Sep १०, २०१७ ०६:३२ Asia/Kolkata

उर्फ़ी शीराज़ी सफ़वी शासन काल के शायर हैं।

ऐसा शायर जिसे ज़िन्दगी ने इतना मौक़ा न दिया कि वह पूरी तरह अपने ख़्यालों को शायरी में ढाल सके लेकिन ज़िन्दगी की कम मुद्दत में भी उन्होंने ऐसे ऐसे शेर कहे कि बहुत से लोग उनके शेर व शायरी के श्रणी हैं। यह वह शायर हैं जिन्हें फ़ारसी शायरी में हिन्दी या इस्फ़हानी शैली के संस्थापकों में गिना जाता है।

उर्फ़ी शीराज़ी का अस्ली नाम मोहम्मद जमालुद्दीन था। वह जमालुद्दीन सय्यदी के नाम से मशहूर थे जबकि उर्फ़ी उनका उपनाम था। उर्फ़ी सोलहवीं ईसवी के शायर हैं। अपनी छोटी सी उम्र में उन्होंने बहुत ही मूल्यवान रचनाएं छोड़ी हैं। उर्फ़ी 963 हिजरी क़मरी में शीराज़ में पैदा हुए। उनके पिता का नाम ज़ैनुद्दीन अली था जो शीराज़ शहर के दरोग़ा थे। उन्होंने अपने शहर शीराज़ में साहित्य, चिकित्सा शास्त्र, तर्क शास्त्र और दर्शनशास्त्र की शिक्षा हासिल की। संगीत में भी वे बड़े संगीतकारों में गिने जाते थे। वह चित्रकारी भी जानते थे। सुलेखन में नुस्ख लीपि में अच्छा लिखते थे। 16वीं ईसवी में सफ़वी बादशाह शाह अब्बास के दौर में साहित्य व शायरी को बहुत रौनक़ हासिल थी। उर्फ़ी कम उम्र में शायरी करने लगे और शहर के शायरों के हल्क़े में शामिल हो गए। वह बहुत तेज़ी से मशहूर हुए। शीराज़ के लोग उन्हें उर्फ़ी के उपनाम से पुकारने लगे। आरिफ़ लाहीजी और क़ैदी शीराज़ी उनके समकालीन शायर हैं। कम उम्र के बावजूद उर्फ़ी शीराज़ी अपने दौर के बड़े बड़े शायरों के साथ मुशायरे में शरीक होते और उनसे डिबेट अर्थात शास्त्रार्थ करते थे। उर्फ़ी न सिर्फ़ अपने दौर बल्कि अपने बाद के दौर के लिए भी रत्न हैं, जिनके जीवन के सभी आयाम पर कला की छाप दिखाई देती है।                                       

उर्फ़ी के जीवन में कि जब उन्होंने सिर्फ़ जीवन की बीस बहारें देखी थीं, एक ऐसी घटना घटी जिसका उनके जीवन पर बहुत असर पड़ा। शीराज़ में चेचक फैल गयी थी जिसकी चपेट में उर्फ़ी भी आ गए। चेचक के कारण उनका चेहरा इतना बदसूरत हो गया कि शहर के लोग उनका सामना करने से कतराते थे। आलोचकों का मानना है कि उनके शेरों में जो अतिश्योक्ति दिखाई देती है उसके पीछे यही कारण है।

उर्फ़ी इसी हालत में छह साल तक शीराज़ में रहे और 26 साल की उम्र में सफ़वी काल की सामाजिक स्थिति के कारण दूसरे कवियों व वक्ताओं की तरह भारत चले गए। उस दौर में सफ़वी दरबार में शायरों व लेखकों की आवभगत नहीं होती थी क्योंकि शासन वर्ग में प्रशंसा का चलन न  था। इसके विपरीत भारत में शायरों व लेखकों का खुले दिल से स्वागत होता था। उन दिनों तैमूरियों का भारत में शासन था। अकबर और जहांगीर वग़ैरह फ़ारसी भाषी शायरों की बहुत आव भगत करते थे। उनका दरबार फ़ारसी शायरों के फलने फूलने के लिए उपयुक्त मंच था।

 

उर्फ़ी भारत गए और दकन के मशहूर शायर फ़ैज़ी से दोस्ती कर ली जो उस समय अकबर के दरबार के नवरत्न थे। फ़ैज़ी अकबर के दरबार में राजकवि थे। उन्होंने फ़ैज़ी को अकबर के दरबार में जगह दी और अपनी सरपरस्ती में रखा। यह भी उर्फ़ी का सौभाग्य था। क्योंकि राजकवि ही दूसरे शायरों के भाग्य का रास्ता खोलते थे। अगर राजकवि रूचि न दिखाए तो उनका काम नहीं बन सकता था। फ़ैज़ी ने उर्फ़ी का भारत में राजशाही दरबार में खुले दिल से स्वागत किया और उस दौर के मशहूर शायरों से भी परिचित कराया। लेकिन बाद में उर्फ़ी के घमंडी व्यवहार के कारण फ़ैज़ी से उनकी दोस्ती ख़त्म हो गयी। उर्फ़ी के जीवन में निराशा के कारण जो चेहरे के बदसूरत होने से पैदा हुयी थी, और वे श्रेष्टता मनोग्रन्थि का शिकार हो गए थे। वे ख़ुद को अनवरी, ख़ाक़ानी और नेज़ामी से भी बेहतर समझते थे और यही बात उस दौर के शायरों से उनकी रंजिश का सबब बनी थी।

उर्फ़ी ने अपने दौर के बड़े शायरों के साथ प्रतिस्पर्धा के कारण शायरी में बड़ी तरक़्क़ी की और बहुत से मौक़ों पर वे नंबर एक के शायरों से भी आगे निकले। यही बात दूसरे शायरों में उनसे ईर्ष्या का कारण बनी। यह ईर्ष्या इतनी ज़्यादा बढ़ गयी थी कि वृत्तांत में मिलता है कि उन्हें ज़हर देकर मारा गया।

उर्फ़ी की अचानक 999 हिजरी क़मरी में डायरिया के कारण मौत हो गयी और उन्हें लाहौर में दफ़्न किया गया लेकिन 30 साल के बाद उनके शव को लाहौर से इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ ले जाया गया और वहीं दफ़्न किया गया।                

सफ़वी काल में ग़ज़ल ने रौनक़ पकड़ी और कवियों के लिए कल्पनाओं की उड़ान भरने का मैदान खुल गया। उस समय के शायरों ने विगत के शायरों का अनुसरण करने के बजाए नई शैली को जन्म दिया जो ख़्याल व अर्थ में कोलमता, नई शब्दावली व नई विषयवस्तु की दृष्टि से पूरी तरह ताज़ा शैली थी।

यह शैली बाद में सब्के हिन्दी अर्थात भारतीय शैली या इस्फ़हानी शैली के नाम से मशहूर हुयी जिसे जन्म देने में उर्फ़ी शीराज़ी और ईरान व भारत में रहने वाले शायरों का योगदान था।

उर्फ़ी शीराज़ी ने अपनी छोटी सी उम्र में लगभग 6000 शेरों पर आधारित दीवान संकलित किया था जो उसी दौरान खो गया था जिसकी वजह से उन्हें फिर से अपना दीवान संकलित करना पड़ा जिसमें कई साल लगे और फिर यह दूसरा दीवान प्रकाशित हुआ। उर्फ़ी ने क़सीदे और ग़ज़लों के साथ साथ दो मस्वनी अर्थात दोहे कहे हैं। एक दोहा उन्होंने शीरीन ख़ुसरो के जवाब में और दूसरा दोहा ईरान के मशहूर शायर निज़ामी के मख़ज़नुल असरार दोहे के अनुप्रास पर कहा है।     

मशहूर ब्रितानी पूर्वविद एडवर्ड ब्राउन ने ईरान के साहित्य के इतिहास से संबंधित किताब में लिखा है,“उर्फ़ी हर दृष्टि से अपने दौर के सबसे लोकप्रिय व मशहूर शायर रहे हैं और उनकी गिनती दसवीं हिजरी क़मरी के 3 महाकवियों में होती है।”

उर्फ़ी शीराज़ी मोलवी और बेदिल की तरह शब्दों के इस्तेमाल में माहिर थे। वह शब्दों को जिस तरह चाहते रख कर अपनी मर्ज़ी का अर्थ निकाल लेते। पूरे दौर में शेर की सरंचना और सभी ज़बानों की शायरी में हम पाते हैं कि शेर के निर्धारित अर्थ व शब्दावली होती हैं जिनकी शायरी के मूल सिद्धांत में गिनती होती है। लेकिन उर्फ़ी की शायरी को देख कर लगता है कि उन्होंने इनमें से बहुत से सिद्धांतों को बदल दिया। उर्फ़ी के बहुत से शेर में एक संयुक्त बिन्दु दिखायी देता है और वह यह कि उन्होंने शब्द व अर्थ की प्रचलित शैली के विपरीत शायरी की है। इस शैली को ज़बान व विचार की तार्किक शैली में उथल पुथल लाने वाली कह सकते हैं। ऐसे स्थान तक पहुंचने के लिए अलग तरह की शैली व रास्ते होते हैं। इस विषय का संदर्भ गद्य व पद्य सहित आध्यात्मिक साहित्य से मिलता है। आध्यात्मिक साहित्य में अर्थ को पेश करने की एक शैली जो शायरी में भी प्रचलित है, उन अर्थों व मामलों को महत्व देना जो शायरी की नज़र से असमान्य लगते हैं। ईरान के शायर उर्फ़ी शीराज़ी इस चीज़ से परिचित थे और उन्होंने भी इस शैली को अपनी शायरी में इस्तेमाल किया है।