Nov ०७, २०१७ १३:३७ Asia/Kolkata

हमने बताया कि अली बिन उस्मान हजवीरी चौथी शताब्दी हिजरी के अंत या पांचवीं शताब्दी हिजरी के आरंभ में ग़ज़नी के हजवीर मुहल्ले में पैदा हुए।

उन्होंने अपने समय के प्रचलित ज्ञानों और अहम विषयों को पढ़ा और सुना और उनसे अच्छी तरह अवगत हो गए थे। हजवीरी ने क़ुरआन, हदीस, तफ़सीर, धार्मिक आदेशों के ज्ञान और वाद शास्त्र इत्यादि की शिक्षा अपने पैतृक नगर ग़ज़नी में ही हासिल की। फिर उन्होंने अधिक ज्ञान हासिल करने के लिए लम्बी यात्रा की और अनेक विद्वानों से ज्ञान अर्जित किया। हजवीरी का अंतिम पड़ाव लाहौर नगर था।

यह शहर ख़ुरासान और भारत की सीमा पर स्थित था और यहां उन्हें अपनी किताब कश्फ़ुल महजूब लिखने का समय मिल गया बल्कि यह भी कहा जाता है कि उन्होंने इस शहर में अपनी इस किताब को पूरा किया। अली बिन उस्मान हजवीरी ने लाहौर में अनेक सेवाएं अंजाम दीं और यहां उनके अनेक चाहने वाले व शिष्य मौजूद थे। हिंदू इतिहासकारों ने भी हजवीरी की सेवाओं विशेष कर इस्लाम धर्म के प्रसार में उनके प्रयासों की ओर संकेत किया है। कश्फ़ुल महजूब के अनुसार हजवीरी ने नौ अन्य किताबें भी लिखी थीं लेकिन आज उनमें से एक भी मौजूद नहीं है।

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हजवीरी की कश्फ़ुल महजूब सूफ़ीवाद और आत्मज्ञान के बारे में फ़ारसी भाषा की सबसे पुरानी किताब समझी जाती है। यह किताब लेखक के समय के समाज, इतिहास और भूगोल की अहम सूचनाओं और सूफ़ी मत व उसके अनुसरणकर्ताओं के बारे में नई और सीधी सूचनाओं के कारण और इसी के साथ फ़ारसी भाषा के व्याकारण, शब्दों के ढांचों और प्राचीन शैली के इस्तेमाल के चलते फ़ारसी गद्य की मूल किताबों में से एक समझी जाती है। हजवीरी ने अपनी इस रोचक और समग्र किताब में अपने मित्र और हमवतन शैख़ अबू सईद हजवीरी के सवालों के जवाब दिए हैं।

अली बिन उस्मान हजवीरी की इस किताब के कुछ अंशों का उर्दू, अंग्रेज़ी, अरबी, तुर्की और पंजाबी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। इस किताब की दसियों हस्तलिखित प्रतियां मौजूद हैं और मुहम्मद हुसैन तस्बीही ने अलग अलग सूचियों से लगभग इसकी साठ प्रतियों को रेखांकित किया है। यह मूल्यवान किताब अब तक कई बार तेहरान, लाहौर, समरक़ंद, ताशक़ंद और मास्को में प्रकाशित हो चुकी है। कश्फ़ुल महजूब का सबसे पहला संपादन रूस के प्रख्यात पूर्व विशेषज्ञ वेलंटाइन जोकोफ़ स्की ने वर्ष 1914 में किया था। उनके निधन के बाद उनके एक शिष्य ने कुछ सूचियों की वृद्धि करके और कुछ सुधार करके इस किताब को वर्ष 1926 में पुनः प्रकाशित किया।

अली बिन उस्मान हजवीरी की किताब कश्फ़ुल महजूब का ताज़ा संपादन फ़ारसी भाषा व साहित्य के विद्वान डाक्टर महमूद आबेदी ने किया है। उन्होंने इसमें अनेक शब्दों व वाक्यों का मूल स्वरूप खोज निकाला है और इस प्रकार उन्होंने विषय वस्तु की अनेक समस्याओं को दूर कर दिया है। डाक्टर आबेदी ने किताब पर अपने फ़ुट नोट्स के माध्यम से पाठक के लिए इसे समझना अधिक आसान बना दिया है।

कश्फ़ुल महजूब धर्मज्ञान, आत्मज्ञान, ईश्वर तक पहुंचने के रास्तों और ईश्वर की पहचान से संबंधित बातों के बारे में एक अमूल्य ख़ज़ाना है। इस किताब में सूफ़ीवाद से संबंधित शब्दावली का विवरण भी है और अतीत के सूफ़ियों व आत्मज्ञानियों की शिक्षाओं और उनकी जीवनी का ब्योरा भी है। कश्फ़ुल महजूब के आलोचकों का कहना है कि यह किताब अपने हर पाठक के लिए लाभदायक है, चाहे वह ज्ञान के जिस दर्जे पर भी हो। हजवीरी ने किताब की भूमिका में इसका नाम कश्फ़ुल महजूब रखने का कारण भी बताया है। कश्फ़ुल महजूब का अर्थ है छिपी हुई चीज़ को प्रकट करना। हजवीरी ने इस वजह से अपनी किताब का नाम कश्फ़ुल महजूब रखा है कि यह सत्य का मार्ग दिखाती है और इस मार्ग तक पहुंचने के लिए इंसान की आंखों पर पड़े हुए पर्दों को हटाती है।

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सूफ़ीवाद और आत्मज्ञान की अहम हस्तियों ने हमेशा ही हजवीरी की कश्फ़ुल महजूब की सराहना की है और उसे ईश्वरीय ज्ञान व सूफ़ीवाद के मार्ग पर चलने वालों के लिए मार्गदर्शन का चिराग़ बताया है क्योंकि यह किताब एक दक्ष गुरू की तरह सत्य के मार्ग पर चलने वालों को रास्ता दिखाती है। कश्फ़ुल महजूब कई अहम व विश्वसनीय किताबों और जीवनियों का स्रोत रही है। फ़रीदुद्दीन अत्तार ने तज़केरतुल औलिया में पिछले आत्मज्ञानियों की जीवनियों व कथनों को इसी किताब के हवाले से उद्धरित किया है। जोकोफ़्सकी के अध्ययन के अनुसार शैख़ अत्तार ने अपनी किताब तज़केरतुल औलिया में बारंबार हजवीरी की कश्फ़ुल महजूब से लाभ उठाया है और कई बार स्रोत का नाम लिए बिना उसकी बातों को पेश किया है। उन्होंने इनमें से अधिकांश स्थानों पर “कहा गया है” कहना पर्याप्त समझा है। अलबत्ता अत्तार ने अपनी किताब में दो बार हजवीरी का नाम लिया है, एक बार इमाम अबू हनीफ़ा की बातों का उल्लेख करते समय और दूसरी बार शैख़ अता की जीवनी के वर्णन के समय। ख़ाजा मुहम्मद पारसा बुख़ाराई उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने अपनी किताबों में हजवीरी की किताब से लाभ उठाया है। उन्होंने अपनी किताब फ़स्लुल ख़िताब में कई स्थानों पर कश्फ़ुल महजूब को उद्धरित किया है और हर बार बड़े सम्मान से अली बिन उस्मान हजवीरी का नाम लिया है।

अली बिन उस्मान हजवीरी ने यद्यपि कश्फ़ुल महजूब की भूमिका में ग़ज़नी में जीवन की कठिनाइयों और किताबों के अभाव की शिकायत की है लेकिन इसके बावजूद लेखक ने अपनी मूल्यवान किताब में उस समय के विश्वस्त स्रोतों से पर्याप्त लाभ उठाया है। कश्फ़ुल महजूब का सबसे पहला संपादन करने वाले वेलंटाइन जोकोफ़्स्की ने गहरे अध्ययन के बाद इस किताब के स्रोतों की खोज की है। उन्होंने कश्फ़ुल महजूब पर एक ठोस प्रस्तावना लिखी है और उसमें कश्फ़ुल महजूब के स्रोतों का उल्लेख किया है।

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रिसालए क़ुशैरिया और कश्फ़ुल महजूब जैसी अहम किताबों के एक ही समय में लिखे जाने के कारण कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि दोनों लेखकों के आपसी रिश्तों के कारण हजवीरी ने अपनी किताब, रिसालए क़ुशैरिया के आधार पर लिखी है। अलबत्ता इन दोनों किताबों का बाद में संकलन करने वाले इस बात की पुष्टि नहीं करते। रिसालए क़ुशैरिया के लेखक अबुल क़ासिम क़ुशैरी, अली बिन उस्मान हजवीरी के समकालीन थे और दोनों ने एक दूसरे से मुलाक़ात भी की थी। हजवीरी ने अपने किताब में, क़ुशैरी की प्रतिष्ठा और उच्च स्थान का प्रशंसा की है।

जब हजवीरी ने कश्फ़ुल महजूब लिखना शुरू किया तो रिसालए क़ुशैरिया उनके पास मौजूद थी। ये दोनों किताबें यद्यपि एक ही विषय पर लिखी गई हैं और दोनों के लेखक भी समकालीन हैं लेकिन दोनों किताबों के बीच स्पष्ट अंतर पाया जाता है। रिसालए क़ुशैरिया के उर्दू अनुवादक और इस पर फ़ुट नोट लिखने वाले पीर मुहम्मद हसन का कहना है कि यद्यपि हजवीरी ने कश्फ़ुल महजूब में रिसालए क़ुशैरिया से लाभ उठाया है लेकिन बहुत सी ऐसी बातों का भी उल्लेख किया है जिन पर रिसालए क़ुशैरिया में कोई चर्चा नहीं की गई है।

वेलंटाइन जोकोफ़्स्की ने इमाम क़ुशैरी को हजवीरी के काल के उन प्रतिष्ठित व महान लोगों में से एक बताया है जिनसे हजवीरी ने लाभ उठाया है लेकिन उनका कहना है कि हजवीरी ने अपनी किताब में रिसालए क़ुशैरिया से लाभ नहीं उठाया है। वे कहते हैं कि दोनों किताबें सूफ़ीवाद के पहले दर्जे के स्रोतों में से हैं और दोनों ही पांचवीं शताब्दी हिजरी के मध्य में लिखी गई हैं। वे कहते हैं कि विषय पूरी तरह से एकसमान होने के बावजूद, दृष्टिगत विषय के बारे में कोई भी चर्चा गुणवत्ता और विषय वस्तु की दृष्टि से भी और व्याख्या की दृष्टि से भी समान नहीं है और इस दृष्टि से इन दो मूल्यवान किताबों में किसी भी प्रकार की समानता दिखाई नहीं देती। हां कभी कभी शब्दावली की दृष्टि से दोनों में कुछ समानता देखी जा सकती है।

भारत के प्रख्यात अध्ययनकर्ता अब्दुल माजिद दरियाबादी ने रिसालए क़ुशैरिया के अनुवादक के रूप में नहीं बल्कि एक निष्पक्ष अध्ययनकर्ता के रूप में इस बारे में दो विचार पेश किए हैं। उनका कहना है कि इन दोनों किताबों का विषय एक होने के बावजूद उनकी लेखन शैली में बहुत अंतर है। क़ुशैरी ने अधिकतर पिछले विद्वानों व सूफ़ियों के कथनों और कहानियों को उद्धरित किया है जबकि हजवीरी ने एक दक्ष अध्ययनकर्ता के रूप में अपने व्यक्तिगत अनुभवों को भी किताब में शामिल किया है। इसी तरह हजवीरी, सूफ़ीवाद की कुछ बातों को ख़ारिज करने में नहीं हिचकते इसी लिए उनकी किताब कहानियों का संग्रह नहीं है बल्कि एक ठोस और मूल्यवान किताब बन गई है।