Oct ३१, २०१७ १३:३० Asia/Kolkata

हमने आपको बताया कि उर्फ़ी शीराज़ी सफ़वी शासन काल के मशहूर शायरों में हैं।

ऐसा शायर जिसकी उम्र ने उससे वफ़ा न की कि वह अपनी कल्पनाओं को पूरी तरह शेर के रूप में ढाल सके लेकिन उन्होंने कम उम्र में ही ऐसे ऐसे शेर कहे कि बहुत से शायर उनके ऋणी हैं। उन्हे फ़ारसी शायरी में भारतीय शैली के संस्थापकों में गिना जाता है।

हमने यह बताया कि उर्फ़ी शीराज़ी का नाम मोहम्मद जमालुद्दीन था। वह दसवीं हिजरी क़मरी बराबर सोलहवीं ईसवी के महान शायरों में हैं। उनका जन्म 963 हिजरी क़मरी में ईरान के शीराज़ शहर में हुआ। उन्होंने शीराज़ में साहित्य, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, चित्रकारी और सुलेखन के बड़े बड़े उस्तादों से इन विषयों की शिक्षा हासिल की। वह कम उम्र में शायरी करने लगे थे और बहुत जल्द अपने समय के मशहूर शायरों में गिने जाने लगे। अभी उनकी उम्र 26 साल थी कि उन्होंने भारत पलायन किया और सम्राट अकबर के नेरत्नों में से एक फ़ैज़ी दकनी के ज़रिए वह अकबर के दरबार में पहुंचे। उन्होंने अकबर के दरबार में बहुत नाम कमाया और पहले दर्जे के शायरों में उनकी गणना होने लगी। उन्होंने ज़िन्दगी की सिर्फ़ 36 बहारें देखी थीं कि उनका देहान्त हो गया। पहले उन्हें लाहौर में दफ़्न किया गया और फिर तीस साल बाद उनके शव को इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ पहुंचा दिया गया।

उर्फ़ी भारत में फ़ारसी शायरी के महाकवियों में से एक हैं। उनका प्रभाव न सिर्फ़ सफ़वी दौर में भारतीय शैली के फ़ारसी शायरों पर पड़ा बल्कि बाद के शायरों पर भी उनका असर पड़ा। बाद के जिन मशहूर शायरों पर उर्फ़ी की शायरी का प्रभाव नज़र आता है उनमें मिर्ज़ा ग़ालिब और अल्लामा इक़बाल हैं। दूसरे शायरों की तुलना में मिर्ज़ा ग़ालिब की फ़ारसी शायरी पर उर्फ़ी का सबसे ज़्यादा प्रभाव नज़र आता है। बल्कि यह कहा जा सकता है कि ग़ालिब के फ़ारसी शेर उर्फ़ी के शेर से सबसे ज़्यादा मिलते जुलते हैं। ख़ुद मिर्ज़ा ग़ालिब ने इस बात को स्वीकार किया है। ग़ालिब और उर्फ़ी के शेर न सिर्फ़ ज़ाहिरी तौर पर बल्कि अर्थ व विचार की दृष्टि से भी बहुत एक दूसरे मिलते जुलते हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब के अलावा अल्लामा इक़बाल भी उन शायरों में हैं जिनकी शायरी पर उर्फ़ी की छाप नज़र आती है। उर्फ़ी शीराज़ी के व्यक्तित्व के जिस आयाम ने इक़बाल के विचार पर असर डाला है वह उर्फ़ी की सांसारिक मोहमाया से दूरी और उनमें मौजूद उमंग है। इक़बाल उर्फ़ी की इस भावना से इतना प्रभावित थे कि इस दृष्टि से वह उर्फ़ी को हाफ़िज़ से बेहतर मानते थे।                     

फ़ारसी साहित्य व भाषा के उस्ताद डॉक्टर महमूद फ़ुतूही ने अपनी किताब “हिन्दी शैली के वैश्विक नज़रिये की समीक्षा” में कहते हैं, “कुछ  लोगों का यह मानना है कि हिन्दी शैली के शेर में न तो कोई ऐसा नया वैश्विक नज़रिया दिखाई देता जो सामूहिक तत्वों की देन हो और न ही विचार मंच पर कोई गहरा अनुभव। यही वजह है कि इस शैली के शेर में एक सीमित व आशिंक दुनिया दिखाई देती है जो पंक्तियों में सिमट जाती है। इस दौर का शायर दुख में डूबा हुआ इंसान लगता है। जो अख़्तियार और मजबूरी के बीच में घूम रहा है। आशा और निराशा के बीच हाथ पांव मार रहा है। कभी उड़ान भरता है तो कभी अक्षमता का रोना रोता है।”

यह दृष्टिकोण उर्फ़ी शीराज़ी की शायरी के बारे में बहुत हद तक सही नज़र आता है। उर्फ़ी का वैश्विक नज़रिया आध्यात्म जैसा है। यह नज़रिया उनके एक एक शेर में दिखाई देता है। इसी आध्यात्मिक नज़रिये की वजह से उर्फ़ी के शेरों में इश्क़, कृपा, नमाज़, दुआ, मन, पवित्र आत्मा और फ़रिश्ते जैसे शब्द बहुत ज़्यादा मिलते हैं।

उर्फ़ी शीराज़ी की प्रवृत्ति क़लन्दरों जैसी है। इस शैली की विशेषता यह है कि इसमें धर्म के प्रचलित संस्कारों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते। डॉक्टर ज़ियाउद्दीन सज्जादी का मानना है, “उर्फ़ी के दौर में भारत में कलन्दरियों का बहुत चर्चा था। सच तो यह है कि इस मत की उत्पत्ति का स्थान भारत में ढूंढना चाहिए। अपने मन को फटकार लगाना, ग़रीबी और अविवाहित जीवन व अभ्यास इस मत की विशेषता रही है। वे अपने बारे में लोगों की फटकार को पसंद करते और अपने भले कर्म व उपासना को प्रकट नहीं करते थे कि कहीं पाखंड का शिकार न हो जाएं। उर्फ़ी में क़लन्दरों जैसा रुझान पाया जाता था और बहुत से शेरों में इसी बात को उन्होंने क़ुबूल किया है।”

दूसरी ओर उर्फ़ी के दौर की सामाजिक स्थिति और दिल्ली के राजदरबार के माहौल पर ध्यान देने की ज़रूरत है। शरीयत पर कम ध्यान देना उनके दौर के राजनैतिक माहौल की देन थी। वह सम्राट अकबर के दौर में थे और अकबर बादशाह ने इस्लामी संस्कारों पर रोक लगा दी थी ताकि दूसरे धर्मों के लिए रास्ता खुले। इस रास्ते पर वह इतना आगे निकल गए कि अकबर ने ख़ुद भी एक नया धर्म बनाया जिसे वह “दीने इलाही” कहते थे। अकबर ने इस धर्म के लिए एक प्रकार का प्रतिज्ञापत्र तय्यार किया था कि जो भी इस धर्म को स्वीकार करता उस पर इसके प्रतिज्ञापत्र के अनुसार चलना अनिवार्य हो जाता।

यह सही है कि उर्फ़ी ने कुछ शेर बादशाह अकबर की प्रशंसा में कहे लेकिन यह अकबर के विचारों को स्वीकार करने के अर्थ में नहीं है। उर्फ़ी शीराज़ी के शेर से इस्लाम के प्रति उनका समर्पण स्पष्ट है। उर्फ़ी के विचारे शिया मत की ओर उनके भीतरी रुझान को दर्शाते हैं। शायद वह शरीअत के आदेशों का इतना पालन न करते हों लेकिन उनके भीतर जो रुझान है वह आत्मज्ञान से बहुत मिलता जुलता है। उन्होंने जो क़सीदे या स्तोत्र पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों की प्रशंसा में कहे हैं वह ख़ुद इस विषय पर एक तरह का गवाह है। उन्होंने एक स्तोत्र हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शान में कहा है जो “तर्जुमे शौक़” के नाम से मशहूर है इसमें 224 छंद हैं। यह स्तोत्र या क़सीदा ज़बान, वाक्पटुता, अर्थ, रचनात्मकता की दृष्टि से फ़ारसी साहित्य के इतिहास के सबसे अच्छे स्तोत्र में से एक है। इस क़सीदे से पता चलता है कि उर्फ़ी को हज़रत अली से कितनी गहरी श्रद्धा थी।          

उर्फ़ी की ग़ज़लों में भी बहुत ज़्यादा निराशा और दुख की छाया नज़र आती है। अलबत्ता तक़रीबन हिन्दी शैली के सभी फ़ारसी शायरों में यह बात दिखाई देती है। इस दृष्टि से हिन्दी शैली की फ़ारसी शायरी योरोप की रोमांटिक शायरी से बहुत मितली जुलती है। इश्क़िया शेर भी नाकामी,  दुख और तकलीफ़ के अर्थ से भरे हुए हैं। इस समानता का कारण इन दोनों गुटों के शायरों के जीवन में समानता है। इन दोनों गुट के शायर वाणिज्यिक व केन्द्रित शहरी समाज के पहले दौर में पैदा हुए हैं और इनमें व्यक्तिवादी रूझान पाया जाता है। उर्फ़ी शीराज़ी के दीवान की पहली ग़ज़ल से दुख के चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। शायर ख़ुद से संतुष्ट नहीं है और ख़ुद को बहुत मूल्यवान समझता है और ख़ुद के मूल्यवान होने को ही ख़ुद के लिए हानिकारक समझता है।

उर्फ़ी की ग़ज़ल का अहम हिस्सा इश्क़ के ग़म के बारे में है। चूंकि उनका यह मानना है कि दुखी मन में ही मोहब्बत और वफ़ा होती है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में दुख से बने संयुक्त शब्द का इस्तेमाल किया है। ऐसा लगता हे कि उनका दुख ख़त्म होने वाला नहीं है। वह इस तरह इस दुख में डूबे हुए हैं कि वह जिस पिंजड़े में क़ैद हैं उससे राज़ी हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। उनकी नज़र में तिनका फूल से बेहतर है।

उर्फ़ी एक पढ़े लिखे व्यक्ति थे। उनका अध्ययन बहुत व्यापक था। उन्होंने बौद्धिक ज्ञानों का बहुत अध्ययन किया था। उनके दौर में वैचारिक आज़ादी पर रोक न थी बल्कि यही प्रचलित था। इस दौर के शायरों के शेर में जगह जगह दर्शनशास्त्र की छाप नज़र आती है और शिब्ली नोमानी के शब्दों में उर्फ़ी ने सबसे ज़्यादा दार्शनिक विचार पेश किए हैं।

उर्फ़ी को एक ओर दर्शनशास्त्र में रूचि है तो दूसरी ओर वह इसे अंतिम बात नहीं मानते। उनका कहना है दार्शनिकों की बातों का सार आम संस्कृति और मसल में मौजूद है।

उर्फ़ी की नज़र में दर्शनशास्त्र बुद्धि को संतुष्ट कर सकता है लेकिन मन को संतुष्ट व प्रसन्न नहीं कर सकता।