Sep २३, २०१७ १३:३१ Asia/Kolkata

वर्तमान समय में बहुत से राष्ट्रों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना है। 

इन समस्याओं में से एक नस्लभेद की समस्या है।  यह एसी समस्या है जिसका संबन्ध प्राचीन काल से है।  विश्व शताब्दियों से नस्लभेद जैसी समस्या से जूझ रहा है।  नस्लभेद को सदैव से ही मानवाधिकारों के हननकर्ता के रूप में देखा गया है।  इस सामाजिक अभिषाप के कारण दुनिया के बहुत से राष्ट्रों में दंगे, फसाद और युद्ध हुए हैं।  कई देशों में लंबे समय तक यह, अशांति का कारण रहा है।  सन 1948 में पहली बार नस्लभेद के विरुद्ध आधिकारिक रूप में कुछ किया गया था।  संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1948 में पहला मानवाधिकार घोषणापत्र जारी किया था।  इसमें जातपात की वरिष्ठता को नकारते हुए सब लोगों के लिए समान अधिकार की बात कही गई है।  राष्ट्रसंघ के अन्य कई कन्वेंशनों में भी सब लोगों के लिए समान अधिकार की बात कही गई है।  संयुक्त राष्ट्रसंघ ने नस्लभेद की खुलकर भर्त्सना की है।

राष्ट्रसंघ के अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के अनुसार जाति, धर्म, भौगोलिक क्षेत्र या किसी अन्य कारण से किसी को विशिष्टता प्राप्त नहीं है बल्कि संसार के सारे लोगे समान अधिकार के स्वामी हैं।  इस कन्वेंशन के दूसरे अनुच्छेद में प्रत्येक सदस्य देश को बाध्य किया गया है कि वह नस्लभेद की निंदा करे।  सदस्य देशों से यह भी मांग की गई है कि वह नस्लभेद का किसी भी रूप में समर्थन न करे।

इस अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशन के अनुसार संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य देश इस बात के लिए कटिबद्ध हैं कि वे न केवल यह कि नस्लभेद का समर्थन न करें बल्कि उसपर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाएं।  उनको चाहिए कि वे ऐसे क़ानून बनाएं जिनमें व्यक्तिगत या सामूहिक रूप में नस्लभेद से रोका गया हो।  इससे यह बात समझ में आती है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नस्लभेद की कड़े शब्दों में निंदा के साथ ही इसे रोकने और इसके फैलाव पर रोक लगाने के प्रयास किये गए हैं।  

बड़े अफसोस की बात है कि राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नस्लवाद के विरोध के बावजूद आज भी विश्व के बहुत से राष्ट्रों में यह बुराई देखी जा रही है।  इन देशों में रंग, नस्ल, धर्म या राष्ट्रीयता को लेकर कुछ लोग स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ समझते हैं जिसका दुष्परिणाम आज भी बहुत से लोग भुगत रहे हैं।  तीसरी दुनिया के देशों की तो बात छोड़िए औद्योगिक देशों में आज भी नस्लभेद की चिंगारी सुलग रही है।  इन प्रगतिशील देशों में बहुत से स्थानों पर गोपनीय ढंग से तो कुछ स्थानों पर खुल्लमखुल्ला नस्लभेद पाया जाता है।  इस विचारधारा के अनुसार गोरी चमड़ी वाले काली चमड़ी वालों को गिरी नज़रों से देखते हैं और उनको वे अपने बराबर का नहीं समझते।

इसकी बहुत सी मिसालें आपको पश्चिमी देशों में अब भी मिल जाएंगी। यूरोप में नार्वे से लेकर यूनान तक नस्लवाद की एक लहर स्पष्ट रूप में दिखाई देती है।  फ्रांस जैसे देश में, जिसे लोकतंत्र और आज़ादी के गढ़ के रूप में देखा जाता है, पिछले दो दशकों से नस्लभेद का ज़ोर बढ़ रहा है।  वहां पर हालिया दिनों में कई स्थानों पर नस्लवादी कार्यवाहियां की जा चुकी हैं।  अमरीका जैसे देश में, जो मानवाधिकारों के समर्थन का दावा करते नहीं थकता, आए दिन नस्लवादी घटनाएं घटती रहती हैं।

बहुत से जानकारों का कहना है कि विश्व के बहुत से क्षेत्रों में नस्लवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं।  कुछ देशों में तो नस्लवाद, वहां की व्यवस्था में घुस चुका है।  इस प्रकार कहा जा सकता है कि कुछ देशों की पुलिस, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थय सेवा और राजनीति में नस्लवाद पूरी तरह से अपना घर बना चुका है।  अब यह किसी देश के छोटेमोटे अधिकारी नहीं बल्कि कुछ देशों में उच्च पदों पर आसीन लोगों के व्यवहार और उनके संबोधन से भी ज़ाहिर होने लगा है।  उदाहरण स्वरूप इसका स्पष्ट उदाहरण अमरीका के वर्जीनिया में घटने वाली नस्लवादी घटना के बारे में इस देश के राष्ट्रपति का दृष्टिकोण है।  यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि यह कोई पहली बार नहीं है कि अमरीकी सरकार ने ऐसा किया है और वहां के हालात से लगता है कि यह कोई अन्तिम घटना भी नहीं है।    

समाचारों से हमें यह बात स्पष्ट रूप में समझ में आती है कि आजादी और मानवाधिकारों के समर्थन का दावा करने वाले देश अमरीका में आए दिन अश्वेतों या अल्पसंख्यकों पर हमले होते रहते हैं।  हालिया कुछ महीनों के दौरान इन हमलों में तेज़ी से वृद्धि हुई है जिनमें अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया गया है।

इस बारे में ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि अभी उस में ही नस्लवाद की समस्या का समाधान नहीं हो सका है जो आज़ादी और मानविधकारों का दावा करती है।  वहां पर अभी भी लोग इसलिए मारे जाते हैं क्योंकि वे काले रंग के हैं।  उस देश में पुलिस, काले होने के आरोप में कभी-कभी इतनी पिटाई करती है कि लोग मर जाते हैं।  यह है वह देश जो आज़ादी का दावेदार है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है।  “बोस्टन रिव्यू” के नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीका में रहने वाले काले लोगों को नौकरियां ढूंढने में सदैव समस्याओं का सामना रहता है।  अमरीका में लोगों को नौकरी देने में नस्लवाद का अनुसरण एक सामान्य सी बात है अर्थात गोरे को काले पर वरीयता प्राप्त है।  वहां पर काले लोगों में बेरोज़गारी की दर 14 प्रतिशत से अधिक है।  इसके अतिरिक्त बहुत से अध्धयनों से यह पता चला है कि संयुक्त राज्य अमरीका के कार्यस्थलों में नस्लवाद बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है।  इसका अर्थ यह है कि रोज़गार में गोरे लोगों को वरीयता दी जा रही है जिसके कारण नौकरियों में काले लोगों का अनुपात घट रहा है।  यही कारण है कि गोरे परिवारों की तुलना में काले परिवारों की आय घटती जा रही है।  अमरीका में रहने वाले अफ़्रीकी मूल के बीस लाख से अधिक लोग, मताधिकार जैसे मौलिक अधिकार से पूरी तरह से संपन्न नहीं है।

अमरीकी अधिकारियों की ओर से खुले तौर पर मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन के बावजूद अमरीकी अधिकारी जब चाहते हैं दूसरों पर मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन का आरोप लगा देते हैं।  उदाहरण के लिए अमरीका के विदेशमंत्री रेक्स टेलरसन ने हाल ही में वाशिग्टन में ईरान पर अल्पसंख्यकों के हनन का आरोप लगाया है।  अमरीकी विदेशमंत्री का दावा है कि ईरान में अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाता है।

अमरीका की ओर से ईरान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनने का आरोप ऐसी स्थिति में लगाया जा रहा है कि जब ईरान के संविधान में समानता की बात कही गई है और रंग, जाति, धर्म या अन्य चीज़ों को अनदेखा करते हुए मानव के बीच समानता की बात कही गई है।  इसमें नस्लवाद को पूरी तरह से नकारा गया है।