Sep ०५, २०१७ ०९:३७ Asia/Kolkata

हमने सफ़वी काल के प्रसिद्ध ईरानी शायर अबूतालिब कलीम काशानी के बारे में चर्चा की थी और आज के कार्यक्रम में भी हम उसी चर्चा को जारी रखेंगे।

अबूतालिब कलीम काशानी को सब्के हिन्दी अर्थात हिन्दी शैली का शायर समझा जाता है। आज के कार्यक्रम में हम इस बात की समीक्षा करेंगे कि उन्होंने शेरों के ज़रिए उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति की झलकियां किस तरह पेश की।

इसी प्रकार हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि अबू तालिब कलीम काशानी शाह अब्बास सफ़वी काल के शायर हैं। उन्हें मलिकुश्शुरा की उपाधि दी गयी थी और वह शाह जहॉं गूरकानी के दरबारी शायर थे। अबूतालिब कलीम काशानी की रचनाएं अधिक हैं जिसके कारण धीरे-धीरे उनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग अपरिचित ही रह गया। सफ़वी काल के दूसरे बहुत सारे साहित्यकारों और शायरों की भांति कलीम भी जवानी में भारत चले गये और गूरकानी शाह जहां के दरबारी शायर हो गये और उन्हें मलिकुश्शुरा की उपाधि दी गयी और 1061 हिजरी क़मरी में भारत नियंत्रित कश्मीर में उनका निधन हो गया। उनकी क़ब्र श्रीनगर में उस स्थान पर है जो कश्मीर में मज़ारात के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार हमने कहा था कि कलीम काशानी ने शेरों का एक दीवान व एक अधूरा शाहनामा छोड़ा है जिसमें 15 हज़ार शेर हैं। उन्होंने विभिन्न विषयों में शेर कहे हैं परंतु ग़ज़ल कहने में वह अधिक प्रसिद्ध हैं। कलीम काशानी सब्के हिन्दी अर्थात हिन्दी शैली की बुनियाद रखने वालों में हैं।

मोहम्मद ख़ुदावन्द

 

कला वह परिधान है जो समाज और जीवन की अप्रिय वास्तविकताओं को अपने अंदर जगह देता है और परोक्ष रूप से इंसान को वास्तविकताओं से अवगत कराता है और यह उस स्थिति में है जब इतिहास इंसान के लिए वास्तविकताओं को सीधे रूप से बयान करता है। जिन कलाकारों की रचनाएं राष्ट्रीय हैं वे टिकाऊ व बाक़ी रहने वाली हैं। राष्ट्रीय कला वह कला है जो लोगों के जीवन से ली गयी हो। कला समाज की बड़ी उपज है और कलाकार उसे केवल सुन्दर रूप वे शैली में पेश करता है। साहित्य कलाम व बात की कला है जो समस्त समाज का आइना हो सकता है। समकालीन लेखक और बुद्धिजीवी जलाल आले अहमद का मानना है कि हर राष्ट्र का अस्ली दस्तावेज़ उसका साहित्य है शेष अस्ल नहीं है। हर सामाजिक विशेषता को उस दौर में लिखी जाने वाली साहित्यिक रचना से समझा जा सकता है। कलाकार जितना अधिक प्रतिबद्ध होगा उसकी रचनाओं में सामाजिक विषय उतने अधिक दिखाई देंगे। शायर, लेखक और कलाकार अपने जीवन के सामाजिक वातावरण में ज़िन्दगी गुज़ारता है और स्वाभाविक है कि वह अपने समय के सामाजिक वातावरण से प्रभावित होता है और जिस सीमा तक वह प्रभावित होता है और जितना ज़रूरी समझता है उस प्रभाव को अपनी रचनाओं में बयान करता है। अतीत की बहुत सी सामाजिक और सांस्कृतिक घटनाओं को फ़ारसी साहित्य की गहराइयों से समझा जा सकता है।

बहुत से अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि एक साहित्यक रचना केवल एक प्रसन्न इंसान के मस्तिष्क की उपज नहीं होती है बल्कि उस संस्कृति व परम्परा की एक झलक होती है जिस काल में वे अस्तित्व में आई हैं। साहित्य समाज का सांस्कृतिक निचोड़ हाता है और उसका संबंध उस समय से होता है जिसमें शायर पला-बढ़ा और उसका सांस्कृतिक व वैचारिक बोध परवान चढ़ा होता है। शेर वास्तव में समाज का एक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक रूप होता है।

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काफ़ी युद्ध और बहुत अधिक सैनिक सफलता मिलने के बाद 907 हितरी क़मरी में ईरान के तबरीज़ नगर में शाह इस्माईल की ताजपोशी के साथ सफ़वी शासन श्रृंखला का आरंभ हुआ। शाह इस्माईल के बाद उसके आठ उत्तराधिकारियों ने ईरान पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया। इस अवधि के दौरान बहुत से सकारात्मक व नकारात्मक परिणाम रहे हैं। ईरान में राजनीतिक एकता व एकजुटता उत्पन्न करना और एक मज़मूत सरकार का गठन सफ़वी शासन श्रृंखला के सकारात्मक परिणाम थे जबकि एक समय में बहुत सारी कठिनाइयां व समस्याएं उत्पन्न कर दी गयी थीं जिनका सहन करना लोगों के लिए कठिन था और यह इस श्रृंखला के नकारात्मक परिणाम थे। कलीम काशानी ने 6 सफ़वी शासकों का शासन काल देखा है। कलीम काशानी की जवानी सुल्तान मोहम्मद ख़ुदावन्द , प्रथम शाह अब्बास और शाह सफ़वी के काल में बीती थी जबकि बचपना तहमास्ब प्रथम और बुढ़ापा शाह अब्बास द्वितीय के काल में बीता था। इतिहासकार, मोहम्मद ख़ुदावन्द के 11 वर्षीय शासनकाल को सफ़वी दौर की अराजकता, अस्थिरता और अशांति के काल के रूप में याद करते हैं। उस दौर में लोगों पर अत्याचार और उनके अधिकारों की उपेक्षा सामान्य बात थी जबकि मोहम्मद ख़ुदावन्द धार्मिक होने का दावा करता था और उसने धर्म को आधार बना रखा था और लोगों के लिए धार्मिक सीमा निर्धारित कर रखी थी परंतु स्वयं अपना पूरा जीवन भोग- विलास व ऐश्वर्य में बिताया।

कलीम काशानी के जीवनकाल में जितने भी सफ़वी शासक गुज़रे हैं सभी ने थोड़े से अंतर के साथ मोहम्मद ख़ुदावन्द की भांति धार्मिक नारों की आड़ में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन बिताया है। सब्के हिन्दी शेर के विशेषज्ञ उस्ताद अमीर फ़ीरोज़कूह का मानना है कि सफ़वी समाज की शक्ति धार्मिक चोले में थी और धार्मिक चोले में वह लोगों को यातना देती थी और लोगों की समप्त्ति की लूट- खसोट करती थी चबकि समाज में निर्धनता और असमानता भी व्याप्त थी।

सफ़वी दौर फ़ारसी भाषा और उसके साहित्य की उपेक्षा का दौर था। उस दौर में दोबारा अरबी भाषा, अरबी साहित्य और उससे संबंधित कलाएं ईरान में परवान चढ़ीं। उस समय ईरान में शीया धर्म प्रचलित होने के कारण अरबी भाषा में बहुत सी किताबें लिखी गयीं और साहित्यिक अंजाम दिये गये। सफ़वी शासकों की धार्मिक नीति के कारण उस दौर में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों की प्रशंसा में शेर कहना बहुत प्रचलित था।

सफ़वी शासक शायरों को अधिक महत्व नहीं देते थे। इसी कारण कुछ ईरानी शायर पड़ोसी देशों में चले गये और वे भारतीय शासकों के दरबार की शोभा बन गये। सफ़वी दौर में शायरी दायरे से निकली और आम लोग ही शायरी करने लगे । उस दौर के बहुत से शायर ऐसे काम करते थे जो उन्हें शोभा नहीं देते थे। यह स्थिति भाषा की साहित्यिक मज़बूती के समाप्त होने का कारण बनी और वह सतही स्तर की हो गयी और अर्थ की दृष्टि से भी उसमें ऐसे विषयों को बयान किया जाने लगा जो आसानी से अपने संबोधकों की समझ में आ जायें।

सफ़वी दौर के शायर नये विषयों और काल्पनिक तस्वीरों का प्रयोग करते थे जो अतीत से भिन्न और उनके साहित्यबोध की सुन्दरता के मापदंडों के अनुरुप थीं। कुछ साहित्यकारों, लेखकों और अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि फ़ारसी साहित्य में सब्के हिन्दी के अस्तित्व में आने का कारण सफ़वी काल की सामाजिक व आर्थिक स्थिति और उस समय के साहित्यिक हल्क़ों के सौन्दर्यबोध की आवश्यकताओं का जवाब था।

सब्के हिन्दी में जो शेर हैं उनकी जटिलता का कारण यह है कि वे धीरे-धीरे व क्रमश: सामान्य विषय से जटिल विषय की ओर बढ़ते गए। ईरानी शायरों का भारतीय दरबारों में चला जाना और वहां के साहित्यबोध से उनका प्रभावित हो जाना भी ईरानी शायरों की शैली के परिवर्तित होने का एक कारण है।

फ़ारसी शेरों की जो शैलियां हैं उनमें सब्के हिन्दी का कोई मज़बूत सांस्कृतिक समर्थन नहीं है और उनमें जातीय, पौराणिक, ऐतिहासिक और आस्था संबंधी प्रतीक कम हैं। इसका कारण ईरान की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा से सब्के हिन्दी शायरों ने संपर्क तोड़ लिया था । इस सांस्कृतिक परंपरा से दूर होने का एक कारण सफ़वी दौर की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति है।