ईरान से भारत पलायन करने वाले साहित्यकारों का पलायन।-3
हमने भारतीय उपमहाद्वीप की ओर विभिन्न कवियों और साहित्यकारों के पलायन की ओर संकेत किया था और बताया था कि कई सौ साल तक भारत में विदेशियों का शासन रहा।
भारत से गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों के कारण ईरानियों को अन्य पलायनकर्ताओं की तुलना में विशेष स्थिति प्राप्त थी। आरंभ में ईरान से पारसी और फिर मुसलमान विभिन्न सदियों में भारत जाते रहे। इसी तरह हमने बताया था कि ईरान से भारत की ओर होने वाला अधिकतर पलायन, ईरान पर मंगोलों के हमले के समय हुआ और उसके बाद सफ़वी काल में भी बड़ी संख्या में ईरानी साहित्यकार, शायर, लेखक, कलाकार, चिकित्सक और सूफ़ी इत्यादि भारत पहुंचे। भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम के प्रसार में सूफ़ियों की अहम भूमिका रही है।
अध्ययनकर्ताओं और इतिहासकारों ने भारत की ओर ईरानियों के व्यापक पलायन के विभिन्न कारण बताए हैं जिनमें ईरान पर मंगोलों के विध्वंसक हमले और इस देश पर उनके अत्याचारी शासन की स्थापना, उसके बाद सफ़वी शासकों की कड़ाई और उनकी ओर से कला व साहित्य की अनदेखी और भारत व दकन के दरबारों का आकर्षण मुख्य रूप से उल्लेखनीय हैं। बहर हाल कारण जो भी रहा हो, एक लम्बे समय तक भारत के अधिकांश बड़े दरबारों में फ़ारसी का चलन रहा और शासक व दरबारी एक दूसरे से इसी भाषा में बात करते थे।
यह ऐसी स्थिति में था कि भारत के बहुत सारे क्षेत्रों में राजनैतिक सत्ता प्रायः तुर्कों और मुग़लों के हाथ में थी लेकिन ईरानी संस्कृति भारत के दरबारों में छाई हुई थी। भारत के पूरे इतिहास में अफ़ग़ानों और तुर्कों जैसे विभिन्न विदेशियों ने हमले किए और दिल्ली के दरबार तक भी पहुंच गए लेकिन फिर धीरे धीरे उनकी अपनी भारतीय पहचान बन गई। भारतीय समाज के विभिन्न सामाजिक मैदानों में ईरानी संस्कृति की झलक दिखाई देने लगी जिससे इस क्षेत्र में ईरानी संस्कृति के प्रभाव का पता चलता है। भारत में ईरानी संस्कृति के प्रसार का एक अहम कारण, इस क्षेत्र में फ़ारसी भाषा का चलन है। जब महमूद ग़ज़नवी ने भारत के एक बड़े भाग पर क़ब्ज़ा किया तो उसी समय से इस देश में फ़ारसी प्रचलित होने लगी। फिर जब भारत पर मुग़लों का राज हुआ और ईरान से विभिन्न वर्गों के लोग भारत पहुंचने लगे तो इस भाषा का प्रसार और तेज़ हो गया।
ईरान के बहुत से विद्वान और बुद्धिजीवी भारत गए और वहीं के हो के रह गए। उस काल में मुलतान से लेकर बंगाल तक फ़ारसी भाषा फैल गई। बताया जाता है कि ईरान के प्रख्यात सूफ़ी मीर सैयद अली हमदानी के माध्यम से फ़ारसी भाषा कश्मीर पहुंची। वे सात सौ कलाकारों के साथ कश्मीर पहुंचे थे। मीर सैयद अली हमदानी ने बड़े ही रोचक और दिल में बैठ जाने वाले अंदाज़ में इस्लाम धर्म की शिक्षाएं आम लोगों तक फ़ारसी भाषा में पहुंचाई। उन्होंने इसी तरह बड़ी संख्या में धर्म प्रचारकों का प्रशिक्षण किया और उन्हें कश्मीर के विभिन्न स्थानों की ओर रवाना किया।
पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी ईसवी में भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा अधिक व्यापक रूप से फैली। इस काल सुलतान सिकंदर लोधी ने सभी के लिए फ़ारसी सीखना और लिखना-पढ़ना अनिवार्य कर दिया था। सिंध के क्षेत्र में पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी ईसवी में फ़ारसी भाषा का फैलाव आश्चर्यजनक है। यह क्षेत्र वर्ष 927 से 1021 हिजरी क़मरी तक चंगेज़ ख़ान के वंश के लोगों के शासन के अधीन था। इस दौरान सिंध में फ़ारसी भाषा ने जो प्रगति की है वह शोधकर्ताओं की नज़र में आश्चर्य चकित करने वाली है।
अरग़ून के नाम से विख्यात चंगेज़ ख़ान के वंशजों ने ईरानी विद्वानों और धर्मगुरुओं को सिंध आमंत्रित किया। शाह हुसैन अरग़ून उर्फ़ सिपाही के समय में फ़ारसी भाषा और इसके साहित्य की शिक्षा के लिए कई स्कूल खोले गए। सम्राट अकबर के काल में राजा टोडरमल के आदेश से पूरे भारत में, फ़ारसी ने स्थानीय भाषा का स्थान ले लिया। ईरान के प्रख्यात शोधकर्ता महदी ग़रवी ने इस बारे में एक अहम लेख लिखा है। वे कहते हैं कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी ने स्थानीय भाषा का स्थान ले लिया और सम्राट के आदेश के अनुसार सारा हिसाब-किताब हिंदी भाषा के बजाए, फ़ारसी में रखा जाने लगा।
भारत में मुसलमानों का प्रभाव बढ़ने के साथ ही इस देश में अरबी, तुर्की और फ़ारसी भाषा का चलन भी बढ़ने लगा। धार्मिक शब्द अधिकतर अरबी भाषा में थे, वस्त्रों, खाने पीने की चीज़ों और तुर्की द्वारा भारत लाई गई चीज़ों के नाम यथावत तुर्की भाषा के थे जबकि लिखने-पढ़ने, कूटनीति और सरकारी काम-काज की ज़बान फ़ारसी थी। कश्मीर और दकन में फ़ारसी, धीरे धीरे लिखने की सार्वजनिक भाषा बन गई। मलिकुश्शोअरा बहार के अनुसार तैमूरी काल में फ़ारसी भाषा, भारत में विज्ञान की और प्रगति करने वाली भाषा थी और इसे सम्मान व प्रतिष्ठा का कारण समझा जाता था।
चूंकि फ़ारसी भाषा अधिकतर सरकारी तंत्र और शहरों में रहने वाले प्रतिष्ठित लोगों के बीच प्रचलित थी इसी लिए वह उससे आगे बढ़ कर लोगों में व्यापक रूप से प्रचलित न हो सकी लेकिन उसके बहुत से शब्द आम लोगों की ज़बान पर चढ़ गए। इस समय भी भारत में अनेक वस्तुओं, पदों, करों, न्यायायिक शब्दावली और कार्यालयों के नियमों इत्यादि के नाम फ़ारसी भाषा के हैं। भारत की स्थानीय भाषाओं और फ़ारसी भाषा के मेल से विशेष कर उत्तर भारत में एक तीसरी ज़बान उभरी जिसे उर्दू कहा जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ईरानियों और अन्य फ़ारसी भाषियों के भारत पलायन और भारतीय संस्कृति पर उनके प्रभाव का एक अहम नतीजा उर्दू है। डाक्टर ताराचंद, उर्दू को हिंदुओं और मुसलमानों की साझा धरोहर बताते हैं और उसे फ़ारसी व भारतीय भाषा का सुंदर मिश्रण कहते हैं। उनका कहना है कि यह भाषा, ईरानी सूफ़ियों के भारत पलायन का परिणाम है।
ईरानियों के भारत पलायन का एक वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परिणाम, फ़ारसी भाषा में विभिन्न ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक किताबों का संकलन है। कुछ ईरानी पलायनकर्ताओं ने, जो भारत गए थे, इतिहास के संबंध में अनेक किताबें लिखी हैं जिनसे इन दो गुटों के संबंधों और सांस्कृतिक रिश्तों का पता चलता है। इनमें सम्राट अकबर के मंत्री अबुल फ़ज़्ल की लिखी हुई किताब आईने अकबरी का मुख्य रूप से उल्लेख किया जा सकता है जो भारत पर मुग़ल शासकों के समय की घटनाओं पर आधारित है। इसी तरह फ़रिश्ता के नाम से मशहूर मुहम्मद क़ासिम की लिखी हुई तारीख़े फ़रिश्ता भी इस संबंध में एक अहम किताब है। वे अहमद नगर के शासक के दरबारी थे। ग़ुलाम हुसैन ख़ान की सैरुल मुतअख़्ख़ेरी भी भारत की ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में लिखी जाने वाली इतिहास की एक महत्वपूर्ण किताब है। इसी तरह भारत पलायन करने वाले ईरानियों ने विभिन्न विषयों पर अनेक अहम किताबें लिखी हैं।
भारत के फ़ारसी भाषियों की जीवनी के बारे में भी ईरानी पलायनकर्ताओं ने कई अहम किताबें लिखी हैं। लबाबुल बाब फ़ारसी शायरों की जीवनी पर लिखी गई पहली किताब है जो मुलतान में सातवीं शताब्दी हिजरी के प्रख्यात ईरानी विद्वान सदीदुद्दीन मुहम्मद ऊफ़ी ने लिखी है। भारत जाने वाले ईरानियों ने इसी तरह फ़ारसी व्याकरण और शब्दकोषों के संकलन के बारे में अथक प्रयास किए हैं। फ़रहंगे जहांगीरी, बुरहाने क़ाते और फ़रहंगे रशीदी, भारत में ईरानियों द्वारा लिखे गए प्रमुख शब्दकोष हैं।