Nov ०७, २०१७ १३:१४ Asia/Kolkata

अली बिन उस्मान हजवीरी ने भारतीय उपमहाद्वीप और ईरान दोनों जगह पर बहुत नाम कमाया और दोनों ही देशों में अध्यात्म के क्षेत्र में उनके बहुत से श्रद्धालु हैं। अली हजवीरी भारतीय उपमहाद्वीप में दाता गंज के नाम से मशहूर हैं।

उनका रौज़ा लाहौर में मुरीदों के दर्शन से भरा रहता है।

हमने इस बात का उल्लेख किया था कि अली बिन उस्मान हजवीरी चौथी हिजरी क़मरी के अंत या पांचवी हिजरी क़मरी के शुरु में ग़ज़्ना के हजवीर मुहल्ले में पैदा हुए और उनके दौर में ग़ज़नी शासन श्रख्ला का राज था।

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हजवीरी ने अपने समय के प्रचलित ज़्यादातर ज्ञान हासिल किए और उस दौर के सांस्कृतिक केन्द्रों में जिन मुद्दों पर बहस होती थी उससे वे अवगत थे। उन्होंने पवित्र क़ुरआन, हदीस, धर्मशास्त्र और कलाम का ज्ञान अपनी जन्मस्थली ग़ज़ना में हासिल किया। इल्मे कलाम में आस्था से जुड़े विषयों पर चर्चा होती है। इसी प्रकार उन्होंने ज्ञान की प्राप्ति के लिए लंबे लंबे सफ़र किए और बहुत से बुज़ुर्गों की सेवा में उपस्थित हुए। इन्हीं में से एक सफ़र के दौरान वे लेबनान में रह रहे मशहूर आत्मज्ञानी शैख़ अबुल फ़ज़्ल ख़त्ली से परिचित हुए और उन्हें ही अपना पीर व अगुवा मान लिया। हजवीरी ने अपने जीवन का अंतिम सफ़र लाहौर का किया। यह शहर भारत और ख़ुरासान के बीच सीमावर्ती शहर था। इसी शहर में उन्हें यह अवसर मिला कि वह ‘कश्फ़ुल महजूब’ नामक किताब लिखें या उसे पूरी करें।             

कश्फ़ुल महजूब से पता चलता है कि हजवीरी ने लाहौर में निवास करने से पहले भारत और मौजूदा पाकिस्तान के बहुत से शहरों का सफ़र किया और वहां के विद्वानों से मुलाक़ात के दौरान हिन्दुओं के रीति रिवाजों, संस्कृति व आस्था से पूरी तरह परिचित हुए। उसके बाद वे लाहौर में रह गए। इस शहर के निवासी उनके मुरीद हो गए। हजवीरी ने लाहौर में जिस मुहल्ले में निवास किया था वहीं पर उनकी क़ब्र है।

यह बात स्पष्ट नहीं है कि हजवीरी किस साल लाहौर पहुंचे। इतिहासकारों व यात्रा वृत्तांत लिखने वालों नें अनेक रिवायत की है यहां तक कि कुछ विरोधाभासी बातें भी कही हैं।

अल्लामा इक़बाल ने हजवीरी के पंजाब की भूमि में प्रवेश के बारे में शेर कहे जिसमें उन्होंने उनके पंजाब में निवास को इस क्षेत्र की रौनक़ का कारण बताया है।

अली बिन उस्मान हजवीरी ने लाहौर में बहुत सेवा की। बड़ी संख्या में उनके मुरीद थे। हिन्दु इतिहासकारों ने भी इस्लाम के विस्तार में हजवीरी की सेवा की बात स्वीकार की है। इस बारे में कन्हैया लाल ने लाहौर के इतिहास नामक किताब में लिखा है कि हजवीरी ने इस्लाम को फैलाने के लिए बहुत अधिक कोशिश की। गणेश दास पारबाग़ पंजाब नामक किताब में लिखते हैं, “उस समय हिन्दु मत की अनुयायी गूजर जाति के लोग बड़ी संख्या में लाहौर में रहते थे। वह उनके (हजवीरी) के श्रद्धालु बन गए और उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया।” मौलवी नो अहमद चिश्ती ने अपनी किताब तहक़ीक़ाते चिश्ती में लिखा है, “जिस वक़्त हजवीरी यहां (लाहौर) पहुंचे तो पंजाब के शासक राजा राय नाएब उनके मुरीद और मुसलमान हो गए। उन्हें शैख़े हिन्दी कहा जाने लगा। राजा के वंश के ही लोग अब तक हजवीरी की क़ब्र के सेवक व मुजाविर हैं।”

हजवीरी की मौत के बारे में भी बहुत मतभेद है लेकिन इस बात की प्रबल संभावना है कि उनकी मौत 465 से 469 हिजरी क़मरी के बीच हुयी। यह बात तो स्पष्ट है कि हजवीरी की जिस वक़्त मौत हुयी उस समय राजा इब्राहीम बिन मसऊद बिन महमूद ग़ज़नवी का राज था। राजा इब्राहीम ने भी उनकी क़ब्र पर रौज़ा बनवाया था। उस समय से आज तक हजवीरी की क़ब्र हर तरह के लोगों के दर्शन का केन्द्र बनी हुयी है। हर समय में बड़ी बड़ी हस्तियों ने उनके दर से कुछ न कुछ हासिल किया है। इस बारे में दाराशिकोह ने अपनी किताब इब्रत नामे में लिखा है, “बड़ी तादाद में लोग हर गुरुवार की रात उनके रौज़े का दर्शन करते हैं और मशहूर है कि जो कोई चालीस दिन या चालीस गुरुवार की रात उनके रौज़े का दर्शन करे, तो उसकी जो भी दुआ हो क़ुबूल होगी।” मुफ़्ती अली अद्दीन लाहौरी भी इस बारे में कहते हैं, “हर गुरुवार की रात और शुक्रवार के दिन हज़ारों की संख्या में लोग उनके दर्शन के लिए आते, चढ़ावा चढ़ाते और मनौती मानते हैं।”

कश्फ़ुल महजूब से कि जो हजवीरी की आख़िरी किताब है, पता चलता है कि उनकी 9 और किताबें थीं कि उनमें से एक भी अब मौजूद नहीं हैं। उनकी कुछ किताबों की चोरी हो गयी और कुछ दूसरी किताबों को दूसरों ने अपना नाम दे दिया। हजवीरी ने इस चोरी को रोकने के लिए कश्फ़ुल महजूब में विभिन्न जगहों पर अपने नाम का उल्लेख किया है। हजवीरी ने कश्फ़ुल महजूब में इन किताबों का भी ज़िक्र किया है।    

हजवीरी का शेरों का दीवान भी था जिसके बारे में उन्होंने कश्फ़ुल महजूब में कहा है, “किसी ने इस दीवान को अपने नाम पर कर लिया है।” लेकिन हजवीरी ने इस दीवान के बारे में इस बात का उल्लेख नहीं किया कि उनकी शायरी फ़ारसी में थी या अरबी में। हजवीरी की दो और किताबें थीं जो अब नहीं हैं। इन दोनों किताबों का नाम फ़ना और बक़ा और असरारुल ख़ुरुक़ वल मुलव्वनात है।

उनकी एक किताब का नाम ‘मिनहाजुद दीन’ है जो सूफ़ीवाद के बारे में और असहाबे सुफ़्फ़ा की प्रशंसा में लिखी गयी है। असहाबे सुफ़्फ़ा वे लोग थे जो पैग़म्बरे इस्लाम के दौर में मदीना में मस्जिदुन नबी के पास बनाए गए एक बड़े से चबूतरे पर रहते थे। इसी तरह इस किताब में हुसैन बिन मंसूर हल्लाज के बारे में लिखा है। लेकिन इस किताब को भी उनके दीवान की तरह किसी ने अपने नाम कर लिया। आस्था और हदीस के विद्वानों की आस्था के बारे में उनकी एक किताब किताबे ईमान है और इसी तरह मंसूर की शायरी की व्याख्या पर आधारित उनकी एक और किताब है। हुसैन बिन मंसूर हल्लाज तीसरी हिजरी क़मरी के मशहूर आत्मज्ञानी थे।

कश्फ़ुल असरार नामक एक छोटी सी पुस्तिका को हजवीरी की पुस्तिका कही जाती है जो पहली बार लाहौर में छपी थी और आठ पेज पर आधारित थी। इस पुस्तिका को कई बार उर्दू में अनुवाद कराकर छपवाया गया है। हैरत की बात यह है कि ज़्यादातर शोधकर्ता इस पुस्तिका को हजवीरी की पुस्तिका कहते हैं जबकि इस पुस्तिका की विषय वस्तु इसके नक़ली होने का पता देती है। इस पुस्तिका की शैली हिन्दी है जबकि कश्फ़ुल असरार का गद्य सामानी शासन के आरंभिक काल का है जिससे बड़ी आसानी से इन दोनों के अंतर को समझा जा सकता है। कश्फ़ुल असरार के लेखक ने अपने परेशान व विक्षिप्त विचारों का हजवीरी के नाम से प्रचार करने और ख़ुद को आत्मज्ञान के क्षेत्र में कोई स्थान दिलाने की कोशिश की है। इस किताब में जो अवतरण, नाम और बातें हैं उनके और हजवीरी के दौर में प्रचलित पद्य के बीच साफ़ अंतर देखा जा सकता है।              

हजवीरी ने कश्फ़ुल महजूब को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में और बड़ी सीमा तक लाहौर में निवास के दौरान अबू सईद हजवीरी नामक उनके एक हमवतन व्यक्ति के सवालों के जवाब में लिखी है। यह किताब आत्मज्ञानियों के जीवन और उनकी उच्च शिक्षाओं के बारे में बहुत मूल्यवान ख़ज़ाना है। कश्फ़ुल महजूब सूफ़ीवाद और अध्यात्म के विषय पर फ़ारसी में लिखी गयी पहली किताब है। इस किताब को हदीस के विद्वानों के कथनों का समूह नहीं समझना चाहिए बल्कि यह सूफ़ी मत का संपूर्ण तंत्र और अध्यात्म के सिद्धांतों के बारे में सबसे अहम किताब समझी जाती है।