शेख़ नजमुद्दीन कुबरा -3
हमने छठी हिजरी क़मरी के जानेमाने ईरानी विद्धान शेख़ नजमुद्दीन कुबरा के व्यक्तित्व के बारे में चर्चा की थी।
वे एक साहित्यकार, कवि , लेखक , तत्वज्ञानी और सूफ़ी थे। शेख़ नजमुद्दीन कुबरा का जन्म वृहत्तर ख़ुरासान के ’’ ख़ेवा’’ नामक नगर में हुआ था। उन्होंने अपनी आरंभिक पढ़ाई, अपने ही गृह नगर से आरंभ की। शेख़ नजमुद्दीन कुबरा कई विषयों की जानकारी रखते थे। वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र कथनों के भी ज्ञाता थे।
शेख़ नजमुद्दीन कुबरा, सूफ़ीवाद के एक पंथ, ’’तरीक़ते कुबरा’’ के संस्थापक थे। बताया जाता है कि सन 618 हिजरी क़मरी में जब मंगोलों ने हमला किया था तो इस वे हमले के दौरान मारे गए। जिस समय मंगोलों ने हमला किया उसका उन्होंने उनका डटकर मुक़ाबला किया। हांलाकि यह भी कहा जाता है कि हमला करने से पहले मंगोलों ने उनके पास संदेश भेजा था कि नगर पर हमले से पहले यदि वे वहां से चले जाते हैं तो उनको कोई क्षति नहीं होगी। शेख़ नजमुद्दीन कुबरा ने मंगोलों के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और नगर की रक्षा के लिए अपने अनुयाइयों के साथ मुक़ाबले के लिए निकल पड़े। उन्होंने मंगोलों का डटकर मुक़ाबला किया और बाद में मंगोलों के हाथों मारे गए।
महान सूफ़ी संत नजमुद्दीन कुबरा के काल में बहुत से सूफ़ीमत प्रचलित थे जिन्हें ’’ तरीक़त ’’ कहा जाता है। उनके काल में प्रचलित मतों में नरीक़ते क़ादेसिया , तरीक़ते रेफ़ाइया, तरीक़ते हैदरिया, तरीक़ते सोहरवर्दिया, तरीक़ते बकताशिया, तरीक़ते मौलविया, तरीक़ते क़ूबानिया, तरीक़ते नक्शबंदिया और तरीक़ते कुबरविया। नजमुद्दीन कुबरा स्वयं तरीक़ते कुबरविया के संय्थापक थे। कहा जाता है कि ईरान में प्रचलित सूफ़ी मतों में तरीक़ते कुबरविया को विशेष महत्व प्राप्त था। तरीक़ते कुबरविया का बहुत विस्तार हुआ। यह लघु एशिया, दक्षिणी एशिया और चीन तक फैल गई। सूफ़ीमत पर शोध करने वालों का कहना है कि नजमुद्दीन कुबरा के काल में सूफ़ीमत, विश्व के बहुत से क्षेत्रों में तेज़ी से फैला।
नजमुद्दीन कुबरा ने तरीक़ते कुबरविया का जो विचार पेश किया, उसकी दो महत्वपूर्ण बातें थीं। एक बात तो यह है कि इस बारे में उन्होंने बहुत ही सरल भाषा का प्रयोग किया है जबकि इससे पहले इस बारे में अधिकांश बहुत ही जटिल भाषा क प्रयोग किया जाता था जिसके कारण सूफ़ीमत बहुत धीमी गति से फैला। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने वे महत्वपूर्ण बातें जो अपने शिष्यों को सिखाईं , बाद में पुस्तक के रूप में सामने आईं और अन्य लोगों ने भी इससे लाभ उठाया।
कुबरवी तरीक़त का मूल सिद्धांत ज़िक्र या जाप है। नजमुद्दीन कुबरा ने अपने तरीक़त में दस ऐसे सिद्धांत निर्धारित किये हैं जिनको अपनाकर, सूफीमत अपनाने वाला, इस मत के अन्तिम चरण को सरलता से प्राप्त कर सकता है जो ईश्वर की पहचान है। कुबरवी तरीक़त में कुछ बातों को विशेष महत्व प्राप्त है जैसे मौन धारण करना, एकांतवास, सदैव पवित्र रहना, निरंतर जाप करना और रोज़े रखना आदि। यह सारे काम किसी दक्ष और निपुण गुरू की देखरेख में होने चाहिए। कुबरवी पंथ में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि ईश्वरीय आदेश का कदापि विरोध न किया जाए। एक अन्य विषय, जिसपर कुबरवी तरीक़त में विशेष ध्यान रखने पर बल दिया गया है , यह है कि ईश्वर की उपासना स्वर्ग के लालच में न की जाए। नजमुद्दीन कुबरा का यह कहना है कि आरिफ़ या साधक, ईश्वर का सानीय प्राप्त करने के लिए अपनी आंतरिक क्षमताओं का भरपूर प्रयोग करे।
जैसाकि पहले इस बता चुके हैं कि कुबरवी मत का मूल सिद्धांत जाप या ज़िक्र है। ज़िक्र , अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता किसी शब्द या वाक्य को बार-बार दोहराना। सूफ़ीमत में जाप से तातपर्य ईश्वर के नामों को पढ़ना या दोहराना है। पवित्र क़ुरआन में ईश्वर के कई नामों का उल्लेख किया गया है। ईश्वर के नामों को अस्माउल्लाह या अस्माउल हुस्ना कहा जाता है। सूफ़ीमत अपनाने वाले लोग किसी गुरू की देखभाल में इन्ही नामों में से कुछ नामों का ज़िक्र या जाप करते हैं।
सूफ़ीमत के मानने वालों का कहना है कि नमाज़ या क़ुरआन पढ़कर इन्सान वास्वत में ईश्वर को याद करता है। ज़िक्र या जाप का दोहराना, एक प्रकार से ईश्वर की याद को ताज़ा रखना है। सूफ़ियों के अनुसार जाप के माध्यम से ईश्वर की याद को हमेशा ही ताज़ा रखा जाए। इस दौरान जाप करने वाले का पूरा ध्यान केवल ईश्वर की ओर होना चाहिए। सूफ़ियों का कहना है कि वास्तविक जाप या ज़िक्र यह है कि जाप करने वाले के लिए अनिवार्य है कि वह ईश्वर के अतिरिक्त सबकों भूल जाए। सूफ़ी साधकों कीयह आस्था है कि पूरी निष्ठा के साथ ईश्वर के नामों के जाप से साधक , ईश्वर से बिना किसी माध्यम के निकट हो सकता है।
सूफ़ियों का यह भी कहना है कि ईश्वर, अपने नामों या अस्माउल्लाह में रहस्यमई ढेग से निहित है। वह अपने इन्ही नामों या विशेषताओं से जाना जाता है। यही कारण है कि सूफ़ी या साधक पवित्र होकर पहले किसी दक्ष गुरू के मार्गदर्शन में गुरू द्वारा बताए गए ईश्वर के किसी नाम का जाप शुरू करता है। सूफ़ीमत के गुरू को मुर्शिद कहा जाता है। इन मुर्शिदों के हिसाब से ईश्वर अनंत है। वह हर स्थान पर मौजूद है। अंत’’ उसे किसी भी स्थान पर याद किया जा सकता है। सूफ़ीमत के मुर्शिद मानते हैं कि ईश्वर से साक्षात रूप में मुलाक़ात नहीं की जा सकती किंतु उनके नामों पर ध्यान केन्द्रित करके ईश्वर से निकट हुआ जा सकता है।
ध्यान केन्द्रित करने में सबसे बड़ी समस्या यह पेश आती है कि यह कोई सरल काम नहीं है। विभिन्न प्रकार की सोच और विचार, एकाग्रता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा हैं। मुर्शिद अपने शिष्य को एकाग्रता का प्रशिक्षण देकर अपने निरीक्षण में जाप का काम शुरू करवाता है। ऐसे में उसके शिष्य का ध्यान धीरे-धीरे एक स्थान पर टिकने लगता है। इस प्रकार अभ्यास करते हुए यही शिष्य , सूफ़ीमत के मार्ग में क़दम बढ़ाते हुए एक दिन स्वंय दक्ष गुरू या मुर्शिद बन जाता है।