Sep १०, २०१७ १३:५८ Asia/Kolkata

हालिया दिनों में विश्व समुदाय, रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा के नये चरण का साक्षी रहा है।

वर्ष 2012 से कट्टरपंथी बौद्ध चरमपंथियों और सैनिकों की सांठगांठ से आरंभ होने वाली हिंसा के कारण लाखों लोग घर बार छोड़कर फ़रार होने पर मजबूर हुए जबकि सैकड़ों लोगों को अपनी क़ीमती जानों से हाथ धोना पड़ा।

 

म्यांमार में सैन्य चौकी पर अज्ञात सशस्त्र लोगों के हमले के बहाने देश के पश्चिमी प्रांत राख़ीन में रोहंग्या मुसलमानों के विरुद्ध कट्टरपंथी सैनिकों ने बौद्ध चरमपंथियों के सहयोग से व्यापक हमला अगस्त के महीने के अंत में आरंभ किया। बर्मी सैनिकों ने दावा किया कि इस हमले में नौ सैनिक मारे गये। म्यांमार की स्थिति विशेषकर राख़ीन प्रांत की स्थिति की समीक्षा करने से पता चलता है कि म्यांमार के सैनिकों ने लगभग एक सप्ताह पहले इस प्रांत में तैनात सैनिकों की सुरक्षा के बहाने इस देश के मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक हमले आरंभ किए हैं। जब म्यांमार की सरकार राख़ीन प्रांत में व्यापक स्तर पर सैनिकों को तैनात कर रही थी तभी दुनिया भर के संचार माध्यमों और राजनैतिक हल्क़ों ने सरकार के इस क़दम की ओर से सचेत किया था। यही कारण है कि कुछ समीक्षक सैन्य चौकी पर अज्ञात लोगों के हमले पर आधारित बर्मी सैनिकों के दावे को रद्द नहीं करते क्योंकि संभव है कि यह हमला, नये चरण के हमले आरंभ करने के लिए बहाने के तौर पर पूर्व नियोजित ढंग से किया गया हो। राजनैतिक हल्क़ों का यह मानना है कि म्यांमार के कट्टरपंथी सैनिकों ने संभव है कि रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध रक्तरंजित हिंसा का नया चरण आरंभ करने के लिए पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत यह कार्यवही अंजाम दी हो।

 

ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया विभाग के प्रमुख फ़िल राबर्टसन इस संबंध में कहते हैं कि राख़ीन प्रांत में तबाह घरों के खंडहरों और घरों को जलाने की सैटेलाइट द्वारा ली गयी तस्वीरें प्राप्त हुई है, म्यांमार सरकार को चाहिए कि वह स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को वहां जाने की अनुमति दे ताकि उन रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति स्पष्ट हो सके जो सैनिकों की हिंसा की वजह से बांग्लादेश भाग गये हैं।

 

राख़ीन प्रांत को अतीत में अराकान कहा जाता था जो रोहिंग्या मुसलमानों के पूर्वजों की धरती थी, रोहिंग्या मुसलमान एक हज़ार वर्ष पहले इस धरती पर रहते थे और लगभग तीन सौ वर्ष तक उनकी शाही व्यवस्था भी थी इस आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को बंगाली पलायनकर्ता कहना ग़लत है और इसका लक्ष्य लोगों को दिगभ्रमित करने के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन और भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश बनने से पहले तक, क्षेत्र के लोगों के अन्य क्षेत्रों के लोगों के साथ संपर्क थे और यह रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता के अधिकार से वंचित करने के लिए म्यांमार सरकार के इनकार का बहाना नहीं बन सकता।

 

वास्तविकता यह है कि राख़ीन प्रांत, म्यांमार प्रांत के हरियाले और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्रों में से है, यहां दूर दूर तक हरे भरे खेत, बाग़, नदी और व्यापारिक केन्द्र मौजूद हैं। क्षेत्र में अधिक संख्या में होने के कारण रोहिंग्या क्षेत्र की अर्थव्यस्था मुसलमानों के हाथों में है। यह चीज़ उन सैनिकों को एक आंख न भाती थी जो साठ के दशक में म्यांमार की सत्ता पर क़ब्ज़ा करने में सफल हुए थे। यही कारण है कि इन सैनिकों के हाथों इन मुसलमानों को अपनी मातृ भूमि से निकालने के लिए परेशान किए जाने का क्रम आरंभ हुआ और म्यांमार की सैन्य सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध अपने अपराधों का औचित्य पेश करने के लिए उनको नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया। रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध म्यांमार के सैनिकों के भीषण हमले पर दुनिया भर से आपत्ति जताए जाने के बाद सैनिकों ने उस समय तो हमले रोक दिए किन्तु वह उचित अवसर की तलाश में थे।

 

म्यांमार के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेषज्ञ विजय नामबियार कहते हैं कि रोहिंग्या मुसलमान अपने मूल अधिकारों अर्थात उस धरती और उस सरकार से वंचित है जो उसका समर्थन करे, इसके अतिरिक्त यह लोग प्रतिदिन हिंसक व्यवहार, जनंसहार और अमानवीय बर्ताव का सामना कर रहे हैं, इनमें से कुछ तो अपना घर बार छोड़कर विस्थापन का जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो गये हैं।

 

वर्ष 2012 में कट्टरपंथी बौद्ध भिक्षु आरशीन वीराटो के नेतृत्व में कट्टरपंथी सैनिकों और चरमपंथी बौद्धों के बीच होने वाली सांठगांठ के कारण रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा ने सांप्रदायिक रूप धारण कर लिया क्यों कि इस कट्टरपंथी बौद्ध भिक्षु ने मुसलमानों पर म्यांमार पर क़ब्ज़ा करने और म्यांमार को एक मुस्लिम देश बनाने का आरोप लगाते हुए मुसलमानों के विरुद्ध ज़हर के बीज बोना आरंभ कर दिए और उसने 969 नामक आतंकी गुट का गठन करके मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा का बाज़ार गर्म कर दिया। यहां पर यह बात ध्यान योग्य है कि बर्मा में राजनैतिक पार्टियों को आरशीन वीराटो और उसके जनाधार की आवश्यकता है इसीलिए वह इस गुट के अपराधों पर चुप्पी साधे बैठे रहे। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने रोहिंग्या मुसलमानों को दुनिया का सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंखक क़रार दिया है।

 

म्यांमार के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत यांग ही ली का कहना है कि म्यांमार की सेना ने मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक हिंसा की और उनके विरुद्ध पाश्विकता का प्रदर्शन किया। यह पाश्विकता इतनी अधिक है जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, म्यांमार के सैनिकों ने रोहिंग्या मुस्लिम महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया, महिलाओं और पुरुषों की गर्दनें काट दी और रोहिंग्या मुसलमानों के जलते घरों में उनके बच्चे डाल दिए।

 

मानवाधिकार के तथाकथित पश्चिमी दावेदारों के मौन ने बौद्ध चरमपंथियों और म्यांमार के सैनिकों को अपने अपराध जारी रखने में अधिक दुस्साहसी बना दिया है। म्यांमार के विरुद्ध पश्चिमी देशों के प्रतिबंध समाप्त होने और आर्थिक सुधार के बाद, अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों ने म्यांमार में पूंजीनिवेश के लिए म्यांमार की सरकार के साथ आर्थिक समझौते के लिए बहुत तेज़ी दिखाई और इस बीच प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल राख़ीन प्रांत पर पश्चिम की नज़रें गड़ गयीं। यही कारण है कि पश्चिमी सरकारें इस बात से चिंतित हैं कि यदि उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध बौद्ध चरमपंथियों और कट्टरपंथी सैनिकों के अपराधों पर ज़बान खोली को म्यांमार की सरकार अरबों के समझौते को रोक देगी। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी म्यांमार का दौरा किया जिससे पता चलता है कि पश्चिम की नज़र में म्यांमार की क्या हैसियत है।

 

रोहिंग्या यूरोपीय परिषद की सदस्य एनिटा शोग विश्व समुदाय के मौन की आलोचना करते हुए कहती हैं कि यह संकट, बहुत जटिल संकट है और विश्व समुदाय के विध्वंसक मौन के कारण दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है। हमारा मानना है कि यह अपराध, जनसंहार और जातीय सफ़ाए से भी बदतर है।

 

क्षेत्रीय देश भी रोहिंग्या मुसलमानों के विस्थापन और दूसरे पड़ोसी देशों की ओर उनके पलायन से चिंतित हैं। बांग्लादेश, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और चीन ने इन पलायनकर्ताओं को स्वीकार किया है और इन देशों का मानना है कि इससे सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के अतिरिक्त सुरक्षा समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। यहां पर एक बात उल्लेखनीय है कि दक्षिणपूर्वी एशिया के मुसलमानों की संवेदनशीलता और क्षेत्रीय सरकारों पर उनके दृष्टिकोणों के प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती।

 

बहरहाल इस बात में कोई शंका नहीं है कि म्यांमार के संकट का राजनैतिक समाधान नहीं है और रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध म्यांमार सरकार यदि हिंसक कार्यवाहियां जारी रखेगी तो इसका परिणाम उसे भुगतना ही पड़ेगा। पहला यह कि क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस देश की छवि ख़राब होगी। इस बात के दृष्टिगत कि म्यांमार सरकार ने व्यापक स्तर पर सामाजिक व आर्थिक सुधार प्रक्रिया आरंभ की है और इसके क्रियान्वयन के लिए उसे विदेशी पूंजीनिवेश की आवश्यकता होगी तथा म्यांमार के मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक कार्यवाहियों के बढ़ने से देश की सामाजिक और सुरक्षा स्थिति के प्रति पूंजीनिवेशकों का विश्वास ख़त्म हो जाएगा।

 

दूसरा यह कि राख़ीन प्रांत के घरों को जलाने और वहां से मूल निवासियों को निकालने के कारण बौद्ध चरमपंथियों और सैनिकों के इन ज़मीनों पर क़ब्ज़े के लिए हालात सही नहीं होंगे बल्कि इससे क्षेत्र में संकट और अधिक गहरा जाएगा जिसके कारण म्यांमार की सरकार को राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए ख़तरे का सामना करना पड़ेगा और उसे बहुत अधिक नुक़सान उठाना पड़ेगा।

 

तीसरा यह कि रक्तिरंजित हिंसा के जारी रहने के कारण प्रतिरोध की भावना पैदा होगी। रोहिंग्या मुसलमान केवल नागरिकता का अधिकार चाहते हैं ताकि वे समाज के अन्य अधिकारों से लाभ उठा सकें और यह विषय वार्ता द्वारा भी हल हो सकता है किन्तु रोहिंग्या मुसलमानों के पलायनकर्ता होने के बहाने कट्टरपंथी सैनिकों और बौद्ध चरमपंथियों के हिंसक व्यवहार से न केवल यह कि समस्या के समाधान में सहायता नहीं मिलेगी बल्कि संभव है कि ऐसे हालात पैदा हो जाएं कि ज़ोरज़बरदस्ती करने वालों से मुक़ाबले के लिए प्रतिरोध का मोर्चा खुल जाए।

 

 

संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव कूफ़ी अन्नान के नेतृत्व में बने राख़ानी प्रांत के परामर्श आयोग का कहना है कि हिंसा और सैनिकों की तैनाती से रोहिंग्या मुसलमानों के सामने पैदा होने वाले संकट को हल नहीं किया जा सकता। यदि म्यांमार की सरकार 1.1 मिलियन जनसंख्या के लिए सही रणनीति नहीं बना सकती तो इस जाति के सशस्त्र गुटों में शामिल होने का ख़तरा बढ़ जाएगा।

 

बहरहाल इस बात की भी संभावना है कि कुछ कट्टरपंथी और ग़ुडे , रोहिंग्या मुसलमानों की निर्धनता और उनकी आर्थिक समस्याओं से लाभ उठाकर उनका इस्तेमाल करें। हालात जैसे भी हों इन सबकी ज़िम्मेदार म्यांमार की सरकार है जिसने रोहिंग्या मुसलमानों के जनसंहार पर आखें मूंद ली जिसके कारण कट्टरपंथी सैनिक और बौद्ध चरमपंथी खुलकर अपने अपराध जारी रखे हुए हैं।