Sep १०, २०१७ ०६:११ Asia/Kolkata

हमने इस बात की ओर संकेत किया था कि बहुत से लोगों ने भारतीय उपमहाद्वीप की ओर पलायन किया और एक हज़ार वर्षों तक भारत में सरकार गठन के आधार पलायनकर्ता हुआ करते थे और अधिकांश सरकारी पदों पर ग़ैर स्थानीय व पलायनकर्ता होते थे।

भारत से एतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों के कारण ईरानी पलायनकर्ताओं को दूसरे पलायनकर्ताओं की अपेक्षा विशेष स्थान प्राप्त था। आरंभ में पारसी और उसके बाद विभिन्न कालों में मुसलमान भारत गये और वहां उन्होंने अपने वजूद की छाप छोड़ी हैं। इसी प्रकार पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा कि ईरान से भारत जाने वाले सबसे अधिक पलायनकर्ताओं का संबंध उस काल से है जब मंगोलों ने ईरान पर आक्रमण किया था। उसके बाद सफ़वी दौर है जिसमें विभिन्न शायर, लेखक, कलाकार, हकीम, रहस्यवादी, धर्मगुरू और सूफी- संत भारत गये। भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम धर्म और फारसी भाषा के प्रचार- प्रसार में सबसे अधिक भूमिका रहस्यवादियों और सूफी- संतों की रही है।

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ईरानी संस्कृति व कला ईरानी पलायनकर्तों के माध्यम से भारत पहुंची और विभिन्न आयामों से उसने भारतीय संस्कृति व कला पर प्रभाव डाला। सांस्कृतिक प्रभाव के बारे में यद्यपि हमने संक्षेप में चर्चा की थी परंतु कला के क्षेत्र में भी ध्यान योग्य नमूने मौजूद हैं।

ईरानी वास्तुकला के प्रभाव भारत में काफी अधिक देखे जा सकते हैं। भारत के पाटलिपुत्र नगर में जिसे अब पटना के नाम से जाना जाता है, मौर्यवंश की जो इमारतें हैं उनमें ईरानी वास्तुकला के प्रभावों को अच्छी तरह देखा जा सकता है।

हख़ामनिशी शासन श्रंखला के समाप्त हो जाने के बाद मौर्यशासन श्रंखला की बुनियाद रखने वाले के निमंत्रण पर ईरानी कारीगर पाटलिपुत्र गये और वहां उन्होंने ईरान में प्रसिद्ध पेर्सपोलिस, आपादाना और सद सुतून नामक इमारतों की भांति राजमहलों का निर्माण किया। भारत में ईरानी वास्तुकला का आरंभ तीसरी शताब्दी ईसापूर्व हो चुका था और उसके बाद के वर्षों व शताब्दियों में जारी रहा। डॉक्टर ताराचंद का मानना है कि अशोक काल के खंभों के सिर और शिलालेख हख़ामनेशी काल की वास्तुकला के अनुसरण के नमूने हैं।

ईरानी और भारतीय वास्तुकला के मिश्रण के बारे में शहरयार नक़वी का मानना है कि मुल्तान और लाहौर शहर की मस्जिदों और कब्रों का निर्माण उस तरह से किया गया है जिस तरह से ईरान में मस्जिदों और कब्रों का निर्माण सासानी और सलजूक़ी काल में होता था। इसी प्रकार शासकों ने दिल्ली में कुतुब मीनार, मस्जिदे क़ुव्वतुल इस्लाम, आलाई दरवाज़ा और इल्तुतमिश का मक़बरा और इस जैसी दूसरी इमारतों का निर्माण करवाया। इसी प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप में शासन क्षेत्र में विस्तार के साथ बहुत सुन्दर इमारतों का निर्माण किया गया और उनमें भारतीय और ईरानी वास्तुकला का मिश्रण किया गया और “ईरानी व भारतीय वास्तुकला” नामक नई वास्तुकला की बुनियाद रखी गयी और यह वास्तुकला बाबर के काल में अपनी परिपूर्णता के शिखर पर पहुंची चुकी थी।

ईरान में टाइल की जो कला है वह भी उसी काल में भारत गयी और उसे भारतीय लोगों ने बहुत पसंद किया।

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भारत में दरवाज़ों और गुफाओं की दीवारों पर जो चित्रकारी मौजूद है वह भली-भांति इस बात की सूचक है कि चित्रकारी में भारत का लंबा अतीत रहा है। अजन्ता की गुफाओं और भारत के दक्षिण में विभिन्न मंदिरों व एतिहासिक इमारतों की दीवारों पर चित्रकारी के बेहतरीन नमूनों को देखा जा सकता है।

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि किताबों पर मिनेएचर का जो काम ईरान में होता था वह भारत में प्रचलित नहीं था और 13वीं ईसवी शताब्दी में ईरान से भारत गया। उदाहरण के तौर पर अमीर हमज़ा नाम की किताब को देखा जा सकता है। इस किताब में धोखा -धड़ी की फारसी की कहानियां हैं जो भारतीय राजाओं व शासकों को बहुत पसंद थीं और उनके आदेश से उन कहानियों को चित्रकारी का रूप दिया गया।

जिस काल में ईरानी कला ने सबसे अधिक भारतीय कला को प्रभावित किया उसका संबंध तैमूरी काल से है। सफवी काल में ईरान में दीवारों पर चित्रकारी और मीनिएचर का काम अपने शिखर पर पहुंच गया था और कमालुद्दीन बेहज़ाद के शिष्य इसे भारत ले गये।

बाबर के बेटे हुमायूं के हाथ से जब भारत की सत्ता निकल गयी तो कुछ समय तक वह तहमास्ब के दरबार में राजशाही मेहमान के रूप में था। उसने तबरीज़ नगर में दो प्रसिद्ध ईरानी चित्रकारों मीर सैयद अली तबरीज़ी और ख्वाजा अब्दुस्समद शीराज़ी से मुलाकात की और उसके बाद जब ईरानी सैनिकों की सहायता से उसने एक बार फिर भारत की सत्ता प्राप्त कर ली तो दोनों ईरानी चित्रकारों को वह अपने साथ भारत ले गया और अपनी सरकार में उन्हें विशेष स्थान दिया और चित्रकारी के काम उन्हें सौंप दिया। मीर सैयद अली तबरीज़ी और ख़ाजा अब्दुस्समद शीराज़ी ने हुमायूं के आदेश से अमीर हमज़ा की किताब को चित्रकारी का रूप दिया और दोनों ने एक दूसरे की सहायता से इस किताब से संबंधित 1400 चित्र बनाये। अमीर हमज़ा की किताब में जिस शैली की चित्रकारी की गयी विशेषकर उसके आरंभिक भाग में उसका आधार ईरान में सफवी काल में प्रचलित था और जैसे -2 किताब अपनी समाप्ति की ओर बढ़ती है चित्रकारी की यह शैली कम हो जाती है और कलाकार भारतीय चित्रकारी से प्रभावित हो जाते हैं।

शहरयार नक़वी का मानना है कि हुमायूं और सम्राट अकबर के काल में चित्रकारी की जो कला ईरान से भारत गयी थी वह स्थानीय कला के प्रभावों से अछूती नहीं रही और उसमें कुछ परिवर्तन हुए और मोगलों के नाम से भारत में नयी चित्रकारी अस्तित्व में आयी और चूंकि भारतीय वातावरण में उसका बहुत प्रभाव था इसलिए बाद में उसे हिन्दुओं ने राजस्थानी चित्रकारी का नाम दे दिया।

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भारतीय उपमहाद्वीप में ईरानी पलायनकर्ताओं संगीत पर प्रभाव भी समीक्षा योग्य है। प्राचीन समय से भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत का धार्मिक आयाम था और धीरे -धीरे उसमें विकास हुआ। जो ईरानी भारतीय उपमहाद्वीप में गये वे अपने साथ संगीत के संसाधनों को भी ले गये। भारतीयों का भी संगीत के क्षेत्र में लंबा इतिहास रहा है और वहां पर गज़लें पढ़ी जाती थीं जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के लोग पसंद करते थे और जो लोग भारतीय राजाओं के दरबारों में गज़लें पढ़ते थे वे ईरानी शैली में गज़लें पढ़ते थे और रुबात नामक वाद्यंत्र बजाते थे। इस प्रकार ईरानी संगीत और संगीत के यंत्र भारतीय शासकों के दरबार में पहुंचे और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया और धीरे- धीरे आम लोगों ने भी उसे पर ध्यान दिया यहां तक कि भारत में बड़े संगीतकार भी उससे प्रभावित हो गये।

भारतीय संगीत में जो बुनियादी परिवर्तन हुए वह अधिकतर अमीर ख़ुस्रो देहलवी के प्रयासों के परिणाम थे। अमीर खुस्रो फ़ारसी भाषा के प्रसिद्ध शायर थे। उन्हें साहित्य व कला के गुणों से सुसज्जित भारतीय उपमहाद्वीप की हस्ती समझा जाता था और वह 651 से लेकर 725 हिजरी कमरी के मध्य तक भारतीय उपमहाद्वीप में रहे। बात करने व भाषण देने में निपुण होने के अलावा यह शायर ईरानी व भारतीय दोनों संगीतों में दक्ष थे। ईरानी और भारतीय संगीतों में उनकी दक्षता इस बात का कारण बनी कि दोनों संगीत एक दूसरे में मिश्रित हो गये और परिणाम स्वरूप “हिजदह बहार” नामक नया राग अस्तित्व में आ गया।

अमीर खुस्रो तबला और सितार बनाने के अलावा टोली में कव्वाली भी पढ़ते थे इस प्रकार वह भी भारत पहुंची और उनके काल में ईरानी वाद्यंत्र सेतार सरोद उत्तर भारत पहुंचा। डाक्टर अब्दुल हक़” सहमे मुतसव्वेफ़ीन दर पिशरफ्ते उर्दू” शीर्षक के अंतर्गत अपनी किताब में सूफियों ने संगीत का जो समर्थन किया है उसके संदर्भ में लिखा है ”बहुत से सूफियों ने संगीत को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। इस प्रकार संगीत की उन्नति में उनकी भूमिका रही है यहां तक कि उनमें से कुछ संगीत में निपुणता तक पहुंच गये। मिसाल के तौर पर शैख बहाउद्दीन ज़करिया मुल्तानी और शैख बहाउद्दीन बरतावी को संगीत का दक्ष गुरू समझा जाता था। इसी प्रकार ख्वाजा नेज़ामुद्दीन औलिया इस कला में अमीर खुस्रो को प्रोत्साहित करने वाले थे और जब वह अपने इस मुरीद की मनमोहक आवाज़ सुनते थे तो खुशी से फूले नहीं समाते थे।

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दिल्ली के शासकों और मुग़ल बादशाहों ने भारतीय उपमहाद्वीप में ईरानी संस्कृति, कला विशेषकर संगीत को फैलाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। उनके दरबार ईरानी गायकों और संगीत बजाने वालों के केन्द्र हुआ करते थे। “अकबर नामा” किताब के लेखक ने 40 ईरानी संज्ञीतज्ञों की गणना दरबारी कलाकारों में की है और उनका परिचय भी कराया है। उनके अनुसार अकबर शाह के दरबार के कुछ संगीतकार तबरीज़ी थे जबकि दूसरे ईरान के विभिन्न क्षेत्रों के थे। जो भी ईरानी या भारतीय संगीतकार होते थे वे दरबारों में फारसी में पढ़ते व गाते थे और चूंकि उस समय भारत की आधिकारिक व साहित्यिक भाषा फारसी थी इसलिए हर जगह लोग उसे पसंद और उसका सम्मान करते थे।