अबूतालिब कलीम काशानी- 2
हमने आपको बताया था कि अबूतालिब कलीम काशानी हिन्दी शैली के कवि थे।
वे भारत के शासक शाहजहां के काल में राजकवि रहे। जैसाकि हम बता चुके हैं कि उनके निजी जीवन के बारे में बहुत सी बातें पता नहीं हैं यहांतक कि कलीम काशानी के जन्म स्थान के बारे में भी मतभेद पाए जाते हैं। इसी मतभेद के कारण वे कलीम काशानी और कलीम हमदानी के नाम से मशहूर हुए क्योंकि कुछ जानकार उनका जन्म स्थल काशान कहते हैं जबकि कुछ अन्य का मानना है कि वे हमदान में पैदा हुए। कहा जाता है कि कलीम काशानी को भारत से बहुत लगाव था। सन 1061 हिजरी क़मरी में कश्मीर में अबूतालिब कलीम काशानी का निधन हो गया। कलीम काशानी का मक़बरा श्रीनगर में है।
कुछ विशेषज्ञों का यह कहना है कि अबूतालिब कलीम काशानी के बारे में बहुत सी बातें अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। उनमें से एक है कि उनका जन्म स्थल कहां है? या उनकी मृत्यु की सही तारीख़ क्या है? उनकी संतान थी या नहीं? इस प्रकार के संदेह इसलिए बाक़ी रह गए क्योंकि कलीम काशानी ने अपनी रचनाओं में अपने निजी जीवन के बारे में कुछ नहीं कहा है। उनके बारे में जो कुछ कहा गया है वह उनकी रचनाओं के अध्ययन के बाद निकाले गए निष्कर्ष पर आधारित है। विशेषज्ञों का कहना है कि कलीम काशानी के जीवन का अध्ययन करने से यह बात पता चलती है कि वे स्वयं नहीं चाहते थे कि उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में लोग अधिक जानें। शायद यही कारण है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में अपने बारे में अधिक कुछ नहीं लिखा है।
साहित्य के बहुत से आलोचकों और जानकारों का कहना है कि ‘‘ सबके हिंदी ‘‘ शैली में कलीम काशानी का स्थान, साएब तबरेज़ी जैसा है। वह बहुत ही स्पष्ट शैली में शेर कहा करते थे। कलीम काशानी का काव्य संकलन अधूरा रह गया जिसमें लगभग 15000 बैत हैं। उनके इस काव्य संकलन में ग़ज़ल, क़सीदे, रूबाई और मसनवी सबकुछ पाया जाता है। कलीम काशानी के काव्य संकलन का अध्ययन करने के बाद पाठक इस नतीजे पर पहुंचता है कि उन्होंने वैसे तो साहित्य के हर क्षेत्र में काम किया है किंतु ग़ज़ल कहने में उनको विशेष दक्षता प्राप्त थी। उनकी एक विशेषता यह थी कि वे बहुत ही सादी भाषा में शेर कहते थे। यही कारण है कि उनकी रचना को आम लोग भी बड़ी सरलता से समझ लेते थे।
कलीम काशानी ईरान से भारत गए थे। वे भारत और वहां के समाज से प्रभावित हुए। वे भारत में बहुत रुचि रखते थे। यह बातें उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। कलीम काशानी की रचनाओं से उनके विचारों की समृद्धता का पता चलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में मुहावरों, कथनों और कहावतों का बहुत ही उचित ढंग से प्रयोग किया है।
जैसाकि बताया जा चुका है कलीम काशानी, फ़ारसी भाषा की ‘‘ सबके हिंदी‘‘ शैली के कवि थे। सबके हिंदी के बहुत से शोधकर्ताओं का कहना है कि कलीम काशानी ने कल्पनाओं की उड़ान, विभिन्न विषयों पर चिंतन, छोटी-छोटी बातों में गहराई से सोच-विचार, और इसी प्रकार की बातों से सबके हिंदी शैली को सुदृढ़ किया।
जिन लोगों ने कलीम काशानी के साहित्य का अध्ययन किया या उसपर शोध किया है उनका यह मानना है कि कलीम काशानी के गद्ध और पद्ध दोनों में विशेष प्रकार का आकर्षण पाया जाता है। उनकी चिंतन शक्ति बहुत सशक्त थी। वे अपनी रचनाओं में बातों को कुछ इस तरह से पेश करते थे जिससे सुनने वाले को एसा लगता था कि मानों सबकुछ उसकी आंखों के सामने हो रहा है। उनकी इसी विशेषता के कारण बहुत से पाठक उनकी रचनाओं को बारबार पढ़कर आनंदित होते थे।
कहते हैं कि कलीम काशानी एक अच्छे कवि के साथ ही एक बहुत ही दक्ष दर्शनशास्त्री भी थे। दर्शनशास्त्र की झलक उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप में दिखाई देती है। उनकी सोच फलसफी थी और वे बहुत गहराई में जाकर सोचते थे। उनकी कविताओं विशेषकर ग़ज़लों में इसे अच्छे ढंग से देखा जा सकता है। हालांकि उनके काल के और भी कुछ कवियों में यह विशेषता दिखाई देती है किंतु कलीम काशानी की रचनाओं में यह अधिक स्पष्ट है।
कलीम काशानी की रचनाओं में जहां बहुत सी अच्छाइयां हैं वहीं पर उनमें कुछ कमियां भी दिखाई देती हैं। उदाहरण स्वरूप उनकी रचनाओं में कहीं कहीं पर विरोधाभास दिखाई देता है। इस विरोधाभास के कारण रचना को पढ़ने वाले के मन में कई प्रकार के विचार आते हैं। इसके अतरिक्त एक अन्य कमी, उनके साहित्य में पाई जाने वाली निराशा है। बहुत से जानकारों का कहना है कि कलीम काशानी की बहुत सी कविताओं में निराशा दिखाई देती है। कलीम काशानी की रचनाओं पर शोध करने वाले एक शोधकर्ता शम्स लंगरूदी कहते हैं कि कलीम काशानी की रचनाओं पर एक प्रकार से निराशा छाई हुई है। वे कहते हैं कि इन रचनाओं को पढ़ने के बाद एसा लगता है कि अपने काल के अन्य कवियों या साहित्यकारों के विपरीत कलीम काशानी निराशा के शिकार थे। शायद यही कारण है कि उनकी कविताओं में मृत्यु , रोना, दुर्भाग्य और इसी प्रकार के नकारात्मक शब्द अधिक मिलते हैं।
निराशावाद वास्तव में मन की एक अवस् है जिसमें मनुष्य सामान्यत: नकारात्मक सोचने लगता है। एसा व्यक्ति पूरी दुनिया को निराशा की नज़र से देखता है और उसकी यह सोच, उसके दैनिक जीवन यहां तक कि उसकी अन्य गतिविधियों में दिखाई देने लगती है। जो कवि या लेखक इस सोच के होते हैं उनके साहित्य में भी यह बात स्पष्ट रूप में प्रदर्शित होती है।