66 दश्मलव 6 प्रतिशत वोट मिले।  उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी धुर दक्षिणपंथी नेता मैरी लपेन को हरा दिया जिन्हें 33 दश्मलव 94 प्रतिशत वोट मिले।  सन 1958 के बाद फ़ांस में पहली बार ऐसा हुआ है कि चुना गया राष्ट्रपति फ़्रांस के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, सोशलिस्ट और सेंटर राइट रिपब्लिकन पार्टी से नहीं हैं।

कहा जा रहा है कि यूरोप की सत्ता में अतिवादी दक्षिणपंथी दलों के सत्ता में पहुंचने कारक, मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के संकटग्रस्त देशों के नागरिकों का यूरोप, पलायन है।  यूरोप के अतिवादी दक्षिणपंथी दलों ने पलायन के विषय को बहुत ही नकारात्मक ढंग से पेश किया।  उन्होंने पलायनकर्ताओं के विरुद्ध अभियान आरंभ करके इस्लामोफ़ोबिया को हवा दी और यह दर्शाने का प्रयास किया कि यूरोप के वर्तमान आर्थिक संकट का कारण विदेशी पलायनकर्ता हैं।  इन अतिवादी दलों ने यह भी प्रचारित किया की यह पलायनकर्ता, यूरोप की सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा हैं।  अपनी बात को सिद्ध करने के लिए अतिवादी दलों ने यूरोप में की जाने वाली कुछ आतंकवादी कार्यवाहियों का हवाला देते हुए इसे पलायनकर्ताओं से जोड़ दिया।  उदारवादी और अतिवादी दक्षिणपंथी विचारधाराओं के बीच खुला विरोधाभास पाया जाता है।

यूरोप के जानेमाने राजनेताओं में से एक का नाम है, फ़्रैंक वाल्टर एश्टनमायर।  वे जर्मनी के राष्ट्रपति हैं।  एश्टनमायर कहते हैं कि यूरोप में लोकतंत्र के लिए गंभीर ख़तरे पैदा हो चुके हैं।  वे कहते हैं कि यहां पर तानाशाही की ओर झुकाव के चिन्ह स्पष्ट होने लगे हैं।  बहुत से लोग तो क़ानून पर ही सवाल उठाते हुए मिलजुलकर रहने को चुनौती दे रहे हैं।  उन्होंने कहा कि अब हमें उन बातों का भी समर्थन करना होगा जो एक समय तक अपरिवर्तनीय दिखाई देती थीं।  जर्मनी के राष्ट्रपति कहते हैं कि वर्तमान समय में यूरोप में लोकतंत्र की सुरक्षा एक ज्वलंत विषय बन चुका है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र के लिए ख़तरे पैदा किये जा रहे हैं।  फ़ैंक वाल्टर ने कहा कि इस समय पूरे यूरोप में ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं जिनके बारे में कुछ समय पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था।  यूरोपीय शासन व्यवस्थाओं का आधार, लिबरल्ज़िम या उदारवाद पर निर्भर है।  उदारवादी विचारधरा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का खुलकर समर्थन करती है।  इसके विपरीत राष्ट्रवादी और अतिवादी विचारधाराएं, व्यक्तिगत वर्चस्व, जातिवाद और दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता की समर्थक हैं।

एक समय एसा भी था जब यूरोप में भेदभाव, जातिवाद और इसी प्रकार की नकारात्मक बातों को बहुत ही गिरी नज़र से देखा जाता था किंतु इस समय इन्ही बातों को यूरोपीय संकट के समाधान का कारक बताया जा रहा है।  एक समय तक जो बातें, यूरोप को एकजुट करने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाया करती थीं उनको अतिवादी गुट अब सिरे से नकार रहे हैं।  वर्तमान समय में यूरोप में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को बुरी तरह से परेशान किया जा रहा है।  पियू अध्ययन केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार विश्व के अन्य देशों की तुलना में यूरोप में अल्पसंख्यकों को अधिक परेशान किया जाता है।