Oct ३१, २०१७ १३:१२ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि मुहम्मद जमालुद्दीन उर्फ़ी, दसवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के विख्यात ईरानी साहित्यकार थे। 

सन 963 हिजरी क़मरी में शीराज़ में उनका जन्म हुआ था।  उर्फ़ी के पिता शीराज़ में उच्च पद पर आसीन थे।  उर्फ़ी ने शीराज़ में ही दक्ष गुरूओं से साहित्य, चिकित्सा, तर्कशास्त्र और चित्रकारिता जैसे ज्ञान और कलाएं सीखीं।  कहा जाता है कि उर्फ़ी को तत्कालीन प्रचलित ज्ञानों की गहरी जानकारी थी।  उन्होंने बचपन से ही शायरी शुरू कर दी और बहुत जल्द ही इस क्षेत्र में ख्याति पाई।  उर्फ़ी शीराज़ी 26 वर्ष की आयु में भारत चले गए।  उनके बारे में कहा जाता है कि वे समुद्री मार्ग से गुजरात होते हुए फतेहपुर सीकरी पहुंचे थे।  भारत में उन्हें सम्राट अकबर के दरबार में जगह मिली और बाद में दरबार में उनकी गणना प्रथम पक्ति के कवियों में होने लगी।  36 वर्ष की आयु में सन 999 हिजरी क़मरी में उर्फ़ी शीराज़ी का निधन हो गया।  बताया जाता है कि पहले उन्हें लाहौर में दफ़्न किया गया और तीस साल के बाद उनके शव को इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ ले जाया गया।

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फ़ारसी साहित्य के बहुत से आलोचकों और विशेषज्ञों का कहना है कि वे दसवीं शताब्दी में क़सीदे के गुरू थे।  उर्फ़ी के हज़ारों शेरों का काव्य संकलन मौजूद है।  उनके इन शेरों का अध्ययन करने वाले आलोचकों का कहना है कि उर्फ़ी वास्तव में फ़ार्सी पध में सब्के हिंदी अर्थात हिंदी शैली के जाने माने कवि थे।  12वीं शताब्दी हिजरी क़मरी के एक कवि वालेहे दाग़िस्तानी के अनुसार उर्फ़ी शीराज़ी की शायरी की शैली, उनके काल में और उनके जीवन के बाद भी काफ़ी मश्हूर हुई।   

उर्फ़ी शीराज़ी स्वयं को फ़ारसी साहित्य में क़सीदे कहने वाले महान कवि ख़ाक़ानी की शैली का अनुयाई मानते थे।  वे छठी शताब्दी हिजरी क़मरी के प्रसिद्ध कवि थे।  समकालीन शोधकर्ता, इतिहासकार और लेखक उस्ताद ज़बीहुल्लाह सफ़ा का मानना है कि उर्फ़ी को क़सीदे कहने में जो ख्याति मिली उसके कुछ कारण हैं।  पहली बात तो यह है कि उर्फ़ी की नज़र अपने से पूर्व काल के क़सीदे के कवियों के संकलनों पर थी।  दूसरी बात यह है कि उनके भीतर कविता कहने की कला छिपी हुई थी जिसका उन्होंने बड़ी दक्षता से प्रयोग किया।  तीसरा कारण यह है कि उर्फ़ी बहुत ही सुन्दर ढंग से नए-नए विचारों को कविता में लाते थे।  यही कारण है कि उनकी कविता में अनोखापन पाया जाता है।

अपने अल्पकालीन जीवन में उर्फ़ी ने दसवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के विख्यात कवि बाबा फ़ोग़ानी शीराज़ी के शेरों को “सब्के हिंदी” में ढाला।  बाबा फ़ोग़ानी शीराज़ी के बारे में कहा जाता है कि वे भावनात्मक और क्रांतिकारी शेर कहते थे।  ज़बीहुल्लाह सफ़ा के अनुसार बाबा फ़ोग़ानी शीराज़ी के काल में ही उनके शेरों के बारे में दो तरह के विचार पाए जाते थे।  एक गुट तो उनकी काव्य शैली को पसंद करता था और उसने उन्हें “छोटे हाफ़िज़” की उपाधि दी थी।  उनके विरोधी बाबा फ़ोग़ानी के शेरों का मज़ाक़ उड़ाते और जो शेर भी उन्हें बुरा लगता या पसंद नहीं आता उसको वे फ़ोग़ानिया कहा करते थे। एक समकालीन काव्य आलोचक डाक्टर सीरूस शमीसा के अनुसार उर्फ़ी शीराज़ी के शेर वास्तव में सादी शीराज़ी, हाफ़िज़ शीराज़ी, बाबा फ़ोग़ानी शीराज़ी और कुछ अन्य जाने माने विख्यात कवियों के विचारों का संग्रह है जो आगे चलकर फ़ार्सी पध की एक शैली, सब्के हिंदी के रूप में सामने आई।  पध शैली ने तालिब आमोली, हज़ीन लाहीजी और साएब तबरीज़ी जैसे कवियों को बहुत प्रभावित किया।  

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फ़ारसी की ग़ज़ल वास्वत में व्यक्ति की भावनाओं, परिस्थितियों, विचारों और मन की बात की अभिव्यक्ति का माध्यम है।  ग़ज़ल के माध्यम से वर्तमान परिस्थितियों को भी प्रस्तुत किया जाता है।  ग़ज़ल के माध्यम से कवि सामान्यतः अपनी कला को दर्शाने के प्रयास करता है।  उर्फ़ी शीराज़ी के काव्य संकलन के अध्ययन से पता चलता है कि उनके शेर, उनकी विचारधारा को प्रदर्शित करते हैं।  शम्स लंगरूदी का कहना है कि उर्फ़ी शीराज़ी ने वैसे तो अधिकतर उन्हीं विषयों को पेश किया है जिन्हें उनसे पहले वाले कवियों ने पेश किया किंतु उनका पेश करने का अंदाज़ कुछ अलग है।  उर्फ़ी शीराज़ी ने बाबा फ़ोग़ानी की शैली को भी आगे बढ़ाया लेकिन उन्होंने अधिक्तर सब्के हिंदी पर ही काम किया जो आगे चलकर परिपूर्ण हुई।  उर्फ़ी शीराज़ी की कविता की एक विशेषता यह रही कि वे लोगों में अधिक पढ़े और सुने गए जिसके कारण उनको अधिक ख्याति प्राप्त हुई।

तालिब आमोली, शेख बहाई, नज़ीरी नीशापुरी, साएब तबरीज़ी, ज़हूरी और हज़ीन लाहीजी जैसे लोग, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उर्फ़ी शीराज़ी की रचनाओं से अवगत रहे हैं।  शैख़ बहाई जैसे महान धर्मगुरू ने कशकोल नामक अपने संकलन में उर्फ़ी शीराज़ी के कुछ शेरों को नक़ल किया है।

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नज़ीर नीशापुरी उन कवियों में से हैं जो उर्फ़ी शीराज़ी के सब्के हिंदी के समर्थक रहे हैं।  नज़ीर नीशापुरी, उर्फ़ी शीराज़ी के समकालीन रहे हैं और इन दोनो कवियों के बीच कहीं-कहीं पर शास्त्रार्थ भी हुआ है लेकिन वे सब्के हिंदी के समर्थनकर्ता हैं।

साएब तबरीज़ी

 

फ़ारसी भाषा की पध शैली की एक शाखा सब्के हिंदी के एक और कवि हैं साएब तबरीज़ी।  उन्होंने यह बात स्वीकार की है कि मुझे उर्फ़ी के काव्य ने प्रभावित किया है।  साएब तबरीज़ी का कहना है कि उर्फ़ी की कविता, लोगों के मन में इसलिए घर कर जाती थी क्योंकि वे आम लोगों के दर्द को बयान करते थे।