Sep ०६, २०१७ ११:३० Asia/Kolkata

हमने बताया था कि आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप, लंबे समय से पलायनकर्ताओं का केन्द्र रहा है।

लगभग एक हज़ार साल तक भारत में ऐसे शासकों ने राज किया जो पूर्ण रूप से भारतीय मूल के नहीं थे।  भारतीय उपमहाद्वीप की ओर ईरानी बुद्धिजीवियों के पलायन का एक कारण यह भी था कि ईरान और भारत के संबन्ध शताब्दियों पुराने और बहुत घनिष्ठ रहे हैं।  सामूहिक रूप में जो लोग ईरान से भारत गए उनमे सबसे पहले ज़रतुश्ती या पारसी समुदाय के लोग थे।  यह पारसी लोग भारत जाकर वहीं के हो कर रह गए।  यह समुदाय आज भी भारत में मौजूद है।  पारसियों के बाद जो लोग बड़ी संख्या में ईरान से भारत गए वे मुसलमान थे।  मंगोलों के ईरान विशेषकर ख़ुरासान पर हमले के कारण बहुत बड़ी संख्या में इस क्षेत्र के बुद्धिजीवी, भारत पलायन कर गए।  जो लोग बहुत बड़ी संख्या में ख़ुरासान से भारतीय उप महाद्वीप गए थे उनमें अधिकांश कवि, लेखक, कलाकार, साहित्यकार और शिक्षित लोग थे। इतिहास में मिलता है कि पलायन की यह प्रक्रिया लगभग एक शताब्दी तक जारी रही।  इसके बाद बड़ी संख्या में पलायनकर्ता, सफ़वी शासनकाल में ईरान से भारत गए।

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उस काल में जो भारत के राजा-महाराजा थे वे या तो साहित्य और कला प्रेमी थे या स्वंय भी इनमे दक्षता रखते थे।  भारतीय राजाओं में सुलेखन के प्रति गहरा लगाव पाया जाता था।  उस समय ईरान में सुलेखन काल बहुत प्रचलित थी और ईरान में विश्व विख्यात सुलेखक रहा करते थे।  ईरान में 13वीं शताब्दी में नस्तालीक़ लीपि चलन में आई।  बाद में ईरानी सुलेखकों के माध्यम से यह भारत भी गई और वहां प्रचलित हुई।  भारतीय राजाओं ने इसका स्वागत किया।  उन्होंने ईरान के विख्यात सुलेखकों को भारत बुलवाकर अपने दरबार में जगह दी।  अकबर के दरबार में बड़ी संख्या में लेखक, सुलेखक, कवि, कलाकार, साहित्यकार और विद्वान थे।  इनको अच्छा वेतन दिया जाता था और त्योहरों के अवसरों पर अच्छे उपहार भी प्रदान किये जाते थे।  कुल मिलाकार यह कहा जा सकता है कि तत्कालीन भारतीय राजा, कलाप्रेमी हुआ करते थे।

इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि ईरान से जो बुद्धिजीवी पलायन करके भारत गए थे उनमें से कुछ कुशल चिकित्सक भी थे।  दिल्ली और दकन के दरबारों में इसी प्रकार के दक्ष एवं कुशल चिकित्सक थे जिन्हें हकीम कहा जाता था।  यही हकीम इस्लामी चिकित्सा को अपने साथ भारतीय उपमहाद्वीप ले गए।  यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि इस चिकित्सा शैली ने भारतीय उपमहाद्वीप में बहुत विकास किया जो आज भी पाई जाती है।  भारत ने मुग़ल शासक ईरानी चिकित्सकों से भी अपना इलाज करवाया करते थे।  “तारीख़े फेरिश्ते” नामक किताब के लेखक अपनी किताब में लिखते हैं कि अकबर के दरबार में एक ईरानी हकीम थे जिनका नाम था, “हकीम ऐनुलमुल्क गीलानी”।  चिकित्सा के क्षेत्र में वे बहुत ही दक्ष थे।  यह ईरानी हकीम अपनी कला में इतने निपुर्ण और दक्ष थे कि लोगों का कहना था कि वे मरीज़ों के उपचार में चमत्कार कर देते हैं अर्थात असाध्य रोगों का बड़ी आसानी से उपचार करते थे।

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भारतीय उपमहाद्वीप में पलायनकर्ताओं के माध्यम से जहां पर ईरान से कला और ज्ञान पहुंचा वहीं पर सूफ़ीवाद भी इसी की देन है।  भारत में सूफ़ीवाद, सूफ़ियों के माध्यम से ही ईरान से वहां पर पहुंचा और फिर ख़ूब फूलाफला।  कहा जाता है कि लगभग ग्यारहवी शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के मुल्तान से सूफीमत दूसरे स्थानों पर फैला।  इस क्षेत्र में जो पहले सूफीसंत थे वे “शैख़ सफ़युद्दीन काज़रूनी” थे।  काज़रूनी, ईरान के शीराज़ नगर का एक क्षेत्र है।  उस्ताद तौफ़ीक़ सुब्हानी के कथनानुसार ग़ज़नवी द्वारा क्षेत्र की भूमियों पर विजय के बाद सूफ़ियों की गतिविधियां तेज़ हो गईं।  सूफ़ियों ने प्रचार और प्रसार आरंभ किया तथा सूफीमत को भारत में बढ़ावा दिया।  इनका झुकाव अधिक्तर आधयात्म की ओर होता था अतः आम लोगों में उनका प्रभाव बढ़ता गया।  सूफ़ी अधिकांश सांसारिक मायामोह से दूर रहते थे और राजाओं की सेवा में रहने के स्थान पर जनता के बीच सादा जीवन गुज़ारते थे।  वे लोग मानव कल्याण के बारे में अधिक संवेदनशील थे।

ईरान से जो तसव्वुफ़ या सूफ़ीवाद भारत पहुंचा वह किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहा बल्कि हर ओर फैला।  आम लोगों में इसकी लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यह न केवल शहरों में था बल्कि गांव-गांव पहुंचा।  भारत में सूफ़ीयों की बहुत सी ख़ानक़ाहें थीं जिनका स्थानीय राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव था।  ख़ानक़ाह उस स्थान को कहते हैं जहां पर सूफीसंत रहा करते थे।

“कश्फुल महजूब” नामक पुस्तक के लेखक और ग्यारहवीं शताब्दी के सूफी विद्वान “अबुल हसन अली बिन उस्मान” लाहौर गए और वहीं पर रहने लगे।  उन्होंने इरफ़ान के बारे में अपनी पुस्तक लाहौर में लिखी।  उनको दाता गंज बख्श के नाम से भी जाना जाता है।  लाहौर में सैयद अबुल हसन बिन उस्मान बिन अली अलहजवेरी की दरगाह है जिसे दाता दरगाह के नाम से जाना जाता है।  उन्हें वहां के सूफ़ियों का सरपरस्त भी कहा जाता है।  सैयद अबुल हसन अलहजवेरी के बाद बहुत से सूफी, भारतीय उपमहाद्वीप गए और उन्होंने सूफीमत का प्रचार व प्रसार किया।  इन सूफ़ियों से स्थानीय लोग बहुत प्रभावित हुए।  भारतीय उप महाद्वीप में फ़ारसी भाषा के महत्व के संदर्भ में शोध करने वाले क्यूमर्स अमीरी अपने शोध में लिखते हैं कि इस क्षेत्र में फ़ार्सी भाषा के प्रचलित होने और उसके प्रचार व प्रसार में उन आरंभिक पलायनकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

ईरान पर मंगोलों के हमले के बाद जिन महान सूफ़ियों ने भारतीय उप महाद्वीप की ओर पलायन किया उनमें ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और शेख निज़ामुद्दीन औलिया का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।  वैसे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा के प्रचार एवं प्रसार में सूफ़ी संतों का बहुत योगदान रहा है।  इसका मुख्य कारण सूफ़ियों का आम लोगों से निकट का संपर्क था।

सन 1383 ईसवी में जब ईरान पर तैमूर ने हमला किया तो ईरान के हमदान से 70 0 लोग सामूहिक रूप में भारत पलायन कर गए।  इसका मुख्य कारण यह था कि तैमूर, हमदान के अलवी सादात को समाप्त करना चाहता था।  यह वहां के प्रभावशाली लोग थे जिनका जनता में मान-सम्मान था।  हमदान के अलवी सादात के 700 लोग, सैयद मीर अली हमदानी के नेतृत्व में हमदान से कश्मीर पलायन कर गए।  सैयद मीर अली हमदानी को “अमीर कबीर” के नाम से जाना जाता था।  कश्मीर के तत्कालीन राजा ने इन लोगों का स्वागत किया।  इस प्रकार कश्मीर में भी पलायनकर्ता जाने लगे।

भारत में सूफीसंत की जो विचारधाराएं प्रचलित हुईं उनमे प्रमुखता से यह थीं सोहरावर्दी, नक़शबंदी, क़ादिरी, चिश्ती, क़लंदरी और शुस्तरी।  यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि जो सूफीसंत, ईरान से भारतीय उपमहाद्वीप गए उनमें से कई को भारत से राजाओं और शासकों ने निमंत्रण देकर बुलवाया था।  इतिहास में मिलता है कि दकन के राजा सुल्तान अहमद शाह ने “शाह नेमतुल्लाह वली” को किरमान के माहान से दकन आने का निमंत्रण दिया था।  उनके इस निमंत्रण पर शाह नेमतुल्लाह वली ने अपने पोते मीर नूरुल्लाह को भारत भेजा था।  “तारीख़े फ़रिश्ते” नामक पुस्तक के लेखक इस बारे में लिखते हैं कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि मीर नूरुल्लाह बाद में ईरान वापस चले गए थे जबकि वे वापस ईरान नहीं जा सके बल्कि दकन अर्थात वर्तमान हैदराबाद में ही रह गए और वहीं पर उनका देहांत हुआ।