इस्लाम और मानवाधिकार- 43
हमने समाज में नागरिकों को आज़ादी और अधिकार दिलाने की क़ानूनी गैरंटी के बारे में चर्चा की और आपको बताया कि इस अधिकार को सुनिश्चित बनाने का एक मार्ग क़ानून का प्रभुत्व और उचित न्यायतंत्र का वजूद है।
अदालतों का यह कर्तव्य है कि क़ानून के अनुसार मुक़द्दमों का निपटारा करें और न्याय के आधार पर आदेश जारी करें। इस बात के मद्देनज़र कि आज सुरक्षा, आज़ादी, न्याय का पालन और व्यक्तिगत आज़ादी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत अहमियत हासिल है, इन मामलों की रक्षा के लिए घोषणापत्र जारी किए गए और अनेक कन्वेन्शनों में आरोपी के आज़ाद रहने और अपना बचाव करने का अधिकार होने तथा सरकारों को इस अधिकार को लागू करने पर बल दिया गया है।
इस्लामी न्याय व्यवस्था मानवीय मर्यादा के सिद्धांत पर आधारित है। इसी प्रकार इस्लामी न्याय व्यवस्था में दूसरी न्याय व्यवस्थाओं की तरह उन उसूलों के पालन की गैरंटी है जिससे मुल्ज़िम का अधिकार यथासंभव सुरक्षित रहे। जैसा कि पवित्र क़ुरआन की आयतों में हम यह पाते हैं कि ईश्वरीय दूतों को भेजने का उद्देश्य न्याय की स्थापना बताया गया है जबकि मुल्ज़िमों के साथ न्याय, सुनवाई के चरणों में न्यायिक सुरक्षा की छत्रछाया में ही मुमकिन है। मुल्ज़िम के साथ न्याय होने का आधार पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम का आचरण, बुद्धि और धर्मगुरुओं की इस विषय पर सर्वसम्मति है। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के न्यायिक आचरण में हम देखते हैं कि उन्होंने मुल्ज़िम के अधिकार का साफ़ तौर पर समर्थन किया है।
मुल्ज़िम का एक अहम अधिकार यह है कि उसे आरोप पत्र की जानकारी हो। आरोप पत्र यानी मुल्ज़िम को यह पता हो कि उस पर किस प्रकार के जुर्म करने का आरोप लगा है और इस बारे में क्या तर्क दिए गए हैं ताकि वह अपना बचाव कर सके। मुल्ज़िम को यह अधिकार इसलिए हासिल है कि जब उसे यह मालूम होगा कि उस पर क्या आरोप लगा है तो यह जानकारी उसे इस बात का अवसर देगी कि वह अपने बचाव के लिए ज़रूरी तय्यारी कर सके।
इस अधिकार के बारे में धर्मगुरुओं की ओर से साफ़ तौर पर किसी बिन्दु का उल्लेख नहीं है। इसकी एक वजह यह है कि इस्लामी न्याय व्यवस्था में मुक़द्दमे की सुनवाई एक चरण में होती है। इस तरह से कि मुद्दई जज के सामने मुद्दआ अलैह के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दायर करता है और मुक़द्दमे की सुनवाई के दौरान मुद्दआ अलैह की मौजूदगी में उसके ख़िलाफ़ लगे आरोप से उसे सूचित किया जाता है लेकिन इस अधिकार की ज़रूरत बुद्धि के निकट साबित है। क्योंकि मुल्ज़िम का आरोप पत्र से अवगत होना मुक़द्दमे की सुनवाई के लिए अनिवार्य है और जब मुल्ज़िम को यह बात पता होगी कि उस पर क्या इल्ज़ाम लगा है तब वह अपना बचाव कर सकेगा।
मुल्ज़िम को इसी प्रकार ख़ामोश रहने का भी अधिकार हासिल है। ख़ामोशी का अधिकार जो अभिव्यक्ति की आज़ादी और बेगुनाही के सिद्धांत पर आधारित है, जज के सवाल का सामना करने में मुल्ज़िम के अधिकार की सीधे तौर पर निगरानी करता है। भाषाकोश में ख़ामोशी का अर्थ है कुछ न बोलना।
इस्लामी क़ानून में मुल्ज़िम को ख़ामोश रहने के अधिकार का औचित्य न्याय प्रक्रिया से संबंधित नियमों की समीक्षा में मिल सकता है। धर्मगुरु न्याय के अध्याय में मुद्दआ अलैह के जवाब के बारे में कहते हैं, “जब मुद्दई मुक़द्दमा दायर करता है तो मुल्ज़िम इक़रार, इंकार या ख़ामोशी के ज़रिए उस पर लगाए गए आरोप पर प्रतिक्रिया दिखा सकता है।”
मुल्ज़िम का इल्ज़ाम साबित न होने से पहले तक बेगुनाह होना पवित्र क़ुरआन की आयतों से साबित होता है। आज दुनिया के सभी विकसित राष्ट्रों की इसे संयुक्त क़ानूनी मीरास माना जा रहा है और देशों के अपने क़ानून और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में इसे अहमियत दी जा रही है। विश्व घोषणापत्र की 11वीं धारा के पहले अनुच्छेद के आधार पर, जिस व्यक्ति पर किसी जुर्म का इल्ज़ाम लगे वह उस वक़्त तक बेगुनाह है जब तक आम लोगों की मौजूदगी में आयोजित मुक़द्दमे की कार्यवाही में मुल्ज़िम को हासिल सभी अधिकारों के पालन के साथ उसके ख़िलाफ़ जुर्म साबित न हो जाए। इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र की 14वीं धारा के दूसरे अनुच्छेद और यूरोपीय मानवाधिकार प्रतिज्ञापत्र की छठी धारा के दूसरे अनुच्छेद के अनुसार, जिस व्यक्ति पर किसी प्रकार के अपराध का इल्ज़ाम लगा है उसे बेगुनाह समझा जाए यहां तक कि क़ानून के अनुसार उसका जुर्म साबित हो जाए। इसी प्रकार इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र की 19वीं धारा के पांचवे अनुच्छेद में भी आया है, “मुल्ज़िम बेगुनाह है यहां तक कि उसे अपने बचाव के लिए हासिल सभी अधिकार के साथ एक न्यायपूर्ण कार्यवाही के ज़रिए उसका जुर्म साबित हो जाए।”
अपने बचाव के लिए वकील करना भी मुल्ज़िम को हासिल अधिकार में शामिल है। मुल्ज़िम के अपने बचाव के अधिकार की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि उसे इस बात की इजाज़त दी जाए कि वह कोई वकील करे। जिस वक़्त किसी व्यक्ति पर अपराध का इल्ज़ाम लगता है मुमकिन है कि वह अपने अधिकार और उससे लाभ उठाने की पर्याप्त जानकारी के अभाव के कारण एक आरोपी के रूप में अपने व्यक्तिगत हित से हाथ धो बैठे। इसी प्रकार मुमकिन है कि क़ानून की जानकारी के अभाव में अपने बयानों में ऐसे शब्द का इस्तेमाल कर बैठे जो उसके सज़ा पाने का कारण बने। इन्हीं सब बातों के मद्देनज़र आरोपी के अधिकार की बर्बादी को रोकने और न्यायपूर्ण सुनवाई को सुनिश्चि बनाने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के सहयोग की ज़रूरत पड़ती है जिसे क़ानून की जानकारी हो। इस्लाम में भी मुक़द्दमे के लिए वकील करने की इजाज़त दी गयी है।
इबने इदरीस मुक़द्दमे में वकील करने की इजाज़त के बारे में कहते हैं, “हर व्यक्ति अपने ख़िलाफ़ होने वाले मुक़द्दमे में किसी दूसरे को वकील बना सकता है ताकि वह मुक़द्दमे की सुनवाई में उसकी ओर से हाज़िर होकर उसके अधिकार की रक्षा करे। अगर वकील स्वीकार कर ले तो जो कुछ मोवक्किल की ज़िम्मेदारी है वही ज़िम्मेदारी उसकी भी होगी। सिर्फ़ उस स्थिति को छोड़ कर जिसमें मोवक्किल को क़सम खाने के लिए ख़ुद हाज़िर होना पड़ता है।”
इमाम ख़ुमैनी अपनी किताब तहरीरुल वसीला में मुक़द्दमे में मुद्दई और मुद्दआ अलैह के अपने अपने वकील करने की इजाज़त को स्वीकार करते हुए लिखते हैं, “मुद्दई के वकील का कर्तव्य है कि वह जज के सामने मुद्दआ अलैह के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा करे और अपने दावे की सच्चाई को साबित करने के लिए तर्क व सुबूत पेश करे। इंकार करने वाले से क़सम ले और मुद्दई के पक्ष में फ़ैसला सुनाए जाने का अनुरोध करे। कुल मिलाकर यह कि जिस तरह मुमकिन हो दावे को साबित करने की कोशिश करे और मुद्दआ अलैह के वकील की ज़िम्मेदारी है वह मुद्दई की ओर से होने वाले दावे का इंकार करे। गवाहों और सुबूतों के ख़िलाफ़ सवाल खड़े करे।मुद्दई के तर्क को नाकाम बनाने की कोशिश करे। जहां तक मुमकिन हो मुद्दई के दावे को नाकाम करने की कोशिश करे।”
इस्लाम के आपराधिक क़ानून में मुल्ज़िम को अस्थायी रूप से गिरफ़्तार करना अवैध है। क्योंकि इस्लाम में ऐसा कोई हुक्म नहीं है जो बिना किसी तर्क के लोगों की आज़ादी के छिन जाने का कारण बने। सिर्फ़ क़त्ल का इल्ज़ाम इससे अपवाद है कि इस हालत में क़त्ल के मुल्ज़िम को निर्धारित समय के लिए गिरफ़्तार किया जा सकता है कि इसका आधार कुछ रिवायतें हैं जिनमें आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम क़त्ल के मुल्ज़िम के साथ ऐसा करते थे। उनकी यह शैली शिया और सुन्नी धर्मगुरुओं के आदेश का आधार बनी और सिर्फ़ क़त्ल के इल्ज़ाम में मुल्ज़िम की गिरफ़्तारी की इजाज़त दी गयी है।
मुल्ज़िम को हासिल अधिकार में एक अधिकार यह भी है कि मुक़द्दमे की कार्यवाही खुल्लम खुल्ला हो। आम लोग उस कार्यवाही में हाज़िर हो सकें, मुक़द्दमे की सुनवाई को क़रीब से देखें और अदालत की निष्पक्षता की ओर से संतुष्ट हों। मुक़द्दमे की सुनवाई का खुल्लम खुल्ला होना भी न्यायिक सुरक्षा की गैरंटी में शामिल है। क्योंकि जब सुनवाई खुल्लम खुल्ला होगी तो लोग जज के फ़ैसले को अपने कान से सुनेंगे और जज को भी यह आभास होगा कि लोग उसकी न्यायिक प्रक्रिया को देख रहे हैं। इससे जज निष्पक्षता बनाए रखने और न्यायपूर्ण फ़ैसला करने की कोशिश करेगा।
इस्लाम में मुक़द्दमे की कार्यवाही का खुल्लल खुल्ला होने के बारे में स्पष्ट शब्दों में कोई हुक्म नहीं है लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के आचरण से यह बात साबित होती है कि उन्होंने लोगों के बीच बहुत से मुक़द्दमे के फ़ैसले सुनाए। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम मस्जिद के एक हिस्से में लोगों के बीच मुक़द्दमे का फ़ैसला सुनाते थे कि मस्जिद के उस हिस्से को दक्कतुल क़ज़ा कहते थे।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने मशहूर जज शुरैह क़ाज़ी को एक ख़त में घर में बैठ कर फ़ैसला सुनाने से मना किया है। इस ख़त में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने शुरैह क़ाज़ी को इन शब्दों में संबोधित किया है,“ हे शुरैह! मस्जिद में बैठो! क्योंकि यह क़दम लोगों को न्याय के अधिक निकट लगेगा और जज का अपने घर में बैठ कर फ़ैसला सुनाना उसके व्यक्तित्व के धूमिल होने का कारण बनता है।”
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इस ख़त के ज़रिए दो उद्देश्य बयान किए हैं। एक यह कि न्यायिक कार्यवाही लोगों के बीच खुल्लम खुल्ला अंजाम दें। क्योंकि इस तरह से न्यायिक कार्यवाही के आयोजन से जज यह बात जान लेगा कि लोग उसके व्यवहार पर नज़र रखे हुए हैं और वह मुक़द्दमे की सुनवाई को पूरे न्याय के साथ अंजाम देने की कोशिश करेगा तो दूसरी ओर लोगों को जज के फ़ैसले के बारे में किसी तरह की भ्रान्ति नहीं होगी और इस प्रकार जज के फ़ैसले के ख़िलाफ़ किसी प्रकार की अफ़वाह की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाएगी।