Aug १५, २०१७ ०९:४३ Asia/Kolkata

सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करना वह चीज़ है जिस पर इस्लाम में बहुत बल दिया गया है।

पैग़म्बरे इस्लाम के सदाचरण में भी लोगों के अधिकारों को पूरा करने पर बहुत ध्यान दिया गया है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहों अलैहि व आलेहि व सल्लम ने सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न कार्यवाहियां अंजाम दी हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सदैव समाज के ज़रूरतमंद लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान देते थे और इस दिशा में उन्होंने कभी भी संकोच से काम नहीं लिया। इसके साथ ही लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के बारे में अपनी दीर्घकालिक नीति में पैग़म्बरे इस्लाम का मानना था कि लोगों के पास रोज़गार और उचित पूंजी होनी चाहिये जिससे वे इज़्ज़त व प्रतिष्ठा के साथ अपनी ज़िन्दगी की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इस आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम दूसरों के सामने हाथ फैलाने, आलस्य और भीख मांगने से मना करते और आजीविका कमाने के लिए कार्य व प्रयास करने पर बल देते थे।

बहुत अधिक रवायते हैं जो इस बात की सूचक हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम से बहुत से लोग नक़दी सहायता चाहते थे परंतु यदि वे काम करने की क्षमता रखते थे तो पैग़म्बरे इस्लाम लोगों के कहने से पहले ही उनसे कार्य करने की सिफ़ारिश करते और फ़रमाते थे ’’ जो ज़रूरत व मोहताजी का एक द्वार अपनी ओर खोलेगा यानी दूसरों के सामने हाथ फैलायेगा तो मोहताजी के 70 द्वार उसकी ओर खोले जायेंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम की सिफ़ारिशों के कारण उनके साथियों व अनुयाइयों में प्रतिष्ठा और आत्म निर्भरता की भावना इस प्रकार हो गयी थी कि अगर कोई घोड़े पर सवार होता था और उसका कोड़ा ज़मीन पर गिर जाता था तो वह किसी से उठाने के लिए नहीं कहता था बल्कि वह स्वयं उसे उठाता था।

इस प्रकार की नीति पर आस्था के साथ पैग़म्बरे इस्लाम ने स्वस्थ अर्थ व्यवस्था की बुनियाद रखी। जिस समय युद्ध के बिना बनी नुज़ैर कबीले के माल पर मुसलमानों का कब्ज़ा हो गया और पवित्र कुरआन के आदेशानुसार उस पर नियंत्रण का अधिकार पैग़म्बरे इस्लाम को सौंप दिया गया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्का से मदीना पालायन करने वालों और मदीना में रहने वाले दो अंसारी निर्धनों के मध्य उस धन को बांट दिया और पलायनकर्ताओं को आत्म निर्भर बनाने और अंसार अर्थात मदीनावासियों से उनकी निर्भरता को ख़त्म करने की भूमि प्रशस्त की और सबका आह्वान किया कि वे खेती की पैदावार में वृद्धि करें। पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा ज़मीनों को आबाद करने की सार्वजनिक अनुमति और मुसलमानों के प्रोत्साहन को इसी दिशा में देखा जा सकता है।

व्यापार भी पैग़म्बरे इसल्म की दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण है। पैग़म्बरे इस्लाम ने बाज़ार में होने वाले लेन-देन को बेहतर बनाने के लिए सूद, जमाखोरी, सामान की अधिक रखने और कम-नाप तौल आदि के हराम होने का आदेश दिया। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम ने व्यापारिक गतिविधियों कत आज़ाद बनाने के लिए कार्य किया और समझौतों के सम्मान को आवश्यक बताया। पैग़म्बरे इस्लाम व्यापार में इसी प्रकार न्याय से काम लेने और कम मुनाफ़ा कमाने जैसी बातों की सदैव सिफ़ारिश और उसके अच्छी तरह लागू होने की निगरानी करते थे। इन नीतियों को लागू करके पैग़म्बरे इस्लाम पूंजी को कुछ विशेष लोगों के हाथों में रहने से रोकना चाहते थे। साथ ही वह न्याय के साथ विकास को सरल बनाना चाहते थे। पैग़म्बरे इस्लाम की यह नीति न केवल निर्धनता के कम होने का कारण बनी बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं की मांग के कम होने का कारण बनी।

सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने में सबकी भागीदारी पैग़म्बरे इस्लाम की एक मूल नीति समझी जाती है। पैग़म्बरे इस्लाम हमेशा मुसलमानों विशेषकर समाज के धनाढ़य लोगों को ज़रूरतमंद लोगों की सहायता के लिए प्रोत्साहित करते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम ने जब से मक्का में लोगों को ईश्वरीय धर्म की ओर आमंत्रित करना आरंभ किया तभी से इस नीति पर भी अमल आरंभ हो गया था।

पैग़म्बरे इस्लाम के मक्का से मदीना पलायन से पहले और पलायन के बाद के आरंभिक समस्त वर्षों में खुम्स व ज़कात के कानूनी होने से पहले तक सार्वजनिक खर्च का वित्तीय स्रोत केवल लोगों की भागीदारी थी और इसी मार्ग से मस्जिद, पुल और मार्ग जैसे सार्वजनिक कार्यों का निर्माण होता था। इसी तरह लोगों की भागीदारी से बाग लगाये और व्यापारिक व उत्पाद के दूसरे केन्द्र स्थापित किये जाते थे और उनसे जो आमदनी होती थी उससे ज़रूरत मंद लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती थी और ईश्वरीय धर्म इस्लाम के प्रचार-प्रसार और सार्वजनिक ज्ञान के स्तर को उठाने जैसे सांस्कृतिक कार्यों में खर्च किये जाते थे।

रवायत में है कि अबू सईद खदरी नाम का व्यक्ति कहता है कि मैं सफर में था कि एक सवार आया और वह लगातार अपने चारों ओर देख रहा था। उस वक्त पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया’’ जिसके पास अतिरिक्त सवारी हो वह उस व्यक्ति को दे दे जिसके पास सवारी न हो। जिसके पास अतिरिक्त वस्तु हो वह उसे दे दे जिसके पास वस्तु न हो।’’

उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने माल के बटवारे और साथ रहने वालों की जिम्मेदारी के बारे में काफ़ी बात की जिससे मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि अतिरिक्त माल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है और उसे ईश्वर के मार्ग में और लोगों के हितों के लिए ख़र्च करना चाहये।

इमरान बिन हसीन नामक व्यक्ति कहता है’’ पैग़म्बरे इस्लाम ने हमारे लिए कोई भाषणा नहीं दिया किन्तु यह कि हमें दान देने का आदेश दिया।’’ पैग़म्बरे इस्लाम के पथप्रदर्शन के कारण पैग़म्बरे इस्लाम का कोई भी साथी व अनुयाइ समृद्ध नहीं रहा किन्तु यह है कि उसने निर्धनों के लिए कोई चीज़ समर्पित नहीं कर दी। इस पद्धति का स्पष्ट उदाहरण हज़रत अली अलैहिस्सलाम की पावन जीवन शैली है।

सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वित्तीय स्रोत के जो कानून बनाये गये वे इस्लामी सरकार में किये जाने वाले अंतिम कार्य थे। पैग़म्बरे इस्लाम की सरकार ईश्वरीय सरकार थी और उसकी विभिन्न ज़िम्मेदारियां थीं, उस पर कानून बनाने और कानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी थी। इसके अलावा वह सामाजिक कार्यों में सार्वजनिक भागीदारी के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती । इन सबके बावजूद उसने सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में बहुत महत्वपूर्ण एवं बुनियादी भूमिकायें निभाई।

पैग़म्बरे इस्लाम की इस्लामी सरकार का सबसे पहले कानूनी वित्तीय स्रोत प्राकृतिक सम्पत्ति और खुम्स था और पैग़म्बरे इस्लाम के मक्का से मदीना पलायन के दूसरे वर्ष बाद पवित्र क़ुरआन के सूरे अनफ़ाल की आयतें बद्र नामक युद्ध में मिलने वाले धन के विभाजन के बारे में उतरीं। शीया मुसलमानों के धर्मशास्त्र में अनफाल उस चीज़ को कहा जाता है जिसका स्वामी इमाम होता है। जैसे वह ज़मीन जो युद्ध के बिना मुसलमानों के नियंत्रण में आ जाये। इसी प्रकार मुर्दा व बंजर पड़ी ज़मीन, घाटियां व दर्रे, जंगल, पहाड़ और हर वह चीज़ जो उनके अंदर होती है। इसी प्रकार इमाम उन क्षेत्रों का भी मालिक होता है जिनका कोई स्वामी नहीं होता है इनमें खदानें और समुद्र भी शामिल हैं।

इन सबके अलावा ख़ुम्स भी कानूनी वित्तीय स्रोत है। माल के पांचवें हिस्से का अदा करने को खुम्स कहते हैं और ज़िन्दगी के आवश्यक खर्च से जो कुछ बच जाता है उसका संबंध आवश्यकता रखने वाले विशेष लोगों से होता है।

हिजरी क़मरी के 6ठें साल में सूरे तौबा की आयत नंबर 103 नाज़िल हुई जिसमें ज़कात के कानून का उल्लेख था। पैग़म्बरे इस्लाम ज़कात के कानून के अनुसार गेहूं, जौ , खजूर, किशमिश, गाय, भेड़, ऊंट और सोना – चांदी पर ज़कात लेते थे। इसी प्रकार जिज़्या अर्थात वह टैक्स जो इस्लामी सरकार में रहने वाले गैर मुसलमान देते थे और इस्लामी सरकार की संभावनाओं से लाभ उठाते थे।

इस्लाम के आरंभ में जो राजकोष था और सरकार की जो व्यवस्था थी उसने सार्वजनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संबंध में पहला महत्वपूर्ण बिन्दु टैक्स को माफ कर देना था। जिन लोगों पर टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी थी उनके नाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के एक पत्र में आया है’’ टैक्स देने वालों पर उनकी क्षमता से अधिक बोझ मत डालो और लोगों के साथ न्याय से पेश आओ और उनकी आवश्यकताओं पर धैर्य से काम लोग।’’

हज़रत अली अलैहिस्सलाम टैक्स वसूलने वाले एक अन्य व्यक्ति से सिफ़ारिश करते हुए फ़रमाते हैं’’ कहीं एसा न हो कि एक दिरहम टैक्स लेने के लिए किसी मुसलमान, यहूदी या ईसाई को मारो, या उस चौपाये को बेचे दो जिससे वह काम करता है और कहो कि मुझे टैक्स लेने की ज़िम्मेदारी दी गयी है।’’

दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु यह था कि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में जो इस्लामी सरकार थी उसमें जो कर्मचारी थे उनके वेतन को उनकी जिन्दगी के खर्च को दृष्टि में रखकर निर्धारित किया जाता था। पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से एक रवायत में आया है कि अगर मेरी ओर से किसी के हवाले कोई कार्य किया गया हो और उसके पत्नी न हो तो पत्नी धारण करे। अगर उसके पास नौकर न हो तो नौकर ले ले और अगर घर न हो तो घर ले ले और अगर सवारी न हो तो सवारी का प्रबंध करे और जो इससे अधिक ले वह विश्वासघाती या चोर है।’’

तीसरा महत्वपूर्ण बिनुदू यह है कि जनता की आवश्यकताओं पर राजकोष और कानून वित्तीय स्रोतों को जिस तरह से खर्च करने के लिए कहा गया है उससे सार्वजनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का महत्व व स्थान स्पष्ट हो जाता है। जैसाकि निर्धनों, ऋणी, दासों, काम से बेकार हो चुके लोगों और बीमारों की सहायता को प्राथमिकता दी गयी थी और राजकोष के खर्च करने में इन लोगों को प्राथमिकता प्राप्त थी क्योंकि रोजकोष बनाने का महत्वपूर्ण उद्देश्य लोगों की सहायता थी। इसी प्रकार ज़कात में मुख्य रूप से जानवर और अनाज लिए जाते थे जिसका लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण प्रभाव था। पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली की इस्लामी सरकार में एक बहुत महत्वपूर्ण बिन्दू यह था कि वे निर्धनों व वंचितों की सहायता के प्रति बहुत संवेदनशील थे।

पैग़म्बरे इस्लाम अपनी पैग़म्बरी के दायित्वों को बयान करते थे और फ़रमाते थे कि मुझे धन संचित करने के लिए नहीं भेजा गया है बल्कि ईश्वर के मार्ग में धन खर्च करने और आवश्यकता रखने वालों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आया हूं।’’

इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के जीवन के बहुत से नमूने बयान किये गये हैं जिसमें विश्व के नेताओं व मार्ग दर्शकों के लिए बहुत पाठ हैं।