Mar १५, २०१६ १४:३५ Asia/Kolkata

ख़्वाजा अबू याक़ूब, यूसुफ़ बिन हसन बूज़ंजर्दी हमदानी का सन् 1049 में हमदान के बूज़ंजर्द गांव में जन्म हुआ।

ख़्वाजा अबू याक़ूब, यूसुफ़ बिन हसन बूज़ंजर्दी हमदानी का सन् 1049 में हमदान के बूज़ंजर्द गांव में जन्म हुआ। यह गांव मंगोलों के शासन से पहले तक आबाद था और उसके बाद उजड़ गया। ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी प्रारम्भिक शिक्षा के बाद, 18 वर्ष की आयु में बग़दाद चले गए और वहां तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वान अबू इसहाक़ शीराज़ी से धर्मशास्त्र, हदीस और वाद्शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की।

निज़ामिया बग़दाद के प्रमुख अबू इसहाक़ शीराज़ी कम आयु के बावजूद ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी को अपने अन्य विद्यार्थियों पर वरीयता देते थे। उस समय बग़दाद विभिन्न मतों और विचारधाराओं विशेष रूप से हंबलियों और शाफ़ईयों के बीच वाद-विवाद का केन्द्र हुआ करता था। यही कारण था कि ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी इस विषय में विशेषज्ञ बन गए। वर्षों बाद 65 वर्ष की आयु में वक्ता और बड़े सूफ़ी के रूप में वे बग़दाद वापस गए और वहां निज़ामिया मदरसे में शिक्षक बन गए।

ख़्वाजा यूसुफ़ ने बग़दाद के दक्ष गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करने के बाद, इसफ़हान, सेमनान और ख़ुरासान का रुख़ किया और वहां तत्कालीन सूफ़ी विद्वानों शेख़ अब्दुल्लाह जुवैनी, शेख़ हसन सेमनानी और विशेष रूप से शेख़ अबू अली फ़ारमदी की सेवा में उपस्थित होकर उनसे लाभ उठाया। उनका सूफ़ीवाद फ़ारमदी से प्रभावित था। उसके बाद वे समरक़ंद, बुख़ारा, मर्व और हेरात गए और अपने शिष्यों को शिक्षा-दीक्षा दी। मर्व में उन्होंने अपने अनुयाईयों की शिक्षा-दीक्षा के लिए एक अद्वितीय मठ या आश्रम की स्थापना की, जहां बड़ी संख्या में उनके शिष्य उपासना में लीन रहते थे। इब्ने ख़लकान ने उनके मठ को अद्वितीय क़रार दिया है।

यूसुफ़ हमदानी के बारे में सबसे पहले जानकारी देने वाले ईरानी इतिहासकार समआनी ने मर्व के मठ में ख़्वाजा से मुलाक़ात की थी। इसी प्रकार, प्रसिद्ध कवि सनाई भी ख़्वाजा के अनुयाईयों में से थे, उन्होंने हदीक़तुल हक़ीक़ा मसनवी लिखने के बाद, कुछ समय तक मर्व में शेख़ हमदानी से शिक्षा-दीक्षा ली और उनके चाहने वालों में गिने जाने लगे।

ख़्वाजा की आयु का अंतिम दौर मर्व और हेरात में गुज़रा। सन् 1141 में मर्व की जनता के निमंत्रण पर हेरात से मर्व की ओर जाते हुए, हेरात और बग़शूर के बीच बामियान शहर के बादग़ीस के इलाक़े में उनका निधन हो गया और उन्हें वहीं दफ़्ना दिया गया। उसके बाद उनके एक चाहने वाले इब्ने नज्जार ने उनका शव मर्व स्थानांतरित किया और वर्तमान स्थान पर दफ़्न किया। मर्व के उत्त्तर में 30 किलोमीटर की दूरी पर प्रसिद्ध बीराम इलाक़े में ख़्वाजा यूसुफ़ के नाम से उनका मज़ार है, जहां बड़ी संख्या में लोग ज़ियारत के लिए जाते हैं।

ख़्वाजा युसुफ़ ने अपने अनुयाईयों और चाहने वालों के मार्गदर्शन के लिए अपने बाद अपने चार दक्ष शिष्यों को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। ख़्वाजा के निधन के बाद उनके मुरीदों और शिष्यों ने सूफ़ीवाद की शिक्षा-दीक्षा के लिए उनका अनुसरण किया। ख़्वाजा यूसुफ़ ने अपने एक दक्ष शिष्य ख़्वाजा अब्दुल ख़ालिक़ ग़जदवानी के साथ मिलकर प्रसिद्ध सूफ़ी मत की स्थापना की, इस मत को बाद में बहाउद्दीन मोहम्मद ने आगे बढ़ाया। उसके बाद से यह मत नक़्शबंदिया के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो सूफ़ीवाद का एक महत्वपूर्ण मत है।

नक़्शबंदिया मत ने कि जिसके संस्थापक ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी माने जाते हैं, सदियों तक मध्य एशिया, मेसोपोटामिया, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, भारत, इराक़, ईरान, तुर्की और उत्तरी अफ़्रीक़ा तक सूफ़ीवाद का विस्तार किया।

उस्ताद सईद नफ़ीसी ने ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी के बारे में लिखी गई अब्दुल ख़ालिक़ ग़जदवानी की किताब साहेबिया को प्रकाशित किया है और इस किताब को ख़्वाजा के बारे में सबसे महत्वपूर्ण किताब क़रार दिया है। हालांकि डा. मोहम्मद अमीन रियाही का मानना है ख़्वाजा के नाम, काल और जन्म एवं निधन के स्थान के संबंध में इस किताब में जिन चीज़ों का उल्लेख किया गया है, वे ख़्वाजा के वास्तविक व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती हैं। उनका मानना है कि ख़्वाजा को उनकी एकमात्र रचना रुतबतुल हयात द्वारा पहचाना जा सकता है।

 

ख़्वाजा की एकमात्र किताब रुतबतुल हयात है, जो छोटी सी है लेकिन बहुत ही मूल्यवान है, जिसमें चिंतन मनन की ज़रूरत है। यह किताब इंसान की ज़िंदगी और उसके चरणों के बारे में सवाल जवाब की शैली में लिखी गई है। इस किताब की भाषा सरल और समृद्ध है और उसमें नई नई बातों का उल्लेख किया गया है।

ख़्वाजा यूसुफ़ इस किताब में अपने रहस्यवाद को तार्किक शैली में बयान करते हैं। उनकी यह किताब फ़ार्सी सूफ़ीवादी साहित्य में प्रारम्भिक रचनाओं में से है। इस किताब की एडिटिंग करने वाले उस्ताद मोहम्मद अमीन रियाही का मानना है कि ख़्वाजा यूसुफ़ उन प्रथम रहस्यवादियों में से हैं, जिन्होंने फ़ार्सी भाषा में अपने रहस्यवाद की रचना के लिए भूमि प्रशस्त की। कुछ शोधकर्ताओं ने मनाज़िले सायेरीन और मनाज़िले सालेकीन किताबों को भी ख़्वाजा की रचना क़रार दिया है, हालांकि अभी तक यह किताबें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।

ख़्वाजा यूसुफ़ एक दक्ष उपदेशक थे और अपने रहस्यवाद को तार्किक शैली में बयान किया करते थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक़, उनकी शैली किसी हद तक बग़दाद के निज़ामिया मदरसे से प्रभावित थी, जहां उन्होंने शिक्षा ग्रहण की थी। ख़्वाजा यूसुफ़ के समकालीन इतिहासकार समआनी के मुताबिक़, ख़्वाजा यूसुफ़ ने अबू इसहाक़ शीराज़ी की सेवा में उपस्थित होकर धर्मशास्त्र और अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त किया।

उनकी किताब रुतबतुल हयात में यह शैली स्पष्ट रूप में देखी जा सकती है।

ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी के काल की सामाजिक एवं शैक्षिक स्थिति पर नज़र डालने से पता चलता है कि संकीर्णता हिजरी क़मरी की पांचवी शताब्दी के बाद के रहस्यवादियों में पायी जाती है। इसलिए कि इस काल में ग़ज़नवी और सलजूक़ी शासनों की धार्मिक नीतियों के अलावा अशअरी मत के संकीर्ण विचारों ने भी ज्ञान के क्षेत्र में अपनी पैठ बना ली थी। इस काल के सूफ़ियों के विचार तीसरी और चौथी शताब्दी के बस्तामी और हुसैन हल्लाज जैसे रहस्यवादियों की भांति आज़ाद नहीं थे।

उदाहरण स्वरूप, उस काल के तीन प्रमुख रहस्यवादी शेख़ जाम, ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी और इमाम मोहम्मद ग़ज़ाली संकीर्ण विचारों के प्रतीक थे। लेकिन उस काल में भी ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी एक उच्च और आज़ाद विचारों वाले सूफ़ी थे। यहां तक कि कुछ शोधकर्ताओं ने उनके व्यक्तित्व को अबुल हसन ख़रक़ानी, अबू सईद अबुल ख़ैर और बाबा ताहिर हमदानी की भांति क़रार दिया है।

रहस्यवादियों में से ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी को इमाम मोहम्मद ग़ज़ाली के अधिक निकट समझा जाता है। यह दोनों ही, महान रहस्यवादी अबू अली फ़ारमदी के शिष्य थे, जिन्होंने रहस्यवाद को बिखरे हुए विचारों और उपदेशों से इस्लामी शरीअत के मुताबिक़ व्यवस्थित सिद्धांतों में परिवर्तित कर दिया। हालांकि इमाम ग़ज़ाली अपनी अधिक रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन ख़्वाजा यूसुफ़ हमदानी की विशिष्टता अधिक शिष्यों को शिक्षा-दीक्षा देना और सूफ़ी मत की स्थापना है।