Sep ०६, २०१७ १०:२८ Asia/Kolkata

हमने बताया कि वे शाह अब्बास सफ़वी के समकालीन थे और उन्हें भारत के मुग़ल शासक शाह जहां के दरबार से मलिकुश्शुअरा की उपाधि मिली थी।

हमने यह भी बताया कि उनकी जीवनी उनकी उच्च रचनाओं की छाया में छिप गई और धीरे धीरे उनकी जीवनी का बड़ा भाग अज्ञात हो गया। कलीम ने जवानी में अन्य सफ़वी शायरों व साहित्यकारों की तरह भारत की यात्रा की और तत्कालीन मुग़ल शासक शाह जहां के दरबार तक पहुंचे। वहां उनके शेरों को बहुत पसंद किया गया और उन्हें मलिकुश्शुअरा या कवियों के सम्राट की उपाधि मिली। वर्ष 1061 हिजरी में उनका निधन कश्मीर में हुआ और उनका मज़ार इस समय श्रीनगर में मौजूद और प्रख्यात है। पिछले कार्यक्रम में हमने सफ़वी काल के राजनैतिक हालात के बारे में बात की थी। कलीम सफ़वी काल के छः शासकों के समकालीन रहे और उस काल में शासकों के दरबारों की ओर से शेर शायरी की अनदेखी के कारण, यह कला लोगों के बीच आ गई जिसके चलते साहित्यिक भाषा की जो प्रतिष्ठा थी वह प्रभावित हुई। उसी काल में ईरान से बहुत से शायर भारत सहित अनेक देशों की ओर रवाना हुए और दिल्ली व दकन के दरबारों में पहुंचे।

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कलीम के शेर, एक खिड़की की तरह हैं जिसके माध्यम से सफ़वी काल के समाज को उसी तरह देखा जा सकता है जैसा वह था। वे एक समाज शास्त्री की तरह हैं जो शेर के माध्यम से अपने समाज की वैज्ञानिक समीक्षा करते हैं। उन्होंने अपने शेरों में लोगों के दुखों, समस्याओं और पीड़ाओं को प्रतिबिंबित किया है। कलीम ने इसी तरह अपने शेरों में भ्रष्टाचार, अत्याचार, लोगों के अधिकारों के हनन, शासकों की विलासिता और अन्य सामाजिक विकारों का चित्रण किया है। उन्होंने एक ऐसे काल में जीवन बिताया जिसमें शासन की शैली, तानाशाही की थी और शासक अपने आपको लोगों की जान और माल का एकछत्र मालिक समझता था। कलीम के आस-पास की दुनिया अत्यंत क्रूर थी जिसमें तलवार का ही राज था। उन्होंने ईरान की स्थिति और तत्कालीन शासकों की नीतियों के कारण देश में पैदा होने वाले उतार-चढ़ाव भरे विशेष हालात को अच्छी तरह समझ लिया था। उनका मानना था कि जिस काल में क्रूरता समय की सबसे बड़ी विशेषता हो उसमें जीवन का एकमात्र समाधान मौत है और मौत का फ़रिश्ता, ज़मीन का सबसे दयालु अस्तित्व है।

अशांति, तनाव, दिखावा, प्रतिष्ठित लोगों का अपमान, नीच लोगों का उच्च स्थान पर पहुंचना, शायरी और शायरों की अनदेखी और उनमें से बहुत से लोगों का अन्य देशों की ओर चले जाना या फिर एकांतवास, कलीम काशानी के काल की कुछ कठिनाइयां और समस्याएं थीं जिन्हें उनके पद्य संग्रहों में देखा जा सकता है और उनके माध्यम से कवि के काल के सामाजिक और राजनैतिक माहौल को समझा जा सकता है। कलीम के शेरों की विषयवस्तु के दृष्टिगत उनके पद्य संग्रहों में धर्म, सरकार, शिक्षा व प्रशिक्षण जैसी बातें अन्य बातों से अधिक उजागर हैं। कलीम की नज़र में उनका काल, जिसमें शायरों को दरबार से निकाल दिया गया था, इस प्रकार का है जिसमें चुप ही रहना चाहिए और अगर कोई अपनी इच्छाओं की पूर्ति चाहता है तो उसे दूसरों की हां में हां मिलाना चाहिए और ज़्यादातर अवसरों पर अपने आपको अज्ञानी दर्शाना चाहिए। कलीम की नज़र में समाज में पाए जाने वाले अत्याचार के कारण लोग उन पक्षियों की तरह हैं जो पिंजरे में क़ैद हैं और वे किसी से मदद की आशा भी नहीं रख सकते।

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मलिकुश्शुअरा अबू तालिब कलीम काशानी को अपने समय के माहौल से शिकवा है क्योंकि उन्हें ईरान में अपनी शायरी से कोई लाभ नहीं हुआ। वे ऐसे काल में जीवन बिता रहे थे जिसमें कवियों व साहित्यकारों पर कड़ाई की जाती थी। उनके शेरों की किसी ने क़द्र नहीं की बल्कि उन्हें दबाने की कोशिश की गई। उनका कहना था कि अगर ईरान में बहुत से कवियों की बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा है तो इसकी वजह उन शायरों के शेरों का मूल्यहीन होना नहीं है बल्कि देश में सही ढंग से शेर समझने वाला ही कोई नहीं है। उनके विचार में जिन लोगों के हाथों में देश की बागडोर है वे कवियों व साहित्यकारों के महत्व को नहीं समझते। कलीम ने अपने शेरों में एक ऐसे काल का चित्रण किया है जिसमें बवंडर का क़ानून प्रचलित है और इसी क़ानून के कारण घास-भूसे के अलावा कोई चीज़ ऊपर जाती ही नहीं है। नीच, चापलूस और अज्ञानी लोग सत्ता में पहुंच गए हैं जबकि ज्ञानी, विद्वान और प्रतिष्ठित लोग कठिनाइयों में ग्रस्त हैं या फिर निर्वासन का जीवन बिता रहे हैं। कलीम के काल में भौतिक सोच रखने वालों और कट्टरपंथियों के दबाव के कारण बहुत से ज्ञानियों व कवियों को कठिनाइयां सहन करनी पड़ीं। इसी कारण उन्होंने अपने एक शेर में कहा था कि आबो हवाए राहत, ख़ाके वतन नदारद अर्थात देश की मिट्टी में शांति व आराम की जलवायु नहीं है।

 

कलीम के शेरों से यही बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि उनके समय में किस प्रकार के लोग सत्ता में थे। इस प्रकार के लोग मामलों का संचालन कर रहे थे जो धर्म के दावे के साथ ही पाप और भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे। वे अपने आपको लोगों के जान व माल का मालिक समझते थे। दिखावे के धर्मावलंबी, कलीम के शेरों का एक मुख्य विषय हैं। ये ऐसे लोग थे जो धर्म का चोला पहन कर लोगों को यातनाएं देते थे और समाज में अंधविश्वास और ग़लत बातों को प्रचलित करते थे। ये लोग आम लोगों के मन में अंधविश्वास वाली बातें बिठा कर उन्हें मनुष्य के भविष्य पर ग्रहों व नक्षत्रों के प्रभाव जैसी काल्पनिक और असंभव बातों को मानने के लिए तैयार करने की कोशिश करते थे।

सफ़वी शासकों की नीतियों और धार्मिक युद्धों और इसी तरह ज्ञान व संस्कृति के केंद्रों की तबाही के कारण उस काल के शायरों के बारे में जानकारी बड़ी सीमित है। उस काल में साहित्य का गहरा ज्ञान व व्यापक सार्वजनिक सूचनाएं रखने वाले कवि बहुत कम दिखाई देते हैं बल्कि बहुत से कवि तो ऐसे भी दिखाई देते हैं जिन्हें फ़ारसी भाष के व्याकरण का भी सही ज्ञान नहीं था। कलीम काशानी का मानना था कि अज्ञान के कारण अज्ञानी व हीन लोग अपने आपको हुमा अर्थात सौभाग्य का पक्षी समझने लगे थे। वे कहते थे कि जिस काल में वे जीवन बिता रहे हैं वह नीच लोगों का ज़माना है और हीन लोग, शिखर पर जा बैठे हैं। उस काल में ग़ज़ल और सूफ़ियाना शायरी दोनों को छोड़ दिया गया था क्योंकि सफ़वी शासकों को ये दोनों ही पंसद नहीं थीं।

कलीम का मानना था कि सफ़वी काल में कलाकारों पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है और कला व ज्ञान के पेड़ पर अधिक फल फूल नहीं लग रहे हैं। उनके विचार में वह ऐसा काल था कि जिसके भी अस्तित्व में कला का कोई प्रकाश हो उसका जीवन इतना अंधकारमय बना दिया जाता है कि वह अपने सामने की चीज़ भी नहीं देख पाता। एक शेर में उन्होंने कहा है कि जो भी परिपूर्णता तक पहुंचा वह अपमानित हुआ फल जब पक जाता है तो ज़मीन पर गिर जाता है।