ईरान से भारत पलायन करने वाले साहित्यकारों का पलायन।
पलायन का अर्थ केवल यह नहीं है कि मनुष्य एक भौगोलिक क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्र में चला जाए बल्कि इससे सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवर्तन भी होते हैं।
कुछ लोग अपने देश के घुटन भरे माहौल से बचने के लिए तो कुछ लोग नई ज़िंदगी की तलाश में जब कि कुछ लोग आर्थिक दृष्टि से सुधार के उद्देश्य से पलायन करते हैं। वैसे लोग अधिक्तर पलायन के लिए उन स्थानों का चयन करते हैं जिन्हें वे पसंद करते हैं। बाद में वे वहां पहुंचने के लिए अपने प्रयास आरंभ कर देते हैं।
भारतीय उप महाद्वीप एसा स्कान है जो जिसका विगत में आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक दृष्टि से पलायनकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप एसा स्थान है जहां रंगारंग संस्कृतियां पाई जाती हैं या दूसरे शब्दों में जहां विभिन्न संस्कृतियों का संगम है। कुछ लोग केवल इसको निकट से देखने के उद्देश्य से भारत गए और वहां से इतना प्रभावित हुए कि वहीं के हो गए। पिछली कई शताब्दियों से भारत में एसे शासक भी रहे हैं जो पलायनकर्ता थे। दिल्ली और दकन पर शासन करने वाले कभी तुर्की मूल के, कभी अफ़ग़ानी मूल के तो कभी ईरानी मूल के शासक रहे हैं।
जिन लोगों ने सबसे पहले ईरान से भारत पलायन किया उनमे सर्वोपरि पारसी के आठवी शताब्दी में ईरान में सासानी शासन श्रंखला के समाप्त होने के बाद ईरान के पारसी धर्म के लोग भारत जाने लगे। उनकी नस्ल के लोग आज भी भारत में मौजूद हैं जिनको पारसी कहा जाता है। वर्तमान समय में पारसी समुदाय की बहुत बड़ी संख्या भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शांतिपूर्ण ढंग से जीवन व्यतीत कर रही है। एक इतिहासकार शहरयार नक़वी कहते हैं कि इन ईरानी पलायनकर्ताओं ने भारत में सामाजिक दृष्टि से सेवाएं कीं और ज्ञान-विज्ञान तथा आर्थिक क्षेत्र में भी नाम कमाया।
पारसियों के बाद संगठित रूप में जो ईरानी गुट भारत गया वह मुसलमानों का था। वे लोग महमूद ग़ज़नवी द्वारा भारत के कई क्षेत्रों पर नियंत्रण के बाद वहां गये। विजयी क्षेत्रों का संचालन करने के उद्देश्य से महमूद ग़ज़नवी के सैनिक और सेना कमांडर भारत के विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर मुल्तान, लाहौर, सिंध तथा अन्य क्षेत्रों में ठहरे और उन्होंने लाहौर को राजधानी बनाया। इस प्रकार बहुत से सैनिकों को लाहौर लाया गया।
तेरहवीं शताब्दी में जब मंगोलों ने ईरान पर हमला किया तो उससे ईरान का ख़ुरासान क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ। उस समय ख़ुरासान साहित्य का केन्द्र माना जाता था और वहां पर विश्व स्तर के साहित्यकार कवि और लेखक रहा करते थे। मंगोलों ने बहुत बड़ी संख्या में साहित्यकारों की हत्याएं कीं। मंगोलों के अत्याचारों के कारण उस समय के बहुत से कवि और लेखक अपना देश छोड़ने पर विवश हुए। इनमे से बहुत कम लोग दूर के देशों में गए जबकि अधिकांश, पड़ोसी देश भारत पलायन कर कर गए। इस प्रकार बहुत बड़ी संख्या में ईरानी विद्धान, व्यापारी, लेखक, और कवि भारत पहुंचे जिन्होंने भारत में उल्लेखनीय कार्य किये। इतिहासकारों का कहना है कि पलायन की यह प्रक्रिया लगभग एक शताब्दी तक जारी रही।
कभी-कभी शासकों की ग़लत नीतियां और राजनैतिक खींचतान भी ईरानियों के पलायन का कारण रही। इतिहास में मिलता है कि भारत में अकबर के सत्तासीन होने के बाद, ईरान के इस्फ़हान में मौजूद साहित्य का केन्द्र दिल्ली स्थानांतरित हो गया। इतिहासकारों का कहना है कि सफ़वीकाल में बहुत से लोग दो कारणों से ईरान छोड़कर दूसरे देशों में जाने पर विश्व हुए जिसमें से अधिकांश भारत गए। इसका एक कारण तो सफवी शासकों का व्यवहार और दूसरे भारत पहुंचकर राजदरबार से कुछ हासिल करना था। इस प्रकार बहुत से कवि, लेखक, कलाकार और साहित्यकार भारत गए। इसका एक कारण यह था कि वे तत्कालीन तैमूरी शासक जो भारत पर शासन करते थे वे ईरान को अपने ही देश के रूप में देखते थे। वे ईरानियों को अपना ही मानते थे। यही कारण है कि वे उनकी योग्यताओं से लाभ उठाते थे। इसका परिणाम यह निकला कि उस समय विश्व के साहित्य का केन्द्र इस्फ़हान, दिल्ली स्थानांतरित हो गया।
इस प्रकार से दिल्ली या दकन के दरबारों में फ़ारसी भाषी कवि अवश्य हुआ करते थे। दिल्ली के अतिरिक्त लाहौर, लखनऊ, आगरा, दकन, कश्मीर, जौनपूर में फार्सी भाषा के विख्यात कवि रहते थे जैसे उर्फ़ी शीराज़ी, नज़ीर नैशापुरी, ज़ुहूरी तरशीज़ी, तालिब आमोली, कलीम काशानी और ताएब तबरीज़ी आदि। इन नगरों और क्षेत्रों में फ़ार्सी बहुत तेज़ी से फूली-फली। इस प्रकार कहा जा सकता है कि उस काल में ईरानी कवियों का भारत पलायन करना, एक फ़ैशन बन चुका था। फ़ारसी भाषा का हर अच्छा शायर भारत जाने की इच्छा रखता था।
इतिहास की बहुत सी किताबों में मिलता है कि भारत के वे बहुत से राजा जो मुसलमान थे, वे न केवल कलाप्रेमी थे, बल्कि साहित्यकारों का भी बहुत सम्मान किया करते थे। वे धर्मगुरूओं का भी बहुत सम्मान किया करते थे। “तारीख़े फ़रिश्ते” नामक किताब के लेखक मुहम्मद क़ासिम हिंदुशाह, महमूद ग़ज़नवी के काल का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि उस काल में साहित्यकारों और धर्मगुरूओं का सम्मान किया जाता था। वे अपनी एक पुस्तक में ईरान के विश्वविख्यात महाकवि “सअदी” को भारत आने के निमंत्रण के बारे में लिखते हैं कि ग़ेयासुद्दीन के बेटे ने महाकवि सअदी को भारत आने का निमंत्रण दिया था जिससे पता चलता है कि भारत के राजाओं और शासकों में फ़ारसी भाषा के प्रति कितना लगाव था। “तारीख़े फ़रिश्ते” नामक किताब के लेखक, पूर्वी भारत के एक शासक शाह इब्राहीम की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं कि उनके शासनकाल में बहुत से ईरानी विद्धवान जो अपने देश के हालात से परेशान से सुरक्षा की दृष्टि से भारत आए और जौनपूर में जाकर बस गए।
मुग़लों के ज़माने में ईरान के बहुत से लेखक पलायन करके भारत आए। अपनी योग्ताओं और क्षमताओं के कारण उन्होंने राजदरबार में स्थान बना लिया। इनमें से कुछ ने राजदरबार में मलिकुश्शोअरा अर्थात कवियों के सम्राट की उपाधि तक प्राप्त कर ली थी।
साहित्यकारों के अतिरिक्त एक गुट सूफ़ियों का भी था जो भारत गये। यह लोग भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के कारण वहां गए और फिर वहीं बस गए। इनमें एक गुट व्यापारी वर्ग का भी था जो व्यापारिक लाभ की दृष्टि से भारत गया था। इनमें से कुछ ने भारत में ख़ूब ख्याति कमाई और धन अर्जित किया।