उर्फ़ी शीराज़ी- 4
हमने आपको सफ़वी काल के प्रसिद्ध शायरों में से एक उर्फ़ी शीराज़ी के बारे में बताया था।
हमने आपको बताया था कि शेरों की शैली की दृष्टि से उर्फ़ी के शेर सब के हिन्दी अर्थात भारतीय शैली में आते हैं किन्तु उनको पूर्ण रूप से एक ऐसा शायर नहीं कहा जा सकता जो पूरी तरह भारतीय शैली पर निर्भर हो। उनकी ग़ज़लें अधिकतर इराक़ी शैली से प्रभावित थीं और इसी शैली की विषय वस्तुओं को बहुत अधिक प्रयोग किया गया है। उनकी ग़ज़लों में भारतीय काल की अधिकतर झलकें पायी जाती हैं। उर्फ़ी शीराज़ी उन शायरों में थे जिन्होंने अपने पूर्वजों की शैली पर चलना पंसद नहीं किया और नई शैली आंरभ की। वास्तव में नई शैली या भारतीय शैली के नाम से प्रसिद्ध शैली उन्हीं से विशेष है और सफ़वी काल के शायरों में वह सबसे सफल शायर थे जिन्होंने इस शैली को औपचारिकता प्रदान की और इस प्रकार उर्फ़ी को नई शैली का आविष्कारक कहा जा सकता है।
उर्फ़ी शीराज़ी की मुख्य विशेषता जो पहले नज़र में अपना ध्यान अपनी ओर केन्द्रित करती है, वह मज़बूत साहित्य को कमज़ोर साहित्य से जोड़ना है। बहुत से साहित्यिक आलोचकों का मानना है कि उर्फ़ी की ग़ज़लों के कुछ बैतों से अच्छे संदेश मिलते हैं और उसे अच्छी तरह समझा जा सकता है जबकि कुछ मध्यम वर्ग के हैं। उर्फ़ी की ज़बान नर्म, सरल और मीठी है। ज़बान की नर्मी और उसकी सरलता, ग़ज़ल की ज़बान के अनुसार होती है जब विषय प्रेम और स्नेह का होता है तो उसमें ज़बान नर्म रखी जाती है और विषय दुखद होता है तो उसी के अनुसार ज़बान रखी जाती है।
उर्फ़ी की ज़बान यद्यपि फ़ारसी भाषा में अपने पूर्वजों के साहित्य से प्रभावित थी किन्तु उसमें पूर्ण रूप से प्राचीनता को देखा नहीं जा सकता था और वह उनके अधिकतर समकालीन कवियों की भांति थी। दूसरे शब्दों में इराक़ी शैली और उसके बाद के काल में शायरों ने जो ज़बान प्रयोग की है वह अहली शीराज़ी और बाबा फ़ुग़ानी शीराज़ी से प्रभावित होकर अस्तित्व में आयी है और शायद उर्फ़ी की ज़बान अपने पूर्वजों के बीच सबसे अधिक अपने शहर के रहने वाले बाबा फ़ुग़ानी से प्रभावित रही है। इन दोनों की ज़बानें, शब्दों की बनावट, वाक्यों के वज़न में, धुन और इसी प्रकार अर्थ और बुनियादी तत्वों में एक दूसरे से बहुत समानता रखती थीं।
उर्फ़ी के शेर के बुनियादी तत्वों की समीक्षा करने से पता चलता है कि उनके शेरों और उनके मन में रचे बसे शब्द निम्न लिखित हैः सुन्दरता, हुस्न, प्रेम, हेजाब, जलना, ज़ख़्म, शहादत, मै या शराब, जज़्बा, कटुता, दुख, निराशा, आशा इत्यादि। साहित्य के क्षेत्र में सक्रिया आलोचकों का कहना है कि उर्फ़ी के शेरों में इस प्रकार के शब्दों की भरमार से पता चलता है कि उनका मन दुखी है और इन शेरों के माध्यम से उनके विचारों और आस्थाओं का पता लगाया जा सकता है।
फ़ारसी भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर सीरूस शमीसा अपनी पुस्तक शैली की पहचान में लिखते हैं कि भारतीय शैली के शेरों में अद्भुत विषय वस्तुएं और उनमें अजीब व ग़रीब संबंध पाए जाते हैं। इस प्रकार से कि इस प्रकार के शेरों को साहित्यिक चोले की आवश्यकता नहीं होती किन्तु इस काल में नई शब्दावलियों का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है।
भारतीय शैली में शेर कहने वाले शायरों की ज़ंजीर की पहली कड़ी में उर्फ़ी शीराज़ी आते हैं जिन्होंने फ़ारसी शेर में नवीन शैली पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह उन सफल शायरों में हैं जिन्होंने कल्पनावाद और नवीन शैली में ज़बरदस्त नाम कमाया। उर्फ़ी उन शायरों में सबसे आगे हैं जिन्होंने नवीं और दसवीं शताब्दी में शायरी में नए अंदाज़ के पेश किया। उन्होंने वर्तमान इशारों और शब्दावलियों को अस्तित्व में लाकर पाठकों को निश्चेत और उनमें आश्चर्य भर दिया। उर्फ़ी प्रचलित अर्थों को छोड़कर नये अर्थों को उनके शालीन स्थान पर प्रयोग करते हैं। वह नये शब्दों का आविष्कार करने में सफल रहे, इसी प्रकार उन्होंने समाज के सामने नवीन विषय वस्तुएं पेश की। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक लगता है कि उन्होंने इन वाक्यों और शब्दों का आविष्कार तो किया किन्तु वह कभी भी बात को घुमा फिराकर या जटिल करने के प्रयास में नहीं रहे यही कारण है कि वह अपनी बात को “ शायरी के जानकार के आविष्कार” का नाम देते हैं।
नक़दे ख़्याल नामक पुस्तक में महमूद फ़ूतूही ने शैली की पहचान और साहित्यिक शब्दावलियों के साथ विषय वस्तु बनाना, भारतीय शैली की एक अन्य विशेषता बताया है। उर्फ़ी ने भी अनोखा अर्थ पेश करने के लिए इन शब्दावलियों से भरपूर लाभ उठाया। पैदा करना, रहस्य, इशारे और छिनना, वह साहित्यिक शब्दावलियां हैं जिन्हें उर्फ़ी ने प्रयोग किया और उसको उसका सही हक़ दिया और इस प्रकार वह सुन्दर अर्थ पेश करने में सफल रहे।
डाक्टर सीरूश शमीसा का कहना है कि शैली की पहचान के विषय में जिस विषय की समीक्षा की जाती है, वह शेर हैं जो दूसरों के क़ाफ़िये में कहे गये हैं। भारतीय शैली में भी बहुत से शेरों को दूसरे की देखी देखा कहा गया है। डाक्टर महमूद फ़ुतूही इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि सफ़वी काल में साहित्य के व्यापक संबंध और शायरों की जानकारियों के समान होने और जानकारी के स्रोतों के एक जैसे होने के कारण, हर काल से अधिक शेरों में समानता पायी जाती थी, या एक प्रकार से कि जिस विषय पर शेर एक शायर ने कहे दूसरे ने भी कह दिए या किसी शायर ने दूसरे शायर के शेर चुरा लिए। उर्फ़ी के शेरों की विशेषता यह थी जिस पर लोगों का ध्यान केन्द्रित रहा है, वह अपने पूर्वजों या समकालीन शायरों द्वारा प्रयोग किए गये क़ाफिए को प्रयोग करते थे। जैसा कि उर्फ़ी ने अपनी ग़ज़लों में अधिकतर हाफ़िज़, सादी और बाबाफ़ुग़ानी का अनुसरण किया, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके शेरों में प्रयोग होने वाले क़ाफ़िए को उनके बाद वाले शायरों या उनके ज़माने के शायरों ने जमकर प्रयोग किया है।
उर्फ़ी द्वारा हाफ़िज़ के शेरों से वज़न, क़ाफ़िया और अन्त्यानुप्रास जो लिया गया है उसके अलावा उर्फ़ी के शेर पढ़ने वालों को यह भी पता चलता है कि उन्होंने दिखावटी संसार से मुंह मोड़ने वालों, नक़ली सूफ़ियों के ख़िलाफ़ जो शेर कहे हैं उनसे इस बारे में हाफ़िज़ के शेर की याद आ जाती है। हाफ़िज़ ने अपने समय में सूफ़ी, ज़ाहिद, आरिफ़ और मधुशालाओं पर विशेष ध्यान दिया जबकि उर्फ़ी ने अपने समय के सामाजिक व राजनैतिक वातावरण, ब्रहमण, शंख, सितार इत्यादि पर विशेष ध्यान दिया। हाफ़िज़ की भांति उर्फ़ी भी प्रायश्चित से बचते हैं और लोगों की आलोचनाओं का शिकार होते हैं।