Jul २९, २०१७ ११:३६ Asia/Kolkata

हमने इस्लामी अदालत में आरोपी व्यक्ति के कुछ अधिकारों की चर्चा की थी।

यातना देने और प्रतिड़ित करने पर रोक वह चीज़ है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया है और मानवाधिकार के समझौतों और आधुनिक व्यवस्था में भी इसे स्वीकार किया गया है और मानवाधिकार विरोधी कार्यवाही यानी यातना के विरुद्ध लोगों के समर्थन के मार्गों को दृष्टि में रखा गया है। यातना वह चीज़ है जिससे इंसान की शरीर और आत्मा दोनों को तकलीफ़ पहुंचती है। यातना से इंसान को पहुंचने वाली तकलीफ़ इस प्रकार है कि कोई भी स्वस्थ इंसान उसे प्रकट नहीं कर सकता और इसी कारण मानवाधिकार के समस्त दस्तावेज़ों और देशों के आंतरिक कानूनों में कड़ाई से इसे मना किया गया है।

मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र की पांचवीं धारा में स्पष्ट रूप से यातना को मना करते हुए कहा गया है कि किसी को भी यातना नहीं दी जानी चाहिये । किसी को निर्दयता या मानवता विरोधी ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिये जो उसके मानवता से गिरने का कारण बने।

इसी प्रकार नागरिक व राजनीतिक अधिकारों के समझौते की सातवीं धारा में भी यातना को मना किया गया है और उसका पालन सरकारों की अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारी बनती है। इस धारा में कहा गया है कि किसी को न यातना दी जा सकती है, न दंडित किय जा सकता। दूसरे शब्दों में उसके साथ अत्याचारपूर्ण , अमानवीय या तुच्छ व्यवहार नहीं किया जा सकता । किसी व्यक्ति का चिकित्सा या वैज्ञानिक परीक्षण करना उसकी अनुमति के बिना मना है।

अलबत्ता इन दस्तावेज़ों को मानवाधिकारों के आम समझौतों के रूप में जाना जाता है। इनमें यातना को मना किये जाने के अलावा इंसान के दूसरे अधिकारों का उल्लेख किया गया है परंतु दो अंतरराष्ट्रीय समझौते हैं जिनमें स्पष्ट रूप से यातना दिये जाने को मना किया गया है। एक वर्ष 1975 में पारित होने वाला संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभी का घोषणापत्र है। यह घोषणापत्र यातना की भेंट चढ़ने वालों निर्दयता, अमानवीय या तुच्छ ढंग से किये जाने वाले व्यवहार का शिकार बनने वाले या दिये जाने वाले दंड के संबंध में है। इसमें यातना देने को मना किया गया है। इसी प्रकार दूसरे निर्दयतापूर्ण व्यवहार और अमानवीय बर्ताव के मना होने के संबंध में पारित होने वाला एक अन्य कन्वेन्शन है जिसमें यातना को मना किया गया है। इसे 10 दिसंबर वर्ष 1984 को पारित किया गय था। अंतिम कन्वेन्शन में विशेषकर बड़ी सरकारों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है कि वे अमानवीय कार्य यानी यातना दिये जाने की दिशा की रुकावट बनें।

इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्रसंध ने वर्ष 1987 में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें हर प्रकार की यातनाओं और अमानवीय व्यवहार की भर्त्सना की गयी है। इसमें देशों का आह्वान किया गया है कि वे UNcat नाम के प्रस्ताव से जुड़ जायें और समूचे विश्व में यातना देने के ज़िम्मेदारों के विरुद्ध कर्यवाही करें।

यातना के मना होने के संबंध में वर्ष 1984 में संयुक्त राष्ट्रसंघ में जो प्रस्ताव पारित हुआ है जिसमें यातना की परिभाषा इस प्रकार की गयी है। हर वह कार्य यातना है जिसके ज़रिये इंसान को शारीरिक या अत्मिक तकलीफ़ पहुंचाई जाये वह भी जानकारी प्राप्त करने हेतु उसे अथवा किसी तीसरे व्यक्ति को किसी चीज़ को स्वीकार करवाने जैसे कार्यों के लिए। इसी प्रकार अगर किसी व्यक्ति या किसी तीसरे व्यक्ति ने कोई कार्य अंजाम दिया है, या उस पर अंजाम देने का संदेह है, या उस पर रोब डालने या किसी कार्य को स्वीकार करने पर बाध्य करने के लिए जो पीड़ा उसे पहुंचाई जाती है उसे भी यातना कहते हैं। इसी प्रकार उस कार्य को भी यातना कहते हैं जिसे भेदभाव या पक्षपात के कारण इंसान को दिया जाता है विशेषकर अगर इस प्रकार की पीड़ा एक सरकारी पदाधिकारी या उसका समर्थन प्राप्त व्यक्ति के उकसावे में आकर या उसके प्रसन्न करने के लिए अंजाम दिया जाये। उस पीड़ा को यातना नहीं कहते हैं जो फ़ैसला या कानूनी आदेश सुनने के बाद इंसान को होती है।

इस आधार पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के इस प्रस्ताव के अनुसार हर प्रकार की पीड़ा पहुंचाना मना है चाहे वह शारीरिक हो या आत्मिक । इससे केवल वही पीड़ा अपवाद है जिसे कानून के दायरे में दिया जाता है।

दूसरे शब्दों में यद्यपि दंडित किये जाने पर इंसान को विभिन्न प्रकार की शारीरिक और आत्मिक यातना पहुंचती है किन्तु अपराधी को दंड मिलना ही चाहिये इसलिए यह यातना नहीं है। यह बिन्दु महत्वपूर्ण है कि दंड देना केवल उन्हीं व्यक्तियों को सही है जिनका अपराध सिद्ध हो चुका है। इस आधार पर सामान्य और उन व्यक्तियों को दंडित करना या पीड़ा पहुंचाना सही नहीं है जिन पर मात्र आरोप हैं।

इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार इंन एक एसा प्राणी है जिसे महान ईश्वर ने यथासंभव बेहतरीन रूप में पैदा किया है और उसके अंदर अपना प्राण फूंका है। महान ईश्वर ने जब उसकी रचना पूरी ली तो स्वयं की सराहना की। इसी कारण महान ईश्वर ने इंसान को सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया व बताय है। उसने उसे प्रतिष्ठा प्रदान की और उसकी इस प्रतिष्ठा के लिए किसी प्रकार की कोई शर्त नहीं है जैसे वह ईमानदार या मुसलमान आदि हो तभी वह प्रतिष्ठित है। नहीं, एसा कुछ नहीं है। यही नहीं महान ईश्वर ने इंसान को जो प्रतिष्ठा प्रदान की है वह हर चीज़ की प्रतिष्ठा से उच्च व श्रेष्ठ है।

आसमानी धर्मों विशेषकर इस्लाम धर्म और पवित्र क़ुरआन , पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के सदाचरण में इंसान की उच्च प्रतिष्ठा का वर्णन है। इनमें कहा गया है कि इंसान बहुत प्रतिष्ठित है। पवित्र कुरआन के अनुसार इंसान, इंसान होने की दृष्टि से प्रतिष्ठित है। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने समस्त इंसानों के सिर पर प्रतिष्ठा का मुकुट रखा है किन्तु कुछ लोग दुराचरण से अपनी प्रतिष्ठा को ख़राब कर लेते हैं।

चूंकि इस्लाम ने इंसान की प्रतिष्ठा को मान्यता प्रदान की है इसलिए उसने इस्लामी आदेशों व कानूनों में उसकी प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक चीज़ों और उसके परिणामों पर ध्यान दिया है। इस्लाम में ऐसा कोई क़ानून नहीं है जो उसकी प्रतिष्ठा से विरोधाभास रखता हो। पवित्र क़ुरआन के अनुसार इंसान की प्रतिष्ठा के लिए जीवन का अधिकार, आज़ादी का अधिकार, धर्म परायण होने का अधिकार और न्याय से सम्पन्न होने का अधिकार ज़रूरी है और यह सामाजिक विशिष्टता है।

किसी को भी इंसान की प्रतिष्ठा और उसके अधिकारों को छोनने या उन्हें आघात पहुंचाने का अधिकार नहीं है।

इंसान की मानवीय प्रतिष्ठा के दृष्टिगत इस्लामी धर्मशास्त्र में इंसान के लिए वह यातना देना मना है जिससे उसकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचता है।

इसी प्रकार इस्लाम ने हर उस व्यवहार को हराम किया है जो उसकी प्रतिष्ठा से विरोधाभास रखता हो।

इस्लामी आदेश में यातना देना मना है इसमें धर्म, जाति, लिंग और रंग आदि में कोई अंतर नहीं है। यातना मना है चाहे मर्द हो या महिला, मुसलमान हो या कारफ़िर , काल हो या गोरा यातना देना समानरूप से हराम व वर्जित है और वैध नहीं है। यातना देना न केवल हराम है बल्कि कसी तार्किक कारण के बिना जानवरों को भी यातना देना हराम है। इसके अलावा यातना देने में किसी प्रकार का अंतर नहीं है चाहे वह यातना शारीरिक हो या आत्मिक । इंसान के अंगों को काटने की हो या उसे बुरा – भला कहने या उस पर आरोप लगाने की। इस आधार पर किसी पर केवल आरोप होने की वजह से उसे यातना देना अत्याचार है कि उसने अंजाम दिया है बल्कि इस प्रकार उसे यातना देने से उसकी मानवीय प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है और यह इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है।

विभिन्न रवायतें हैं जो इस बात की सूचक हैं कि यातना देना और लोगों को मारना – पीटना हराम है। चाहे वह सरकार की ओर से हो या किसी व्यक्ति की ओर से । इसी प्रकार यह यातना प्रत्यक्ष या अप्रत्य रूप से सरकार की ओर से हो या लोगों की ओर से।

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से फ़रमाते हैं’’ ईश्वर के प्रति सबसे उद्दंडी वह बंदा है जो उसकी हत्या करने के लिए तैयार हो जाये जिसने हत्या ही नहीं की है और उसे मारे जिसने उसे मारा ही नहीं है।’’

सुन्नी मुसलमानों की किताबों में आया है कि हेशाम बिन हिकम कहता है एक दिन मैं शाम अर्थात वर्तमान सीरिया में एक गुट के पास से गुज़र रहा था कि देखा कि लोग उनके सिरों पर तेल डाल रहे हैं और उन्हें धूप में खड़ा कर रखा है। मैंने लोगों से पूछा कि यह क्या है? लोगों ने जवाब दिया इन लोगों मालगुज़ारी न देने के कारण इस प्रकार से प्रताड़ित किया जा रहा है। मैंने कहा मैंने पैग़म्बरे इस्लाम से सुना है कि आप फ़रमाते थे’’  जो लोग दुनिया में लोगों को प्रताड़ित करते व यातना देते हैं ईश्वर उन्हें यातना देगा।’’

इन रवायतों से यह समझा जाता है कि केवल आरोप के आधार पर लोगों को यातना देना अत्याचार व हराम है और ऐसा करने वाले को दंडित किया जायेगा। इन रवायतों के अलावा यातना को हराम होने को हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पूल्यवान भाषण नबंबर 167 से भी समझा जा सकता है जो नहजुल बलाग़ा नामक प्रसिद्ध पुस्तक में मौजूद है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मूल्यवान भाषण के दृष्टिगत जब तक मुसलमान को यातना देने का तार्किक कारण मौजूद न हो उसे यातना देना सही नहीं है और वैध होने की स्थिति में भी ईश्वरीय सीमा में रहकर दंडित करना चाहिये।