अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी
इतिहासकारों का कहना है कि “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” का जन्म चौथी शताब्दी हिजरी क़मरी के अन्तिम वर्षों में या फिर पांचवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के आरंभिक वर्षों में हुआ था।
उनका जन्म ग़ज़नी के हजवीरी मुहल्ले में ग़ज़नवी शासनकाल के दौरान हुआ था। किसी भी प्राचीन स्रोत में उस्मान हजवीरी के जन्म दिन की कोई सही तिथि निर्धारित की गई है। कहा जाता है कि सन 381 से 401 हिजरी क़मरी के बीच उनका जन्म हुआ था। उस्मान हजवीरी के पिता के बारे में कहा जाता है कि वे अपने काल के वद्धान थे। ग़ज़नी में उन्हें मान-सम्मान प्राप्त था। लोग उनका बहुत सम्मान किया करते थे। “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” उर्फ़ दातागंज दरबार की माता, संभ्रांत परिवार की सदस्य थीं। उनका परिवार ग़ज़नी के मशहूर परिवारों में से था। उस्मान हजवीरी के मामा अपने समय के मश्हूर इन्सान थे। उनको ताजुल औलिया के नाम से पुकारा जाता था जिनका मक़बरा ग़ज़नी में था। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन के लिए आते थे।
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि हजवीरी ने अपने जीवन के अंत तक शादी नहीं की। कुछ लोगों का यह कहना है कि उन्होंने अपने घरवालों के कहने पर कम उम्र में शादी कर ली थी। कश्फ़ुल महजूब में होजवी के हवाले से लिखा गया है कि शादी के कुछ समय के बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया। कहा जाता है कि पत्नी की मृत्यु के 11 वर्षों के बाद उस्मान हाजवीरी को किसी महिला से प्रेम हो गया था। कुछ समय तक को वे इस प्रेम में रहे लेकिन बहुत जल्द ही वे इससे अलग हो गए और उन्होंने सबकुछ छोड़ दिया।
“अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” ने अपनी मातृभूमि ग़ज़नी में ही प्रचलित ज्ञान हासिल किये थे। उन्हें पवित्र क़ुरआन की व्याख्या का गहरा ज्ञान था। अपनी युवावस्था के आरंभिक काल में उस्मान हजवीरी ने लंबी यात्रा आरंभ की। उनकी इस लंबी यात्रा के कई कारण बताए गए हैं। कुछ शोधकर्ताओं का यह मानना है कि हजवीरी की लंबी यात्रा का एक कारण यह था कि उनके पिता ग़ज़नी में सरकारी पद पर थे। सुल्तान मसूद की हत्या के बाद ग़ज़नी में अशांति फैल गई जहां उनका रहना दूभर हो गया। इसीलिए अपनी तथा अपने परिवार को सुरक्षा के उद्देश्य से हाजवीरी ने यात्रा की थी। कुछ लोगों का यह मानना है कि उस्मान हजवीरी को युवाकाल में ही ख्याति मिल गई थी जिसके कारण बहुत से लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे थे। इसके अतिरिक्त ग़ज़नी में सांप्रदायिक दंगों के कारण हजवीरी को ग़ज़नी छोड़कर जाना पड़ा। कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” को उस काल के मश्हूर नगरों को देखने का बहुत शौक़ था और वे वहां के बुद्धिजीवियों से मिलने के इच्छुक थे इसलिए उन्होंने लंबी यात्रा पर निकलने की ठानी।
“कश्फ़ुल महजूब” नामक किताब के संपादक डाक्टर महमूद आबेदी ने उसमान हजवीरी की यात्रा के बारे में लिखा है कि उन्होंने अपने समय के प्रचलित ज्ञानों को कम समय में प्राप्त किया। हजवीरी से ईर्ष्या करने वालों की संख्या कम नहीं थी। अपनी बुराई को सुनकर वे दुखी हो जाया करते थे। इसका कारण यह था कि वे बहुत संवेदनशील थे। अपने दुश्मनों से बचने और तत्कालीन बुद्धीजीवियों को निकट से देखने की लालसा में उस्मान हजवीरी ने लंबी यात्रा आरंभ की।
लंबी यात्रा के दौरान “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” ने बहुत से शहरों को देखा और वहां पर धर्मगुरूओं तथा बुद्धिजीवियों से मुलाक़ातें कीं। उन्होंने हर प्रकार के ज्ञानियों और विशेषज्ञों से मुलाक़ातें कीं। हजवीरी किसी विशेष विषय के विशेषज्ञों से नहीं बल्कि हर फील्ड के विशेषज्ञ से मुलाक़ात किया करते थे। विद्वानों से मुलाक़ातों के दौरान कभी तो औपचारिक विद्धानों मुलाक़ात हो जाया करती थी और कभी भेंट विस्तार से हुआ करती थी। विद्वानों से मिलकर जहां वे बहुत कुछ सीखते थें वहीं पर स्वयं भी काम की बातों को दूसरों को बताया करते थे। “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” के बारे में कहा जाता है कि वे एक नगर से दूसरे नगर और एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। इस प्रकार से हजवीरी की यात्राओं का क्रम उनकी मौत तक जारी रहा।
“अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” को ग़ज़नी से बहुत प्यार था। वे ग़जनी के विकास के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। कुछ लोगों का कहना है कि शायद इसी उद्देश्य से उन्होंने विश्व की यात्रा आरंभ की थी। डाक्टर आबेदी ने “अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी” की विश्व यात्रा का साल 440 हिजरी क़मरी बताया है। वे कहते हैं कि अगर हजवीरी 440 हिजरी क़मरी से पहले नेशापूर और तूस पहुंच गए होते तो उस काल के नामी गेरामी साधक और सूफी अबूसईद अबुलख़ैर से अवश्य भेंट कर पाते। कश्फुल महजूब में लिखे हजवीरी के कथनानुसार वे उस काल का जानेमाने विद्धान और सूफी अबूसईद अबुलख़ैर से मुलाक़ात करने में कामयाब नहीं हो सके। उस्मान हजवीरी ने इराक़ और ईरान के कई प्रमुख नगरों की यात्राएं कीं और अपना काफ़ी समय यहां के नगरों में गुज़ारा। उन्होंने तुर्किस्तान की भी यात्रा की। हजवीरी ने वर्तमान क़ज़ाक़िस्तान के तत्कालीन “उज़कंद” नगर में तत्कालीन साधक बाबे उमर से मुलाक़ात की। इसके अतिरिक्त भी वे जिस नगर भी गए उन्होंने वहां के विद्वानों से अलग-अलग भेंटवार्ता की।
इतिहासकारों के अनुसार हजवीरी ने 440 हिजरी क़मरी या उसके कुछ बाद नैशापूर की यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान वे शेख अबुल फ़ज़ल से अवगत हुए। शेख अबुल फ़ज़ल, लेबनान के रहने वाले थे। वे लेबनान से अबूसईद अबुलख़ैर से मिलने आए थे किंतु उनके जीवित न रहने की स्थिति में उन्होंने अबूसईद की क़ब्र पर जाकर फ़ातेहा पढ़ा। शेख अबुल फ़ज़्ल से परिचित होने के बाद उस्मान हजवीरी ने “तरीक़ते जुनैदिया” को अपनाया। हजवीरी, शेख अबुल फज़्ल के साथ शाम गए जहां पर लंबे समय तक वे अलग-अलग विद्वानों से मिलते रहे। शाम में उन्होंने बहुत अधिक विद्वानों से मुलाक़ातें कीं। शाम से हजवीरी फिर ख़ुरासान पहुंचे। ख़ुरासान पहुंचकर उन्होंने अपना बहुत सा समय नेशापूर और तूस के विद्वानों के साथ बिताया जिनमें से कई सूफ़ी भी थे। नैशापूर और तूस में हजवीरी हालांकि लंबे समय तक रहे किंतु उनका मन कहीं लगता नहीं था। नैशापूर और तूस के बाद हजवीरी ने लाहौर की यात्रा की। इस बारे में एक विशेषज्ञ डाक्टर आबेदी का कहना है कि उस समय लाहौर नगर भारत और ख़ुरासान का सीमावर्ती नगर था। यहां पर रहकर अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी ने कश्फ़ुल महजूब नामकी किताब लिखी। कहा जाता है कि लाहौर में हजवीरी ने लेखन काम अधिक किया। बाद में लाहौर में ही अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी का देहान्त हो गया। उनकी क़ब्र लाहौर में ही है जहां पर वे दाता दरबार के नाम से जाने जाते हैं। उनकी मज़ार पर बड़ी संख्या में लोग उपस्थित होते हैं और वहां पर सदैव ही श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।