May २४, २०१७ ११:३३ Asia/Kolkata

हमने छठी हिजरी क़मरी के जानेमाने विद्धान शेख नजमुद्दीन कुबरा के व्यक्तित्व के बारे में चर्चा की थी। 

वे एक साहित्यकार, कवि, लेखक, तत्वज्ञानी और सूफ़ी थे।  शेख नजमुद्दीन कुबरा का जन्म वृहत्तर ख़ुरासान के “ख़ेवा” नामक नगर में हुआ था।  उन्होंने अपनी आरंभिक पढ़ाई, अपने ही गृह नगर से आरंभ की।  आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बहुत से स्थानों की यात्राएं कीं।  उनको जब भी किसी विद्धान के बारे में पता चलता तो ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे उस क्षेत्र की यात्रा करते थे।  यही कारण है कि शेख नजमुद्दीन कुबरा कई विषयों की जानकारी रखते थे।  वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र कथनों के भी ज्ञाता थे।

Image Caption

 

 

सन 575 हिजरी क़मरी में शेख नजमुद्दीन कुबरा अपनी मातृभूमि वापस आ गए।  वहां पर वे पढ़ने और पढ़ाने में लग गए।  शेख नजमुद्दीन कुबरा, सूफ़ीवाद के एक पंथ, “तरीक़ते कुबरा” के संस्थापक थे।  बताया जाता है कि सन 618 हिजरी क़मरी में जब मंगोलों ने हमला किया था तो इस हमले के दौरान वे मारे गए।  जिस समय मंगोलों ने हमला किया उस समय उन्होंने उनका डटकर मुक़ाबला किया।  हांलाकि यह भी कहा जाता है कि हमला करने से पहले मंगोलों ने उनके पास संदेश भेजा था कि नगर पर हमले से पहले यदि वे वहां से चले जाते हैं तो उनको कोई क्षति नहीं होगी।  शेख नजमुद्दीन कुबरा ने मंगोलों के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और नगर की रक्षा के लिए वे अपने अनुयाइयों के साथ मुक़ाबले के लिए निकल पड़े।  उन्होंने मंगोलों का डटकर मुक़ाबला किया और बाद में मंगोलों के हाथों मारे गए।

 

सूफ़ी मत की एक प्रथा यह थी कि उसकी बहुत सी बातों को आम करने से रोका गया है अर्थात जो लोग सूफ़ी मत अपनाते हैं उनसे कहा जाता है कि वे इस मत की बातों को सार्वजनिक न करें।  यही कारण है कि सूफी मत सीखने और सीखाने वाले दोनों ने ही इसके बारे में बहुत कम ही लिखा है।  इसीलिए सूफ़ीमत की बातें सामान्यतः गुरूओं से शिष्यों और शिष्यों से बाद वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहती है।  जिन लोगों ने सूफीमत के बारे में कुछ विस्तार से लिखा है उनमे शेख नजमुद्दीन कुबरा और उनके शिष्यों का अधिक उल्लेख मिलता है।  शेख नजमुद्दीन कुबरा के अतिरिक्त जिन लोगों ने सूफ़ीमत के बारे में लिखा है उनमें सादुद्दीन हमवी, नजमुद्दीन राज़ी, अत्तार नैशापुरी और अलाउद्दौला सेमनानी जैसे विद्वानों के नाम लिये जा सकते हैं।  सूफ़ीवाद के बारे में “तरीक़ते कुबरा” के संस्थापक शेख नजमुद्दीन कुबरा के साहित्य को सूफ़ीइज़्म का बहुत समृद्ध साहित्य माना जाता है।

 

शेख नजमुद्दीन कुबरा का मानना है कि आध्यात्म के मार्ग में आगे बढ़ने में रोज़े की महत्वपूर्ण भूमिका है।  वे कहते हैं कि रोज़ा रखने से मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है।  उनका कहना है कि इससे मनुष्य का अहंकार मर जाता है।  वे कहते हैं कि आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा अहंकार है।  रोज़ा अहंकार से मुक्ति दिलाता है।  नजमुद्दीन कुबरा कहते हैं कि रोज़ा, मनुष्य को मानवसेवा, प्रेमभाव और भाईचारे का संदेश देता है।  उनका कहना है कि सूफ़ीमत में मानवसेवा और मानवप्रेम को विशेष महत्व दिया गया है अतः रोज़ा बहुत सी विशेषताएं अपनाने में मनुष्य की सहायता करता है।

 

शेख नजमुद्दीन कुबरा जहां पर एक ओर शिष्यों का प्रशिक्षण किया करते थे वहीं पर वे लेखक के कार्य में व्यस्त रहते थे।  उन्होंने कुछ पुस्तकें अपने शिष्यों और विद्धानों की मांग पर लिखीं जबकि कुछ के लिखने का निर्णय उन्होंने स्वयं ही लिया।  वर्तमान समय में शेख नजमुद्दीन कुबरा की बहुत सी पुस्तकों का कुछ पता नहीं है जबकि उनकी कुछ पुस्तकें विश्व के अलग-अलग पुस्तकालयों में आज भी मौजूद हैं।  एक शोधकर्ता डाक्टर तौफ़ीक़ सुब्हानी का कहना है कि इस समय शेख नजमुद्दीन कुबरा की लगभग 30 हस्तलिखित किताबें मौजूद हैं।  एक अन्य शोधकर्ता डाक्टर असदुल्लाह ख़ावरी ने बताया कि शेख नजमुद्दीन कुबरा की कुछ हाथ से लिखी हुई किताबें, तुर्की के पुस्तकालयों में भी मौजूद हैं।  उनका कहना है कि इनमें से कुछ अरबी भाषा में तो कुछ फ़ारसी में हैं।

 

शेख नजमुद्दीन कुबरा ने पवित्र क़ुरआन की व्याख्या भी की है।  उनकी यह व्याख्या 12 खण्डों में है।  पवित्र क़ुरआन की व्याख्या के बारे में शेख नजमुद्दीन कुबरा की तफ़सीर का नाम “एनुल हयात” है।  इसके बारे में यह कहा जाता है कि पवित्र क़ुरआन की व्याख्या के संबन्ध में शेख नजमुद्दीन कुबरा ने जो किताब लिखी थी वह उनके जीवन में पूरी नहीं हो सकी।  उनकी मृत्यु के बाद सूफ़ीमत की शाखा “तरीक़ते कुबरा” के अनुयाई दो विद्वानों ने इसे पूरा किया। 

 

शेख नजमुद्दीन कुबरा ने सूफ़ीमत के बारे में जो किताब लिखी है उसे इस दृष्टि से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है कि यह पुस्तक उन लोगों के लिए बहुत लाभदायक है जो सूफीमत सीखना चाहते हैं या इसके बारे में जानना चाहते हैं।  कुछ विद्वानों का कहना है कि “तरीक़ते कुबरा” नामक सूफ़ीमत को समझने के लिए नजमुद्दीन कुबरा द्वारा लिखी गई किताब का पढ़ना अत्यंत ज़रूरी है क्योंकि इसके पढ़े बिना, इन्सान की जानकारी अधूरी है।

 

शेख नजमुद्दीन कुबरा ने सूफ़ीमत के बारे में एक अन्य किताब लिखी है जिसमें एकांतवास के नियम बताए गए हैं।  इसमें बताया गया है कि एकांतवास के लिए क्या करना होता है और क्या नहीं करना होता है।  किताब में कहा गया है कि साधक बनने के लिए किन-किन नियमों का पालन अनिवार्य है।  इसमें मनुष्य के कल्याण प्राप्ति की बातों और नियमों को पेश किया गया है।  सूफीवाद के जानकारों का कहना है कि इस पुस्तक में बहुत ही ऐसी बातें मौजूद हैं जो अन्य पुस्तकों में नहीं मिलतीं।